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सोमवार, 31 अगस्त 2009

सेंसेक्स की तेजी पर ब्रेक - निवेशकों ने जमकर बिकवाली की


आर्थिक वृद्धि दर के मजबूत आंकड़ों को नजरअंदाज करते हुए सोमवार को निवेशकों ने जमकर बिकवाली की जिससे बंबई शेयर बाजार [बीएसई] में पिछले सात कारोबारी दिनों से जारी तेजी को ब्रेक लग गया और सेंसेक्स 256 अंक नीचे आ गया।

बीएसई के 30 शेयरों वाले सेंसेक्स में पिछले सात सत्रों में।,112 अंक या 7.5 फीसदी की तेजी आई थी। आज यह 255. 70 अंक की गिरावट के साथ 15,666.64 अंक के स्तर पर आ गया। नेशनल स्टाक एक्सचेंज का निफ्टी भी 70.25 अंक की गिरावट के साथ 4,662.10 अंक पर आ गया।

बाजार में सोमवार को मजबूत तकनीकी सुधार दिखाई दिया। यहां तक कि दोपहर में आए मजबूत आर्थिक वृद्धि दर के आंकड़े भी बाजार की धारणा पर सकारात्मक असर नहीं डाल पाए। केंद्रीय सांख्यिकी संगठन [सीएसआ] के आंकड़ों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 6.1 प्रतिशत रही है।

ब्रोकरों के अनुसार, निवेशकों की मुनाफावूसली के अलावा चीन के शेयर बाजार सहित अन्य एशियाई बाजारों में आई गिरावट से बाजार की धारणा पर असर पड़ा। शांगहाए में 6.74 प्रतिशत की गिरावट आई, जबकि हांगकांग का हैंगसेंग 1.86 प्रतिशत नीचे आया। सिंगापुर का शेयर बाजार 1.42 फीसद टूटा। सेंसेक्स की कंपनियों में 22 के शेयरों में गिरावट आई, जबकि आठ के शेयर लाभ के साथ बंद हुए।

नेहरू कप पर फ़िर भारत का कब्ज़ा - पेनाल्टी शूट आउट में सीरिया को 6-5 से हराया





गोलकीपर सुब्रतो पाल के तीन बेहतरीन गोल बचाने की बदौलत पेनाल्टी शूट आउट तक खींचे खिताबी मुकाबले में गत चैंपियन भारतीय टीम ने नेहरू कप पर फिर से कब्जा जमा लिया। भारत ने पेनाल्टी शूट आउट में सीरिया को 6-5 से हराया। अतिरिक्त समय के बाद मेजबान टीम मजबूत प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ 1-1 से बराबरी पर थी।

हजारों दर्शकों के बीच फाइनल मुकाबला बहुत ही जोरदार रहा। लगातार तीसरे खिताब की कवायद में जुटी भारतीय टीम ने सोमवार को फाइनल में 95वें रैंकिंग वाली टीम सीरिया को कड़ी चुनौती दी। अतिरिक्त समय के दूसरे हाफ में रेनेडी सिंह ने मैच का पहला गोल दागा। लेकिन मैच खत्म होने से दो मिनट पहले सीरियाई खिलाड़ी अली दयाब ने बराबरी का गोल दागते हुए मुकाबले को पेनाल्टी शूट आउट में पहुंचा दिया।

दोनों टीमों ने आक्रामक खेल दिखाया। लेकिन निर्धारित समय तक कोई भी टीम गोल कर पाने में नाकाम रही। हालांकि भारतीय कप्तान बाइचुंग भूटिया और सुनील छेत्री ने गोल करने के कुछ मौके गंवाए। भूटिया पीला कार्ड पाने वाले दोनों टीमों से एकमात्र खिलाड़ी रहे। फिल्म स्टार सलमान खान भी इस खिताबी भिड़ंत देखने स्टेडियम पहुंचे।

पूरे प्रतियोगिता के दौरान शानदार प्रदर्शन के लिए कप्तान बाईचुंग भूटिया को टूर्नामेंट का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी घोषित किया गया। अखिल भारतीय फुटबाल महासंघ [एआईएफएफ] के कार्यवाहक अध्यक्ष व केंद्रीय मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने बालीवुड स्टार सलमान खान को एआईएफएफ का ब्रांड अंबेसडर बनाने की घोषणा की। भूटिया के नेतृत्व में भारत ने 2007 में नेहरू कप खिताब जीता था। भारत ने सीरिया को 1-0 से हराकर खिताब पर कब्जा जमाया था। विजयी गोल एनपी प्रदीप ने किया था।

मैनपुरी के सभी खेल प्रेमियों की ओर से भारतीय फुटबॉल टीम को इस विजय पर बहुत बहुत शुभकामनाये |

रविवार, 30 अगस्त 2009

पिछले सात साल में किसी ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट में खेलने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी - सोमदेव देवबर्मन


भारत के सर्वोच्च वरीयता प्राप्त एकल टेनिस खिलाड़ी सोमदेव देवबर्मन साल के चौथे ग्रैंड स्लैम अमेरिकी ओपन के मुख्य ड्रा में जगह बनाकर पिछले सात साल में किसी ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट में खेलने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी बन गए है।

सोमदेव ने अमेरिकी ओपन के लिए खेले गए क्वालीफाईंग टूर्नामेंट के तीसरे दौर में पोलैंड के जेर्र्जी जानोविच को 6-3, 5-2 से हराकर यह गौरव हासिल किया। अमेरिकी ओपन के पहले दौर में सोमदेव को पुर्तगाल के फ्रेडरिको गिल से भिड़ना है। गिल की एटीपी रैकिंग 110वीं है। सोमदेव पिछले सात साल में किसी ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट में खेलने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी बन गए है। इससे पहले, डेविस कप में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रकाश अमृतराज ने 2002 में अमेरिकी ओपन में हिस्सा लिया था। अमेरिकी ओपन का सीधा प्रसारण टेन स्पो‌र्ट्स पर 31 अगस्त से किया जाएगा। टेनिस जगत के सबसे प्रतिष्ठित आयोजनों में एक माने जाने वाले अमेरिकी ओपन के पुरुष वर्ग का फाइनल 14 सितंबर को फ्लशिंग मिडोज एरेना में खेला जाना है।

महिला वर्ग का एकल और युगल फाइनल 13 सितंबर और पुरुष वर्ग का युगल फाइनल 11 सितंबर को होना है। भारत में इन मैचों का प्रसारण संध्या काल से मध्यरात्रि के बाद तक होगा। स्विट्जरलैंड के टेनिस स्टार रोजर फेडरर लगातार छठे खिताब के लिए प्रयास करेगे। भारत की ओर से महिला एकल वर्ग में सानिया मिर्जा अपनी दावेदारी पेश करेगी। पुरुषों के युगल मुकाबलों में महेश भूपति और लिएंडर पेस अपने-अपने जोड़ीदारों के साथ उतरेगे।

सभी मैनपुरी वासीयों की ओर से सोमदेव,सानिया मिर्जा, महेश भूपति और लिएंडर पेस को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाये |

शनिवार, 29 अगस्त 2009

और चंदा मामा दूर के ही रह गए !!


भारतीय वैज्ञानिकों की चांद छूने की तमन्ना को झटका लगा है। यह तमन्ना पूरी करने के लिए भारत का पहला मानव रहित अंतरिक्ष यान चंद्रयान-1 पिछले साल 22 अक्टूबर को चंद्रमा के लिए रवाना हुआ था, लेकिन 312 दिन बाद शनिवार [29 अगस्त, 2009] को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो से उसका संपर्क टूट गया। इसके साथ ही यह अभियान खत्म हो गया और चंदा मामा दूर के ही रह गए।

चंद्रयान-1 परियोजना के निदेशक एम. अन्नादुरई ने कहा, 'यह अभियान खत्म हो गया है। अंतरिक्ष यान से हमारा संपर्क टूट गया है।' हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि चंद्रयान-1 तकनीकी रूप से अपना शत-प्रतिशत काम कर चुका था और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी यह अपना 95 फीसदी तक काम पूरा कर चुका था। पर यह भी एक तथ्य है कि चंद्रयान को अभी एक साल से भी ज्यादा समय कक्षा में रहना था। इतना पहले ही इसरो से उसका संपर्क टूट जाने के चलते इस महत्वाकांक्षी योजना को तो झटका लगा ही, इसरो द्वारा 2013 में 425 करोड़ की लागत से भेजे जाने वाले चंद्रयान-2 अभियान के भी अधर में लटक जाने का खतरा बढ़ गया है। चंद्रयान-2 के तहत चंद्रमा पर भारतीय अंतरिक्ष यान उतारने की योजना थी।

अप्रैल में भी आई थी खराबी

गत 26 अप्रैल को यान में एक खराबी आई थी, लेकिन उसे ठीक कर दिया गया था। यान की दिशा तय करने वाले यंत्र गलत ढंग से काम करने लगे थे और इसका परिचालन प्रबंधन करने वाली एक इकाई ने काम करना बंद कर दिया था। इस खराबी को दूर करने के लिए इसरो ने एक नई तकनीक ईजाद की थी, जो सफल रही थी और अभियान का काम संतोषजनक ढंग से चल रहा था। पर शनिवार तड़के 1.30 बजे चंद्रयान से रेडियो संपर्क टूट गया और यह अंतरिक्ष में दिशाहीन होकर भटकने लगा। बेंगलूर के पास ब्यालालू स्थित दीप स्पेस नेटवर्क को इस यान से रात्रि 12.25 बजे तक आंकड़े मिले। इसके बाद ऐसा क्या हुआ जो यान से संपर्क टूट गया, इसका पता लगाने के लिए इसरो के वैज्ञानिक यान से मिले आंकड़ों का गहन विश्लेषण कर रहे हैं। इसरो प्रमुख जी. माधवन नायर ने कहा, 'हमें सच्चाई स्वीकार करनी होगी, पर कल के लिए बेहतर मौके मिलेंगे।'

312 दिन का सफर

अंतरिक्ष में 312 दिन के सफर में चंद्रयान ने चंद्रमा की कक्षा के 3400 से भी अधिक चक्कर लगाए। इस पर लगे परिष्कृत सेंसरों के माध्यम से बड़े पैमाने पर आंकड़े मिले हैं। इस यान पर इलाके का मानचित्र बनाने वाला कैमरा लगा था। इस पर हाइपर स्पेक्ट्रल इमेजर और चंद्रमा पर मौजूद खनिज पदार्थ का पता लगाने वाला उपकरण भी लगा था।

पिछले माह इसरो ने कहा था कि चंद्रयान ने चंद्रमा की सतह की 70 हजार से भी अधिक तस्वीरें भेजी हैं। इनके माध्यम से चंद्रमा पर मौजूद पहाड़ों और गड्ढों का अद्भुत नजारा देखा जा सका। खास कर चंद्रमा के ध्रुवीय क्षेत्र, जहां हमेशा छाया रहती है, वहां के गड्ढों के दृश्य भी हैं। इसरो ने 17 जुलाई को कहा था कि चंद्रयान चांद पर मौजूद रासायनिक और खनिज पदार्थो के भी आंकड़े एकत्र कर रहा था।

बीते 21 अगस्त को इसरो ने नासा के साथ मिल कर एक खास प्रयोग भी किया था। इसके बारे में इसरो ने कहा था कि इस प्रयोग से चंद्रमा पर उत्तरी धु्रव के पास स्थायी रूप से छाया वाले क्षेत्र के गड्ढों में बर्फ की मौजूदगी की संभावना के बारे में अतिरिक्त जानकारी मिल पाएगी।

.. तो ये था चंद्रयान

चंद्रयान-1 अंतरिक्ष यान को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से देशी धु्रवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान [पीएसएलवी]-सी11 से 22 अक्टूबर, 2008 को रवाना किया गया था।

भारत के इस पहले अभियान की कुल लागत 3.86 अरब रुपये थी।

क्यूबाइड आकार के चंद्रयान में एक तरफ सौर पैनल लगे थे। चंद्रयान सौर ऊर्जा से संचालित था।

चंद्रयान अपने साथ 11 पे लोड [वैज्ञानिक उपकरण] ले गया था। इनमें से पांच पूरी तरह भारत में बने और विकसित थे। तीन यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी [ईएसए], दो अमेरिका और एक बुल्गारिया का था।

चंद्रयान-1 के प्रक्षेपण के साथ ही भारत उन छह देशों में शुमार हो गया था, जिनके नाम चांद पर मिशन भेजने का रिकार्ड दर्ज है। यह रिकार्ड अपने नाम करने वाले हैं- अमेरिका, रूस, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी, चीन और जापान।

चंद्रयान के चरण

पीएसएलवी ने चंद्रयान को पृथ्वी से 250 किलोमीटर दूर चंद्रमा की निकटतम दीर्घ वृत्ताकार प्रारंभिक कक्षा में 1102 सेकेंड में पहुंचाया।

क्रमिक रूप से कुछ दिन में यह पृथ्वी से अधिकतम 23 हजार किलोमीटर दूर चंद्रमा की एक अन्य कक्षा में पहुंचा और नवंबर के पहले सप्ताह में यहां से निकट 100 किलोमीटर की चंद्रमा की तीसरी कक्षा में स्थापित हो गया।

इसके बाद मून इंपैक्ट प्रोब [एमआईपी] नाम के पे लोड को चंद्रयान से अलग कर दिया गया। यह जो चंद्रमा के एक चुने गए खास क्षेत्र से टकराया। यहां इसके कैमरे और अन्य उपकरण चालू कर दिए गए। इसके साथ ही अभियान का संचालन चरण शुरू हो गया।

इसके बाद इसे दो साल तक अपने शेष उपकरणों के साथ वैज्ञानिकों के अलावा बच्चों, प्रेमी-प्रेमिकाओं, साहित्यकारों, फिल्मकारों व ज्योतिषियों के सर्वाधिक प्रिय रहे धरती के इस उपग्रह के रहस्यों से पर्दा उठाने का काम करना था।

नहीं कराया था चंद्रयान का बीमा

इसरो को चंद्रमा पर देश के पहले मानव रहित मिशन 'चंद्रयान-1' की कामयाबी का पूरा भरोसा था। शायद यही वजह रही होगी कि इसरो ने न तो अंतरिक्ष यान का बीमा कराया था और न ही प्रक्षेपण यान का।

कुल 386 करोड़ रुपये की इस परियोजना में अकेले चंद्रयान की कीमत 186 करोड़ रुपये है। 44 मीटर लंबे पीएसएलवी की लागत सौ करोड़ रुपये है। इसरो ने इंडियन डीप स्पेस नेटवर्क [डीएसएन] स्थापित करने के लिए सौ करोड़ रुपये खर्च किए थे।

माधवन के लिए दूसरा बड़ा झटका

वर्ष 2006 में 10 जुलाई को इसरो अध्यक्ष जी. माधवन नायर के दामन पर जीएसएलवी-एफ2 के असफल मिशन से जो दाग लगा था, वह पिछले साल 22 अक्टूबर को चंद्रयान-1 की कामयाब उड़ान के साथ धुल गया था। पर बीच में ही अभियान की नाकामी ने एक बार फिर उस दाग को उभार दिया है। वर्ष 2003 में के. कस्तूरीरंगन से इसरो की कमान संभालने वाले माधवन के लिए यह दूसरा बड़ा झटका है।

केरल विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग में स्नातक माधवन ने मुंबई स्थित भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र में प्रशिक्षण हासिल किया। उन्होंने अपनी पहली नौकरी वर्ष 1967 में थुम्बा राकेट प्रक्षेपण स्थल से शुरू की। तब से अब तक उन्होंने कामयाबी के कई झंडे गाड़े हैं, लेकिन ये दो बड़ी नाकामी उन्हें ताउम्र सताती रहेगी।

चांद की पड़ताल में अहम पड़ाव

चंद्रमा की पड़ताल से जुड़े कुछ अहम पड़ाव:

-2 जनवरी 1959 : सोवियत संघ ने सबसे पहले चंद्रमा की कक्षा पर लूना-1 नामक यान भेजा। 14 सितंबर 1959 को लूना-2 चंद्रमा की सतह से टकराने वाला पहला मानव निर्मित अंतरिक्ष यान बना।

-26 अप्रैल 1962 : अमेरिकी अंतरिक्ष यान रेंजर 4 ने चंद्रमा की सतह की तस्वीरें भेजीं।

-3 फरवरी 1966 : सोवियत संघ का लूना-9 चंद्रमा की सतह पर साफ्ट लैंडिंग करने वाला दुनिया का पहला अंतरिक्ष यान बना।

-20 जुलाई 1969 : अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रांग और एडविन ने पहली बार चंद्रमा पर कदम रखे।

-24 जनवरी 1990 : जापान के अंतरिक्ष यान हितेन से एक छोटा उपग्रह भविष्य के अध्ययनों संबंधी जानकारी जुटाने के लिए भेजा गया। 10 अप्रैल 1993 को इसे जानबूझकर चंद्रमा की सतह से टकराया गया।

अन्य अभियान

यान - देश - लांच तिथि

हितेन - जापान - 24 जनवरी 1990

क्लीमेंटाइन - अमेरिका : 25 जनवरी 1994

एशियासैट 3/एचजीएस-1 - चीन व अमेरिका - 24 दिसंबर 1997

लूनर प्रास्पेक्टर - अमेरिका - 7 जनवरी 1998

स्मार्ट-1 - अमेरिका - 27 सितंबर 2003

कागुया - जापान - 14 सितंबर 2007

चांग ई-1 - चीन - 24 अक्टूबर 2007

चंद्रयान-1 - भारत - 22 अक्टूबर 2008

मेजर ध्यानचंद को भी मिले भारत रत्न !!


हाकी के जादूगर ध्यानचंद की उपलब्धियों को पेले, माराडोना और डान ब्रैडमेन के समकक्ष बताते हुए पूर्व दिग्गजों ने उन्हें देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' दिए जाने की मांग की है। उनका यह भी कहना है कि भारतीय हाकी की सुध लेकर ही इस महान खिलाड़ी को सच्ची श्रृद्धांजलि दी जा सकती है।

तीन ओलंपिक [1928, 1932 और 1936] में स्वर्ण पदक जीतने वाले करिश्माई सेंटर फारवर्ड ध्यानचंद को पद्मभूषण से नवाजा जा चुका है हालांकि हाकी समुदाय का कहना है कि उनकी उपलब्धियों को देखते हुए उन्हें 'भारत रत्न' मिलना चाहिए। अपने पिता को ध्यानचंद के साथ खेलते देख चुके पूर्व ओलंपियन कर्नल बलबीर सिंह ने कहा, 'यह दुख की बात है कि उनकी उपलब्धियों को भुला दिया गया है जबकि फुटबाल में जो स्थान पेले, माराडोना का या क्रिकेट में डान ब्रैडमेन का है, दद्दा ध्यानचंद का हाकी में वही दर्जा है। भारत में किसी खिलाड़ी का किसी खेल में इतना योगदान नहीं रहा होगा।'

वहीं 'चक दे इंडिया' फेम पूर्व अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी मीर रंजन नेगी ने कहा, 'लगातार पतन की ओर अग्रसर भारतीय हाकी की सुध लेकर ही उन्हें श्रृद्धांजलि दी जा सकती है।' उन्होंने कहा, 'आने वाली पीढि़यों को उनकी उपलब्धियों से वास्ता कराना जरूरी है और इसके लिए सत्तासीन लोगों को भारतीय हाकी की सुध लेनी होगी।' जीवन के आखिरी दौर में मुफलिसी से जूझते रहे ध्यानचंद पुरस्कारों के पीछे कभी नहीं रहे। उनके बेटे और पूर्व ओलंपियन अशोक कुमार ने बताया, 'उन्हें कभी कुछ ना मिलने का असंतोष नहीं रहा।'

म्युनिख [1972] और मांट्रियल ओलंपिक [1976] खेल चुके अशोक ने कहा, 'आखिरी दिनों में पूरा घर उनकी महज 400 रुपये मासिक पेंशन पर गुजारा करता रहा। घर में कुछ नहीं था लेकिन किसी ने उनकी सुध नहीं ली। वह कहते थे कि हमारा काम मैदान पर खेलना है, पुरस्कार मांगना नहीं।' उन्होंने कहा, '1936 ओलंपिक में जर्मनी की हार के बाद हिटलर ने उनसे पूछा कि तुम कौन हो तो उन्होंने कहा कि सेना में सूबेदार। हिटलर ने उन्हें जर्मनी आने और सेना में उच्च पद देने का न्यौता दिया जो उन्होंने ठुकरा दिया। राष्ट्रीयता की यह भावना मिसाल थी जो उनमें कूट कूटकर भरी थी।'

मांट्रियल ओलंपिक में भारत के सातवें स्थान पर रहने से दुखी ध्यानचंद ने एम्स में डाक्टर से कहा, 'भारतीय हाकी मर रही है। इसके बाद वे कोमा में चले गए और 1979 में उन्होंने दम तोड़ दिया।' अशोक ने कहा, 'हम मैच हारने के बाद उनसे मुंह छिपाते फिरते थे। वह आखिरी दिनों में भारतीय हाकी की दशा से काफी दुखी थे और दुख की बात तो यह है कि आलम आज भी कमोबेश वही है।' कर्नल बलबीर ने कहा, 'उन्होंने यूरोपीय हाकी का भी स्तर देखा था और वे भारतीय हाकी की दशा भी देख रहे थे। हम अतीत की उपलब्धियों पर गर्व करके खुश होते रहे लेकिन भविष्य की सुध नहीं ली और आज भी क्या बदला है।'

ध्यानचंद से कई मौकों पर मिल चुके कर्नल बलबीर ने कहा, 'इतने महान खिलाड़ी होने के बावजूद दंभ उन्हें छू तक नहीं गया था और वह हमेशा कहते थे कि उनके साथी खिलाड़ियों ने उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया है।' उन्होंने कहा, 'वह कभी गेंद को एक सेकेंड से ज्यादा पकड़कर नहीं रखते थे और टीम वर्क की एक मिसाल थे। मुझे फख्र है कि मैंने उसी पंजाब रेजिमेंट की कमान संभाली जो कभी मेजर ध्यानचंद के हाथ में थी।' वहीं नेगी ने ध्यानचंद को अपेक्षित पुरस्कार और सम्मान नहीं मिल पाने की बात दोहराते हुए कहा, 'क्रिकेट के दीवाने इस देश में हाकी को भले ही राष्ट्रीय खेल बना दिया गया हो लेकिन उसे कभी उसका दर्जा नहीं मिल पाया।' उन्होंने कहा, 'सही मायने में तो ध्यानचंद को बरसों पहले भारत रत्न मिल जाना चाहिए था लेकिन हाकी की सुध किसे है। इसके लिए पावरफुल लोगों को पहल करनी होगी। हम खिलाड़ी कुछ नहीं कर सकते।'

इंडिया मतलब हॉकी , हॉकी मतलब मेजर ध्यानचंद सिंह !!!


'हॉकी के जादूगर' ध्यानचंद के जन्म दिन पर 29 अगस्त को राष्ट्रीय खेल दिवस मनाया जाता है। हॉकी हमारा राष्ट्रीय खेल भी है। आओ कुछ बातें करें हॉकी की ....

[पुराना है इतिहास]

ओलंपिक खेलों से भी काफी पुराना है हॉकी का खेल। दुनिया की लगभग सभी प्राचीन सभ्यताओं में इस खेल का प्रमाण मिलता है। अरब, ग्रीक, रोमन, परसियन, सभी किसी न किसी रूप में अपने तरीके से हॉकी खेलते थे। बेशक वह इस खेल का पुराना रूप था। धीरे-धीरे विकसित होते हुए यह आधुनिक रूप में आया। आधुनिक हॉकी यानी फील्ड हॉकी का विकास किया था ब्रिटेन के लोगों ने। यह समय था 19वीं सदी के आसपास का।

[भारत में हॉकी]

भारत में हॉकी लाने वाले ब्रिटिशर्स ही थे। उस समय स्कूलों मे यह छात्रों का फेवरेट गेम हुआ करता था। धीरे-धीरे इस गेम की लोकप्रियता बढ़ने लगी। भारत में पहला हॉकी क्लब कोलकाता में बना। इसके बाद मुंबई और पंजाब में।

पहली बार एम्सटर्डम ओलंपिक गेम में भारत की हॉकी की प्रतिभा सामने आई। इसमें भारतीय हॉकी टीम ने ओलंपिक का पहला स्वर्ण पदक जीता। पूरा एम्सटर्डम स्टेडियम भारतीय हॉकी टीम की वाहवाही कर रहा था और विशेष रूप से उस शख्स का, जिसे हम कहते हैं 'हॉकी के जादूगर' मेजर ध्यानचंद सिंह।

[बलबीर का करिश्मा]

वर्ष 1928-1956 की अवधि को भारतीय हॉकी का स्वर्णकाल माना जाता है। ध्यानचंद के अलावा एक और नाम इस दौरान सबकी जुबान पर था। यह नाम था बलबीर सिंह। तीन दशक तक यह सितारा भारतीय हॉकी टीम में चमकता रहा। महज यह संयोग कहा जा सकता है कि अलग-अलग पांच खिलाड़ियों का नाम बलबीर सिंह था। बलबीर सिंह ने भारतीय हॉकी टीम की जीत में अपना अहम रोल निभाया था। आज भी हॉकी के दिग्गज और संभावनाशील खिलाड़ी हैं, जो भारत का नाम रोशन कर रहे हैं। इनमें धनराज पिल्लई, दिलीप टर्की, प्रबोध टर्की, बलजीत सिंह, तुषार खांडेकर जैसे कई खिलाड़ियों का नाम लिया जा सकता है।

[दद्दा की जादूगरी]

'हॉकी के जादूगर' मेजर ध्यानचंद सिंह को लोग प्यार और सम्मान से कहते थे-दद्दा। जबकि उनके नाम में चंद शब्द जोड़ा था उनके कोच पंकज गुप्ता ने। उनकी प्रतिभा देखकर उन्हें यह आभास हो चुका था कि हॉकी के आसमान पर सितारों के बीच अगर कोई चांद बनने की काबिलियत रखता है, तो वह ध्यान सिंह ही हैं।

और हां, लेजेंड क्रिकेटर सर डॉन ब्रैडमैन ने उनका खेल देखकर कहा था कि वे हॉकी से गोल ऐसे दागते हैं, जैसे कि वे क्रिकेट के बल्ले से रन बना रहे हों।

हॉकी के इस बादशाह का जन्म 29 अगस्त, 1905 को हुआ था। उन्होंने आर्मी से अपना करियर शुरू किया। यहीं उनकी प्रतिभा की पहचान हुई। वे सेंटर फॉरवर्ड पोजीशन पर खेलते थे। उनके गोल करने के जादुई कारनामे को देखकर पूरा खेल जगत हतप्रभ रह जाता था। कहते हैं कि उनकी प्रतिभा की भनक हिटलर को लगी, तो उसने ध्यानचंद को जर्मन आर्मी ज्वाइन करने का ऑफर दे दिया था। दद्दा की जादूगरी कमाल की थी। उनकी कैप्टनशिप में भारत ने ओलंपिक में तीन बार गोल्ड मेडल जीता था। उन्हें पद्म भूषण सम्मान से नवाजा गया।

दद्दा को सम्मान देने के खातिर ही देश में कई जगह उनकी हॉकी खेलने की मुद्रा में मूर्तियां लगाई गई हैं। जैसे, इंडिया गेट के नजदीक नेशनल स्टेडियम में और आंध्र प्रदेश के मेडक में। विदेशों में भी हॉकी बॉल पर स्टिक की मास्टरी प्रदर्शित करते हुए स्टेचू लगाए गए हैं। वियाना और ऑस्ट्रिया रेजिडेंट्स ने भी उन्हें इस सम्मान से नवाजा है।

दद्दा ध्यानचंद को सभी मैनपुरी वासियों का शत शत नमन |

15 अक्टूबर के बाद से एटीएम से निकासी पर बंदिश लागू


15 अक्टूबर के बाद आप दूसरे बैंकों के एटीएम से एक महीने में 5 बार ही मुफ्त में पैसे निकाल पाएंगे। इससे ज्यादा बार निकासी करने पर शुल्क लगेगा। देश भर के बैंकों के संगठन आईबीए ने बंदिश लागू करने की यह तारीख तय की है। अन्य बैंक से निकासी की अधिकतम सीमा भी 10 हजार रुपये हो जाएगी। इस निर्णय की जानकारी देने के लिए आईबीए ने अपने 150 सदस्य बैंकों को सर्कुलर भेजा है।

कुछ दिनों पूर्व रिजर्व बैंक [आरबीआई] ने आईबीए को ये बंदिशें लागू करने संबंधी निर्देश दिया था। इसके लिए बीते महीने आईबीए ने बैंकों पर पड़ रहे भारी बोझ से बचाने के लिए आरबीआई को दूसरे एटीएम से पैसे निकालने पर बंदिश लगाने का सुझाव दिया था।

एक अप्रैल, 09 से केंद्रीय बैंक ने किसी भी बैंक से धन की निकासी को मुफ्त बना दिया था। इसके बाद से दूसरे बैंक के एटीएम से ग्राहक द्वारा पैसे निकालने पर उसके बैंक को 18 से 20 रुपये का शुल्क देना पड़ता है। पहले यही शुल्क ग्राहक से लिया जाता था। इसके चलते दूसरे बैंकों के एटीएम से निकासी में भारी इजाफा हुआ था। इसे लेकर ही आईबीए ने केंद्रीय बैंक को अन्य बैंकों के एटीएम से रकम निकालने पर बंदिश लगाने का अनुरोध किया था। हालांकि आरबीआई ने दूसरे बैंकों के एटीएम से न्यूनतम निकासी की सीमा एक हजार करने संबंधी आईबीए का सुझाव ठुकरा दिया था।

शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

16 हजार पर दस्तक दे रहा है सेंसेक्स


विदेशी बाजारों से मिले मजबूत संकेतों की बदौलत दलाल स्ट्रीट ने लगातार तेजी के सात सत्र पूरे कर लिए। लिवाली समर्थन से बंबई शेयर बाजार [बीएसई] का सेंसेक्स शुक्रवार को 141.27 अंक उछलकर 15922.34 पर बंद हुआ। यह सूचकांक का तीन हफ्तों का उच्चतम स्तर है। 16 हजार पर दस्तक दे रहा यह सूचकांक 7 दिनों में 1112.70 अंक यानी 7.51 फीसदी की तेजी दर्ज कर चुका है। एक दिन पहले यह 15781.07 अंक पर बंद हुआ था।

इसी प्रकार नेशनल स्टाक एक्सचेंज का निफ्टी भी 44.15 अंक चढ़कर 4700 अंक का स्तर पार कर गया। इस दिन यह 4732.35 अंक पर बंद हुआ। गुरुवार को यह 4688.20 अंक पर था।

निवेशकों में ग्लोबल मंदी से विश्व अर्थव्यवस्था के जल्द बाहर आने का भरोसा बढ़ रहा है। इसका असर शेयर बाजारों पर दिखाई दे रहा है। एशियाई व यूरोपीय बाजारों में तेजी देख कारोबारियों ने दलाल स्ट्रीट में भी लिवाली बढ़ा दी। जुलाई में औद्योगिक उत्पादन के बेहतर आंकड़ों व मानसून की मेहरबानी ने भी निवेशकों का मनोबल बढ़ाया।

बीएसई का 30 शेयरों वाला सेंसेक्स हल्की गिरावट के साथ 15770.19 अंक पर खुला। उठापटक के बीच यह नीचे में 15663.35 अंक तक लुढ़क गया। बाद में भारी लिवाली के जोर से यह ऊंचे में 15957.67 अंक तक पहुंचा। रीयल एस्टेट, आटो, कैपिटल गुड्स व बैंकिंग कंपनियों के शेयरों ने लिवालों को खूब लुभाया। वहीं कंज्यूमर ड्यूरेबल, एफएमसीजी, हेल्थकेयर और आईटी कंपनियों के शेयरों में बिकवाली रही। इस वजह से इन वर्गो के सूचकांक गिरावट के साथ बंद हुए। मिडकैप और स्मालकैप सूचकांकों में भी तेजी दर्ज हुई। सेंसेक्स की 30 कंपनियों में 21 के शेयर लाभ में रहे, जबकि 9 को नुकसान हुआ। इस दिन बीएसई का कुल कारोबार बढ़कर 6581.27 करोड़ रुपये रहा।

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

बताओ करें तो करें क्या ...................??????

हाँ हाँ यादो में है अब भी ,
क्या सुरीला वो जहाँ था ,
हमारे हाथो में रंगीन गुब्बारे थे
और दिल में महेकता समां था ..........

वो खवाबो की थी दुनिया ..........
वो किताबो की थी दुनिया ..................
साँसों में थे मचलते ज़लज़ले और
आँखों में 'वो' सुहाना नशा था |

वो जमी थी , आसमां था ...........
हम खड़े थे ,
क्या पता था ???
हम खड़े थे जहाँ पर उसी के किनारे एक गहेरा सा 'अंधा कुआँ' था ..................

फ़िर 'वो' आए 'भीड़' बन कर ,
हाथो में थे 'उनके' खंज़र ................
बोले फैंको यह किताबे , और संभालो यह सलाखें !!!
यह जो गहेरा सा 'कुआँ' है ................
हाँ .... हाँ .... 'अंधा' तो नहीं है !!
इस 'कुएं' में है 'खजाना' ......
कल की दुनिया तो 'यही' है ....

कूद जाओ ले के खंज़र ......
काट डालो जो हो अन्दर ............
तुम ही कल के हो..............


'शिवाजी'
..........



तुम ही कल के हो ...............



'सिकंदर'
................ ||






हम ने 'वो' ही किया जो 'उन्होंने' कहा,

क्युकी 'उनकी' तो 'खवहिश' यही थी ......
हम नहीं जानते यह भी कि क्यों 'यह' किया .............

क्युकी 'उनकी' 'फरमाइश' यही थी |


अब हमारे लगा 'ज़एका' 'खून' का .........
अब बताओ करें तो करें क्या ???
नहीं है 'कोई' जो हमें कुछ बताएं ..............
बताओ करें तो करें ..............

'क्या' ??????









फ़िल्म :- गुलाल ; संगीत :- पियूष मिश्रा ; गीतकार :- पियूष मिश्रा



कलम की जगह पिस्तौल थामते नन्हे हाथ


इसे क्राइम का बदलता ट्रेंड कहें या आपराधिक गिरोहों की रणनीति का हिस्सा अथवा तीव्र गति से बदलती सामाजिक संरचना का प्रभाव कि बाल अपराधियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।

सहरसा में गत आठ माह में ही पुलिस ने एक दर्जन से अधिक ऐसे बाल अपराधियों को गिरफ्तार किया, जिनकी मासूमियत को देख उनके कारनामों पर सहसा विश्वास करना आसान नहीं। इन बच्चों की गिरफ्तारी चोरी, लूट, अपहरण, आ‌र्म्स एक्ट से लेकर हत्या तक के मामले में हुई है। इस तरह बच्चे कलम की जगह पिस्तौल लेकर चल रहे हैं।

पुलिस ने स्वीकार किया कि अपराधी गिरोह बच्चों की मासूमियत का फायदा उठा रहे हैं। एसपी राजेश कुमार ने कहा कि बाल अपराधियों को चिह्नित करने में पुलिस को खासी परेशानी होती है। ऐसे में उन्होंने माता-पिता से बच्चों पर निगरानी रखने की अपील की।

आंकड़ों पर गौर करें तो 31 जनवरी 09 को सदर पुलिस ने वाहन चेकिंग के दौरान एक देसी पिस्तौल, कारतूस व चाकू के साथ रणवीर झा को गिरफ्तार किया था। उसकी उम्र महज 17 वर्ष थी। उसने लूट की कई घटना में संलिप्तता स्वीकार की थी। 23 फरवरी 09 को बैजनाथपुर ओपी पुलिस ने गम्हरिया गांव स्थित बिन्दो यादव के दरवाजे पर अपराध की योजना बना रहे पटुआहा गांव निवासी अंकुश कुमार उर्फ टनटन, बैजनाथपुर निवासी अम्बेक कुमार, केशव कुमार, गम्हरिया गांव निवासी सुबोध कुमार को असलहे के साथ गिरफ्तार कर लिया। सभी की उम्र 15 से 18 वर्ष के बीच थी। पुलिस ने इनके पास से यूएसए निर्मित छह राउंड की पिस्टल, देसी पिस्तौल, जिंदा कारतूस, खूखरी, दो बड़े चाकू बरामद किए थे।

पूछताछ में पता चला कि सभी छात्र हैं। एक सप्ताह के अंदर हुई तीन राहजनी की घटना से आजिज सदर पुलिस ने 13 अप्रैल 09 की रात जब सिविल वर्दी में रिक्शे पर बैठकर लुटेरों का पता लगाने निकली तो शहर के जिला स्कूल के समीप तीन अपराधियों ने हथियार के बल पर रिक्शा रुकवाया पर, पहले से तैयार थानाध्यक्ष रंजीत बत्स ने अन्य पुलिसकर्मियों के सहयोग से तीन अपराधियों को दबोच लिया।

पर, सरगना अजय यादव भागने में कामयाब रहा। दबोचे गये इस्लामियां चौक का राजवंश राय, फकीर टोला का विशाल चौधरी और शंकर झा नौवीं-दसवीं कक्षा का छात्र था। इनके पास से पुलिस ने दो लोडेड देशी पिस्तौल, चार जिंदा कारतूस, एक चाकू और तीन मोबाइल बरामद किया।

19 जुलाई 09 को सदर थाना क्षेत्र के नरियार गांव में राजकुमार ने बिजलपुर गांव के दो अन्य लोगों के साथ मिलकर अपने ही दोस्त खुशीलाल दास उर्फ छोटेलाल की गला रेतकर हत्या कर दी। बताया जाता है कि राजकुमार गत वर्ष ही मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण किया था। बाद में राजकुमार ने कोर्ट में आत्मसमर्पण कर दिया।

चोरी की बढ़ती घटनाओं के बीच जब सदर पुलिस ने 24 जुलाई 09 को बंगाली बाजार स्थित एक होटल से 12 से 15 वर्ष उम्र के सुनील राम, प्रणव साह, छोटे कुमार राम नामक तीन बच्चों को पकड़ा तो उनके चेहरे की मासूमियत को देखकर लोगों को विश्वास नहीं हो रहा था।

10 अगस्त को जिला स्कूल के बाहर नौंवी वर्ग के एक छात्र ने अपने अन्य साथियों के साथ मिलकर अपने ही सहपाठी रमेश झा रोड निवासी सुधीर सर्राफ के पुत्र शेखर सर्राफ को बस इसलिए चाकू मारकर घायल कर दिया, क्योंकि उसने परीक्षा के दौरान उसे नकल नहीं करने दिया था।

12 अगस्त 09 को सोनवर्षा राज थाना क्षेत्र के गढ़बाजार गांव में भवेश कुमार यादव [16 वर्ष] ने अपने पिता चन्देश्वरी यादव की गोली मारकर हत्या कर दी और शव को मकई के खेत में फेंक दिया।

क्या कहते हैं मनोवैज्ञानिक

सर्वनारायण सिंह रामकुमार सिंह महाविद्यालय में मनोविज्ञान के प्रोफेसर डा. कमलेश प्रसाद सिंह इस कारणों पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि बाल अरापाधियों की संख्या में वृद्धि का सबसे बड़ा कारण संयुक्त परिवार का बिखराव हैं। इलेक्ट्रानिक चैनल, हिंसक फिल्म व टेलीविजन के साथ-साथ भौतिकवाद के बहकावे में आकर बच्चे अपनी आवश्यकता को जल्द पूरा करने के लिए अपराध को आसान हथियार मान बैठते हैं। मां-बाप बच्चे पर समय नहीं दे पाते और उनकी राह बिगड़ती चली जाती है।

रविवार, 23 अगस्त 2009

शेयर बाजारों में तेजी रहेगी: विश्लेषक


विगत तीन सप्ताह में लगभग ठहराव भरे कारोबार की स्थिति को देखने के बाद इस सप्ताह मजबूत वैश्विक संकेतों के कारण बंबई शेयर बाजार में सकारात्मक रूझान से भरा कारोबार होने की उम्मीद है।

यूनीकान फिनांशल के वित्तीय मुख्य कार्यकारी जी नागपाल ने कहा कि अमेरिका के मोर्चे पर सकारात्मक घटनाक्रम के कारण घरेलू बाजार में तेजी की धारणा रहेगी। पहले कुछ दिनों में बाजार में तेजी देखने को मिल सकती है, जबकि सप्ताह के बाकी दिनों में तेजी की उम्मीद बनी रहेगी। बाजार सूत्रों का मानना है कि फेडरल रिजर्व के अध्यक्ष बेन बेर्नांके ने शुक्रवार को कहा था कि पिछले वर्ष के मुकाबले अर्थव्यवस्था के काफी सिकुड़ने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि आर्थिक गतिविधियां अमेरिका और उससे बाहर के देशों में फिर से फैल रही हैं। उनके इस कथन के बाद इस सप्ताह लिवाली में स्थिरता आने की संभावना है। उन्होंने यह भी कहा कि आर्थिक विकास का नजदीकी भविष्य काफी बेहतर है।

एसएमसी ग्लोबल के उपाध्यक्ष राजेश जैन ने कहा कि माहौल में आशा का संचार है क्योंकि बर्नांके के बयान के बाद अमेरिका और यूरोपीय बाजारों में भारी तेजी आई है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था संभावना से भरी नजर आती है जिसका अन्य अर्थव्यवस्थाओं पर सकारात्मक असर होगा।

विश्लेषकों का मानना है कि तकनीकी सुधार का सामना करने के बाद अमेरिका और यूरोपीय बाजारों में तेजी का रूख है जिसके बाद एशियाई बाजारों में भी तेजी आ सकती है।

तीन सप्ताहों में करीब छह प्रतिशत की गिरावट का सामना करने के बाद बीएसई सेंसेक्स पिछले शुक्रवार को कारोबार के अंत में 171 अंकों की गिरावट दर्शाता बंद हुआ। नागपाल ने कहा कि भारतीय बाजार में नकदी की कोई समस्या नहीं है क्योंकि घरेलू निवेशकों के पास काफी धन हैं तथा बाजार में खुदरा निवेशकों की भागीदारी बढ़ रही है। भले ही विदेशी निधियां बाजार में नहीं आती, घरेलू नकदी बाजार में तेजी को बनाए रखेगी। इसके अलावा 27 अगस्त को वायदा और विकल्प खंड के अगस्त अनुबंध की समयसीमा के समाप्त होने से पहले बाजार में कारोबार में उतार चढ़ाव देखने को मिल सकता है।

वाल स्ट्रीट में डाउ जोन्स औद्योगिक सूचकांक 155.91 अंकों की तेजी के साथ 9,505.96 अंक पर था, जबकि स्टैंड‌र्ड्स एंड पूअर्स 500 इंडेक्स 18.76 अंकों की तेजी के साथ 1,026.13 अंक पर था।

सवा लाख को चढ़ गया न जाने कैसा खून ??


आज से ठीक दिन पहेले की एक पोस्ट में आप सब को दिल्ली का लाल खून का काला धंधा
के विषय में बताया था लीजिये साहब लखनऊ की ख़बर भी पेश--खिदमत है |

सवा लाख मरीजों को जाने कैसे-कैसे लोगों का खून चढ़ा दिया गया होगा। यह सवाल खड़ा हो गया है शनिवार को लखनऊ में खून का अवैध कारोबार करने वाले गिरोह के पर्दाफाश के साथ। पुलिस 14 धंधेबाजों वाले इस गिरोह के छह सदस्यों को ही दबोच पाई है। भारी मात्रा में खून, प्लाज्मा, सीरम पाउच, चिकित्सा विश्वविद्यालय के पैड मोहरें बरामद की गई हैं। सरगना सहित आठ लोग अब भी पकड़ से बाहर है। पकड़े गए लोगों ने बताया है कि गिरोह अब तक करीब सवा लाख मरीजों को खून बेच चुका है। खून पेशेवर और गरीबों से खरीदा जाता था।

चिकित्सा विश्वविद्यालय व शहर के अन्य अस्पतालों में खून के अवैध कारोबार होने की जानकारी पाकर पुलिस की टीमें सक्रिय हुई। सीओ चौक विनय चंद्रा की टीम ने बालागंज चौराहे के पास तीन लोगों को गिरफ्तार किया। गिरफ्तार लोगों ने अपना नाम बस्ती निवासी दीपक उर्फ अमित कुमार पांडे, उन्नाव के हसनगंज निवासी आलोक कुमार द्विवेदी उर्फ चिंटू और इंदिरानगर के रवींद्र पल्ली निवासी अमरेश सिंह उर्फ मुन्ना बताया। दीपक ठाकुरगंज और आलोक इंदिरानगर की बसंत विहार कालोनी में रहता है।

पुलिस ने आलोक के घर से बैग में भरे खून के पाउच बरामद किए। जबकि दीपक के घर से सीतापुर के अल्लीपुर निवासी धर्मेद्र सिंह, मदेयगंज निवासी मयंक द्विवेदी और मृदुल द्विवेदी को गिरफ्तार कर लिया। इनके कब्जे से खून के 35 पाउच, प्लाज्मा के 36 पाउच, लेबल, चिविवि के फर्जी सार्टिफिकेट व अन्य चीजें बरामद की। एसपी पश्चिमी परेश पांडेय ने बताया कि गैंग का सरगना जितेंद्र सिंह रवींद्र पल्ली स्थित अपने घर पर रक्त इकट्ठा करता था। उसने चाचा अमरेश सिंह व भाई धर्मेन्द्र सिंह के साथ धंधा शुरू किया। गैंग के सदस्य आलोक द्विवेदी के पिता यदुनाथ द्विवेदी चिकित्सा विश्वविद्यालय के पूर्व लैब तकनीशियन हैं। लिहाजा इस संस्थान के नाम वाले रैपर, पाउच का लेबल व सार्टिफिकेट वह बनवाता था। यह गरीबों व पेशेवर रक्तदाताओं से खून निकाल कर उसे फ्रिज में रख लेते थे। बाद में ब्लड बैंक से कम दाम में उसे बेच दिया जाता था। उन्होंने बताया चिकित्सा विश्वविद्यालय के अलावा कई अस्पतालों व नर्सिग होम में इन लोगों का धंधा पिछले तीन सालों से चल रहा था। गैंग के सदस्यों ने अब तक करीब सवा लाख मरीजों को खून बेचने की बात स्वीकारी है।

सीएमओ डा. एके शुक्ल ने बताया कि बरामद खून को जांच के लिए पीजीआई भेजा गया है। इसके अलावा चिकित्सा विश्वविद्यालय प्रशासन ने भी प्रकरण की जांच के लिए समिति गठित कर दी है।

एसे में अपने एक ब्लॉगर मित्र और मशहूर हास्य कवि अलबेला खत्री जी की चंद पंक्तिया यहाँ पेश कर रहा हूँ :-

दूध है जो महंगा तो

पीयो ख़ूब सस्ता है

आदमी के ख़ून का गिलास मेरे देश में ........



शनिवार, 22 अगस्त 2009

मैनपुरी के पत्रकारों के साथ हुयी अभद्रता - कवरेज करने से रोका गया




आज सुबह के समाचार पत्रों और लोकल न्यूज़ चैनल पर आ रही न्यूज़ से मैनपुरी की जनता को अब तक यह पता चल ही गया होगा कि एक पत्रकार को किस तरह अपना कार्य करने से रोका गया और तो और उसके साथ अभद्रता करते हुए जान से मारने की धमकी भी दी गई | उस पत्रकार की गलती बस इतनी की वो सही समय पर, सही जगह पर, सही तरीके से अपना काम कर रहा था |

अगर जनपद का येही हाल रहा तो शायद ही कोई भी युवा आगे से पत्रकारिता को अपना पेशा बनने की हिम्मत करेगा, भाई साफ़ सी बात है..... 'जान है तो जहान है ' |

मामला कुछ एसा था कि
कोतवाली के पीछे मोहल्ला बालाजीपुरम में स्थित सिगरेट की फैक्ट्री पर गुरुवार की रात केन्द्रीय उत्पाद शुल्क के अधिकारियों ने छापा मारा तो हड़बड़ी की स्थिति उत्पन्न हो गयी। क्योंकि कागजों में बंद फैक्ट्री मौके पर चलती मिली। आसपास निवास कर रहे लोगों में भी इस छापे को लेकर कयासबाजी का दौर चलता रहा। करीब 12 घंटे तक चले छापे के दौरान टीम ने अभिलेख खंगालने के बाद मशीनों को भी सील कर दिया गया। इस छापे में करीब तीन लाख रुपये के टैक्स चोरी का खुलासा किये जाने की बात सामने आई है।

गुरुवार की रात केन्द्रीय उत्पाद शुल्क फर्रुखाबाद के डिप्टी कमिश्नर के.माथुर के नेतृत्व में अधीक्षक मासूक अली व बन्ने मियां तथा निरीक्षक एसएन सिंह कुशवाह सहित अन्य कर्मचारियों ने कोतवाली के पीछे स्थित सिगरेट फैक्ट्री पर छापा मारा तो हड़बड़ी मच गयी। छापा रात्रि करीब 1 बजे मारा गया जो शुक्रवार को दिन में करीब 1 बजे जाकर पूरा हो सका। सूत्रों के मुताबिक उक्त सिगरेट फैक्ट्री विभाग के अभिलेखों में विभाग द्वारा सील फैक्ट्री के रूप में दर्ज थी लेकिन जब छापा पड़ा तो फैक्ट्री संचालित होते मिली। विभागीय सूत्रों के मुताबिक संचालक द्वारा सील तोड़कर फैक्ट्री का संचालन आरम्भ कर दिया गया था। छापे के दौरान विभाग के लोगों ने यहां मौजूद अभिलेखों तथा स्टाक का निरीक्षण किया। इस दौरान यहां मौजूद दो मशीनों को भी सील कर दिया गया। फैक्ट्री पर किसी प्रकार का साइन बोर्ड नहीं था। जिससे साबित हो कि इस फैक्ट्री का नाम क्या है। छापे के दौरान भारी अनियमितताएं मिली हैं।

इसी छापे के समय लोकल न्यूज़ चैनल 'सत्यम' की टीम भी बाकी पत्रकारों व अन्य न्यूज़ चैनलों के साथ वहाँ मौजूद थी | फैक्ट्री संचालक दीपक दुबे तथा उसके साथियो को येही गवारा न हुआ कि मीडिया उनकी काली करतूतों को जनता के सामने लाये | वहां मौजूद "सत्यम न्यूज़" के रिपोर्टर आशीष दिक्षित को जान से मरने की धमकी देते हुए दिल्ली निवासी दीपक दुबे ने अपने साथियो सहित पत्रकारों पर हमला कर दिया | उन लोगो ने वहां रिपोर्टिंग कर रहे दलित पत्रकारों को देख जाति सूचक गालियों की बौछार कर दी और मारपीट करते हुए कवरेज करने से रोकने लगे | जो भी बीच बचाव में आया उन लोगो ने उसे भी नहीं छोड़ा | पत्रकारों द्वारा विरोध करने पर दीपक दुबे ने उन पर हमला करते हुए अपनी रिवाल्वर तान जान से मारने की धमकी दी | इस घटना के विरोध में "सत्यम न्यूज़" के चीफ एडिटर हिर्देश सिंह ने कोतवाली में घटना का अभियोग IPC तथा SC/ST ACT में दर्ज करवाया है | मामले की जांच सीओ सिटी अजित कुमार सिन्हा को सौप दी गई है जिन्होंने जल्द से जल्दी कारवाही की बात कही है |

ज्ञात हो कि इस फैक्ट्री के विषय में पहेले भी स्थानीय लोगो द्वारा जिलाधिकारी को लिखित में कइयो बार शिकायत की जा चुकी है कि इस फैक्ट्री से होने वाले प्रदुषण से आस पास के इलाके में रहेने वालो को स्वास की बीमारी हुयी है |

आज पूरे दिन जनपद में इसी घटना का ही चर्चा रहा | सभी ने पत्रकारों पर हुए हमले की घोर निंदा की | जिले के सभी पत्रकारों में इस घटना को ले कर रोष है | सभी ने सिंह की पहल का समर्थन करते हुए उन्हें जनपद का एक आदर्श पत्रकार बताया और दोषियों को जल्द से जल्द कठोर सज़ा देने की प्रशासन से अपील की है |

हिर्देश सिंह के बारे में आधिक जानने के लिए पढ़े :-

मैनपुरी का सितारा -- हिर्देश सिंह |


शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

एटीएम से निकासी पर लगेंगी बंदिशें



भारतीय रिजर्व बैंक [आरबीआई] दूसरे बैंकों के एटीएम का असीमित इस्तेमाल करने की कुछ माह पूर्व दी गई आजादी छीनने जा रहा है। कुछ दिनों बाद आप अन्य बैंकों के एटीएम से एक बार में 10 हजार रुपये से ज्यादा की राशि नहीं निकाल पाएंगे। साथ ही इस सुविधा का इस्तेमाल भी महीने में केवल पांच बार ही किया जा सकेगा। केंद्रीय बैंक जल्दी ही इस नई व्यवस्था को लागू कर देगा।

इसी साल एक अप्रैल से आरबीआई ने दूसरे बैंकों के एटीएम से नगदी की निकासी को शुल्क मुक्त कर दिया था। रुपये निकालने के अलावा ग्राहक किसी भी एटीएम से अपने खाते में पड़ी रकम की जानकारी भी मुफ्त में ले सकते हैं। देश भर के बैंकों के संगठन इंडियन बैंक्स एसोसिएशन [आईबीए] के अध्यक्ष के. रामकृष्णन ने बताया कि आरबीआई ने इस बारे में पत्र लिखकर उन्हें जानकारी दी है। उम्मीद है कि जल्दी ही नई व्यवस्था लागू हो जाएगी।

आईबीए ने ही केंद्रीय बैंक से पिछले महीने अनुरोध किया था कि दूसरे बैंकों के एटीएम के इस्तेमाल पर कुछ बंदिशें लगाई जाएं। शुल्क मुक्त एटीएम की सुविधा देने से बैंकों का खर्च बढ़ रहा है। इसकी वजह यह है कि ग्राहक जिस बैंक का एटीएम इस्तेमाल करता है, वह इसके एवज में ग्राहक के बैंक से 18 से 20 रुपये शुल्क वसूल करता है। इस शुल्क की व्यवस्था खुद आरबीआई ने दी थी।

हालांकि रिजर्व बैंक ने छोटे ग्राहकों के हित में दूसरे बैंक के एटीएम से निकासी की न्यूनतम सीमा एक हजार रुपये करने संबंधी आईबीए का सुझाव खारिज कर दिया है। आरबीआई के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर जी. गोपालकृष्ण ने यहां एक सम्मेलन के दौरान कहा कि केंद्रीय बैंक को आईबीए से इस संबंध में कुछ सुझाव मिले हैं। आरबीआई इन पर विचार कर रहा है।

लाल खून का काला धंधा


जरूरतमंद मरीजों को ऊंची कीमत पर अवैध रूप से खून उपलब्ध कराने वाले छह लोगों की दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ्तारी पर हैरानी नहीं होनी चाहिए। हैरानी तो इस पर होनी चाहिए कि पहले भी ऐसे मामलों के सामने आने के बावजूद शासन-प्रशासन और अस्पतालों द्वारा इन्हें रोकने के लिए कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई? राजधानी के प्रतिष्ठित एम्स और सफदरजंग अस्पतालों में इस तरह का काला कारोबार फलना-फूलना बेहद चिंताजनक है। हालांकि सफदरजंग अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक ने ऐसी गतिविधियों में अस्पताल के किसी कर्मी की संलिप्तता से इनकार किया है, लेकिन ऐसा कोई भी बयान देने से पहले इसकी गंभीरता से जांच होनी चाहिए और दोषी पाए जाने वाले कर्मियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई से परहेज नहीं करना चाहिए। ऐसा इसलिए, क्योंकि यह मामला आखिरकार सीधे तौर पर लोगों के जीवन से जुड़ा हुआ है। इस पर विश्वास करना कठिन है कि पिछले करीब दस वर्षो से गरीबों और नशेड़ियों से महज चंद रुपयों में खून लेकर उसे महंगी कीमत पर जरूरतमंदों को बेचा जाता था और संबंधित विभागों तथा पुलिस को इसकी भनक तक नहीं लग पाई थी।

इस संदर्भ में ऐसे कई सवाल हैं जिनके जवाब अस्पताल प्रशासन के साथ-साथ शासन-प्रशासन से अपेक्षित हैं। इसमें सबसे बड़ा सवाल गंभीर रूप से बीमार मरीजों को भी इलाज की सुविधा उपलब्ध कराने से पहले अस्पताल द्वारा खून का इंतजाम करने के लिए बाध्य करना है। जाहिर है कि समय पर खून का बंदोबस्त न कर पाने की स्थिति में तीमारदारों को मजबूरन दलालों की शरण लेनी पड़ती है। ऐसे में इस धंधे में अस्पतालकर्मियों की मिलीभगत से भला कैसे इनकार किया जा सकता है? इस आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि कहीं खून के काले धंधे को फलने-फूलने देने के लिए ही तो अस्पतालों के ब्लड बैंकों में रक्त की कमी नहीं दर्शाई जाती? संक्रमित होने की स्थिति में अवैध रूप से हासिल खून जानलेवा भी साबित हो सकता है। यह महज एक या दो अस्पतालों से जुड़ा मामला नहीं माना जा सकता। यह तो जांच से ही पता चल पाएगा कि मुनाफे के कारोबार को देखते हुए इसके तार कितने अस्पतालों से और किस स्तर पर जुड़े हैं, लेकिन क्या संबंधित विभाग ऐसे किसी जांच के लिए आगे आएंगे?

गरीबों के इलाज का दिखावा

गरीब मरीजों के इलाज की उचित व्यवस्था न करने पर उच्च न्यायालय द्वारा राजधानी के अपोलो अस्पताल से जवाब तलब करने पर किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए। सरकार द्वारा राजधानी के तमाम निजी अस्पतालों को इसी शर्त पर सस्ती जमीन और आर्थिक सहायता मुहैया कराई जाती है कि वे एक निश्चित संख्या में गरीब मरीजों को मुफ्त इलाज की सुविधा प्रदान करेंगे, लेकिन कोई भी अस्पताल इस कसौटी पर खरा उतरता नहीं दिख रहा। विडंबना यह है कि इस बारे में की जाने वाली शिकायतों पर सरकार द्वारा भी कोई कार्रवाई नहीं की जाती। ऐसे में निजी अस्पताल गरीबों के इलाज के नाम पर महज रस्म अदायगी कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। ऐसे में उच्च न्यायालय द्वारा अपोलो को कटघरे में खड़ा कर उससे यह स्पष्टीकरण मांगना पूर्णतया उचित है कि वहां गरीब मरीजों के इलाज के लिए किस तरह की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है?

इस संदर्भ में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर जब मुफ्त जमीन देते समय ही निजी अस्पतालों के लिए गरीबों का इलाज करना अनिवार्य बना दिया गया है तब वे इस बारे में ना-नुकर क्यों करते हैं? यह सही है कि ऐसे अस्पतालों में इलाज कराना महंगा है, लेकिन शर्त से बंधे होने के बावजूद गरीबों का इलाज न करने पर उनके खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं की जाती? ऐसा न करने पर उच्च न्यायालय ने 2007 में ही ऐसे अस्पतालों को गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी थी, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या इसके लिए बनी कमेटी ने कभी ऐसे अस्पतालों की जांच की? अगर नहीं तो इसका मतलब तो यही है कि इसके लिए सरकार और संबंधित विभाग सीधे दोषी हैं। अदालती निर्देश पर कमेटी द्वारा अपोलो अस्पताल के दौरे में जो अनियमितताएं सामने आई वे चौंकाने वाली हैं। इससे तो यही लगता है कि वहां गरीबों के इलाज, बिस्तरों, ओपीडी और दवाइयों के नाम पर रस्म अदायगी ही की जाती रही है। फिर उन्हें सस्ती भूमि और अन्य सुविधाएं देने का क्या मतलब? गरीबों के नाम पर सुविधाएं हड़पने, पर उनके इलाज के लिए नाक भौं सिकोड़ने वाले तथाकथित महंगे अस्पतालों के खिलाफ जब तक कड़ी कार्रवाई नहीं की जाएगी तब तक वे हीलाहवाली से बाज नहीं आएंगे।

नन्हें-मुन्हें बच्चे या खतरों के खिलाड़ी ??



स्कूली रिक्शों व वाहनों में खचाखच भर कर स्कूल जाने वाले इन बच्चों को खतरों का खिलाड़ी कहा जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। जिन्हें देख अनायास ही हर किसी के मुंह से उफ निकलता है कि इन नन्हे मुन्हें बच्चों के साथ कहीं कोई अनहोनी घटना न घट जाये। ऐसा नजारा हर रोज स्कूली बच्चों के स्कूल आते जाते समय देखा जा सकता है।

स्कूल की छुट्टी होते ही इन नन्हें-मुन्हें बच्चों को स्कूली रिक्शों में ढूंस-ढूंस कर भर दिया जाता है। कुछ बच्चे तो रिक्शे पर आगे की ओर एक तख्ती पर बैठा दिये जाते हैं व सामने लगे एंगिल को पकड़ कर बैठे यह बच्चे अगर दचकी या ठोकर लगते ही नीचे सरक जाये व गिरकर घायल हो जाये तो कोई बड़ी बात नहीं है। वहीं स्कूली वाहनों पर भी जाने वाले बच्चों का यही हाल है। बच्चे वाहनों में लटक कर घर से स्कूल व स्कूल से घर का रास्ता तय करते हैं। इन्हें देख ऐसा ही लगता है जैसे यह स्कूली बच्चे नहीं बल्कि सर्कस के कलाकार हैं जो चलते वाहन से बाहर की ओर लटक कर करतब दिखा रहे हैं।

लेकिन इन बच्चों की जानमाल की सुरक्षा हेतु न तो विद्यालय प्रशासन जिम्मेदारी पूर्ण रवैया अपना रहा है, न अभिभावकों को इस बात की चिंता है। हद तो देखिए इन स्कूली बच्चों पर अब तक प्रशासन की नजर भी नहीं पड़ी है। जो ऐसे विद्यालयों के विरूद्ध कार्रवाई करें। जिनके रिक्शे व वाहन क्षमता से अधिक बच्चे ढोने का काम करते हैं जैसे यह बच्चे नहीं बल्कि सब्जी तरकारी या कोई सामान हो जो गिर भी जाये तो कुछ नहीं बिगड़ेगा। यदि प्रशासन ने सख्त कदम नहीं उठाये तो किसी भी दिन इन स्कूली बच्चों के साथ कोई अनहोनी घटना घट सकती है।

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