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मंगलवार, 31 मार्च 2009

वेदना


धरती की आँखें भीगी है
और अम्बर भी रोता है
दुनिया में कोई सब पाता है
और कोई सब खोता है
धरती की आँखें भीगी है
और अम्बर भी रोता है
दुनिया में कोई सब पता है
और कोई सब खोता है

झरने हो नदियाँ के सागर
सब है पानी के धारे
लेकिन इन आंखों के आँसू
जैसे पिगले अंगारे
चीख रही है सारी दिशाएं
कोई दिशा खामोश नहीं
दोष नहीं है तेरा लेकिन
फिर भी तू निर्दोष नहीं
डूब ना जाए दुनिया तेरी
आंसू की इस बारिश में
लगता है तेरे दिल और आँखें
दोनों है इस साजिश में


कल तक मुझको गौरव था
मैं देवताओं की हूँ संतान
आज मगर हूँ आधा जानवर
आज हूँ में आधा इंसान
कल तक मेरी धड़कन
धड़कन जीवन राग सुनती थी
लेकिन आज है मेरे अंग अंग में
जैसे ठंडा एक शमशान
कौन पुकारा कौन पुकारा
देखो सब कुछ बदल गया
कोई पीछे छूट गया है
कोई आगे निकल गया
आग के है यह नाग के जो है
लिपटे हुवे मेरे तन से
पैरों से और बाजू से
और सीने से और गर्दन से ||

2 टिप्‍पणियां:

  1. .....यार मजा आ गया.अब्बल शानदार कविता लिखने के लिए आप दोनों को बधाई.

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  2. मर्मस्पर्शी भाव ....
    बहुत सुंदर रचना ...
    अनेक शुभकामनायें ...

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं

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