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बुधवार, 30 सितंबर 2009

बम-बम हुआ बाजार, 273.93 उछलकर सेंसेक्स गया 17 हजार के पार



देश के शेयर बाजारों में इस सप्ताह लगातार दूसरे दिन बुधवार को शानदार तेजी देखी गई और सेंसेक्स 273.93 व निफ्टी 77.10 अंक उछलकर क्रमश: 17,126.84 और 5083.95 पर बंद हुए। यह पिछले 16 महीनों का उच्च स्तर है।
सोमवार को दशहरे के अवकाश के बाद मंगलवार को साप्ताहिक कारोबार की शुरुआत करने वाले बंबई स्टॉक एक्सचेंज [बीएसई] का संवेदी सूचकांक सेंसेक्स में 159.91 और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज [एनएसई] के संवेदी सूचकांक निफ्टी में 48.90 अंकों की बढ़त दर्ज की गई थी।
इस तरह पिछले दो दिनों के भीतर सेंसेक्स में 450 से ज्यादा और निफ्टी में 126 अंकों की बढ़त दर्ज की जा चुकी है। सेंसेक्स बुधवार सुबह 15.55 अंकों की बढ़त के साथ 16868.46 पर खुला। कारोबार के दौरान सेंसेक्स 17,142.52 के उच्चतम और 16,868.46 के न्यूनतम स्तर तक पहुंचा।
इसी तरह 50 शेयरों पर आधारित संवेदी सूचकांक निफ्टी ने 0.80 अंक की बढ़त के साथ 5007.65 पर कारोबार की शुरुआत की। दिन के कारोबार के दौरान इसने 5087.60 के उच्चतम और 5004.35 के न्यूनतम स्तर को छुआ। बीएसई के मिड कैप और स्मॉल कैप सूचकांकों में भी क्रमश: 59.36 और 70.45 अंकों की बढ़त देखी गई। मिड कैप सूचकांक 6264.80 और स्मॉल कैप सूचकांक 7519.59 पर बद हुआ।
बीएसई के कुल 13 सेक्टरों में से नौ में तेजी देखी गई जबकि उपभोक्ता वस्तुएं और दैनिक उपभोग की उपभोक्ता वस्तु सेक्टर की कंपनियों के शेयरों में गिरावट देखी गई। बैकिंग सेक्टर के सूचकांक बैंकेक्स में सबसे ज्यादा 3.69 फीसदी की बढ़त दर्ज की गई। बीएसई में कारोबार का रुख सकारात्मक रहा और 1598 कंपनियों के शेयरों में तेजी जबकि 1183 कंपनियों के शेयरों में गिरावट देखी गयी ।

दुनिया के नंबर एक मुक्केबाज बने विजेंदर


ओलंपिक और विश्व चैंपियनशिप में पदक जीतने वाले एकमात्र भारतीय मुक्केबाज विजेंदर कुमार ने मुक्केबाजी के इतिहास में भारत के लिए एक और उपलब्धि हासिल की है। मिडिलवेट [75 किग्रा भार वर्ग] में विजेंदर अब दुनिया के नंबर एक मुक्केबाज बन गए हैं।
विजेंदर ने इस महीने के शुरू में मिलान में विश्व चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतकर भारत को इस टूर्नामेंट का पहला पदक दिलाया था। उनके कुल 2700 अंक हैं और वह उज्बेकिस्तान के मौजूदा चैंपियन एब्बोस अतोव को पीछे छोड़कर शीर्ष पर पहुंच गए हैं। विश्व चैंपियनशिप के सेमीफाइनल में भिवानी का यह मुक्केबाज अतोव से हार गया था। अतोव रैंकिंग सूची में 2100 अंक से तीसरे और ओलंपिक रजत पदकधारी क्यूबा के एमिलियो कोरिया बाएक्स [2500] मिलान चैंपियनशिप के बाद अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाजी संघ [एआईबीए] की सूची में दूसरे स्थान पर हैं।
बीजिंग ओलंपिक में कांस्य पदक जीतकर भारत का ओलंपिक मिथक तोड़ने वाले विजेंदर ने कहा, 'मैं निश्चित रूप से विश्व में ऊंची रैंकिंग हासिल कर काफी खुश हूं। यह शानदार अनुभूति है, जिससे मुझे भविष्य के टूर्नामेंटों में बेहतर करने की प्रेरणा मिलेगी।'
अन्य भारतीयों में पूर्व विश्व युवा चैंपियन थाकचोम ननाओ सिंह लाइट फ्लाईवेट [48 किग्रा] वर्ग में तीन पायदान खिसककर 1400 अंक से आठवें स्थान पर पहुंच गए। चीन में इस वर्ष हुई एशियाई चैंपियनशिप में रजत पदक जीतने वाले ननाओ विश्व चैंपियनशिप के दूसरे राउंड में हार गए थे। ओलंपियन अखिल कुमार फेदरवेट [57 किग्रा] वर्ग में एक पायदान खिसककर 1050 अंक से 10वें स्थान पर हैं। कलाई की चोट के कारण वह विश्व चैंपियनशिप के पहले दौर में बाहर हो गए थे। वहीं साथी ओलंपियन जितेंदर कुमार [54 किग्रा] भी मिलान में पहले राउंड में हार गए थे, जिससे वह खिसककर 838 अंक से 14वें नंबर पर हैं। सुरंजय सिंह फ्लाई वेट [51 किग्रा] वर्ग में 17वें जबकि विश्व चैंपियनशिप के क्वार्टर फाइनल में दिनेश कुमार लाइटवेट [81 किग्रा] वर्ग में 1550 अंक से छठे स्थान पर हैं।

मैनपुरी के सभी खेल प्रेमियों की ओर से  विजेंदर को बहुत बहुत बधाईयां और शुभकामनाएं |

मंगलवार, 29 सितंबर 2009

अक्टूबर-दिसंबर में पॉलीमर नोट भी अर्थव्यस्था में शामिल होंगे



भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी समस्या के रूप में उभरे नकली नोटों के परिचालन की समस्या पर केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक सख्त कदम उठा रहे हैं। केंद्रीय नेतृत्व की मंजूरी के बाद अक्टूबर-दिसंबर में पॉलीमर नोट भी अर्थव्यस्था में शामिल होंगे। शुरुआत 10 रुपये के नोट से की जाएगी।
नकली नोटों का परिचालन रोकने और नोटों का जीवन बढ़ाने के लिए आरबीआई ने पॉलीमर की करेंसी लाने का निर्णय किया था। इस परियोजना को इसी तिमाही अंतिम रूप देने की तैयारी है। मंगलवार को शहर आये आरबीआई के महाराष्ट्र-गोवा के क्षेत्रीय निदेशक व आरबीआई बोर्ड के सदस्य जेबी भोरिया ने कहा कि केंद्र सरकार की मंजूरी के बाद तीन माह में ये नोट जारी कर दिये जाने की उम्मीद है। इन नोटों के लिए पालीमर की आपूर्ति आस्ट्रेलिया से मंगाया जाएगा। छपाई की जिम्मेदारी नासिक और देवास सहित केंद्र सरकार के दो और आरबीआई के दो प्रेस को दिये जाने की उम्मीद है। वर्तमान में कागज की करेंसी इन्हीं प्रेसों में छापी जा रही है। इन्हें छापने की शुरुआत छोटे मूल्य के नोटों से की जायेगी, क्योंकि कम मूल्य के नोट ज्यादा परिचालन में होते हैं। कागज के नोटों की तुलना में पॉलीमर के नोटों की छपाई कुछ महंगी होगी, लेकिन जीवन कई गुना ज्यादा होगा। इनके परिचालन से कटे-फटे नोटों को बदलने और इनके निस्तारण की समस्या भी धीरे-धीरे खत्म हो जायेगी। कम मूल्य के नोटों की सफलता के बाद ज्यादा मूल्य के नोट भी छापे जाएंगे। कागज के पुराने नोट पूर्व की तरह परिचालन में रहेंगे। आरबीआई द्वारा कागज के नोटों में डाले जा रहे गुप्त चिह्न, स्याही और कागज की नकल होने के बाद समय-समय पर इन्हें बदलने के निर्देश हैं।

सोमवार, 28 सितंबर 2009

रियाया से अवाम तक का सफर:माधव राव सिंधिया
भारतीये लोकतंत्र में जिन नेताओं ने मुझे प्रभावित किया उनमे माधव राव सिंधिया मेरे बेहद आजिज़ हैं.हालाकिं में किसी पॉलिटिकल सोच से मुत्तासिर नही हूँ.फ़िर भी में मानता हूँ दे को आज माधव जैसे दूरदर्शी नेताओं की जरुरत है.वे देश के लिए बहुत कुछ करना चाहते थे.वे जन्म जात राजा थे.रियया से लेकर आवाम तक का दर्द बे महसूस करते थे.सिधिया घराने की वे बेहद प्रतिभाशाली कुंवर थे.यही वजह है की ३० सितबर २००१ में उनकी मौत हुयी तो पुरा देश रो पड़ा.माधव राव सिंधिया की मौत एक विमान हादसे में हुयी थी.उस वक्त मेरी उम्र महज १८ साल की थी.
में तब दैनिक जागरण में एक ट्रेनी रिपोर्टर था.उस दिन बेहद तेज़ बारिस हो रही थी.में घर पर था.2 बजे का समय रहा होगा.मेरे बॉस अनिल मिश्रा ने मुझे फ़ोन पर जानकारी दी की बेवर के पास एक हवाई जहाज़ क्रेश हुआ है.उन्होंने मुझे वहाँ जाने को कहा.मेने हा कर दी.और जाने की तेयारी शुरू कर दी.उस वक्त में बी प्रथम वर्ष का छात्र था.विमान के बारे में मुझे कोई जानकारी नही थी.में कैसे रिपोर्टिंग कर पाउँगा.विमान की तकनीक सम्बन्धी भी मुझे कोई खास जानकारी नही थी.ये सब सोचते हुए मैंने कपड़े पहनते चला गया.घर से बहर निकला तो तेज़ बारिस से जाने से रोका.
लेकिन में निकल चुका था.बस स्टेंड पर मेरे पत्रकार मित्र अशोक बाजपेई इंतजार कर रहे थे,हम दोनों ने आखों में ही तुंरत चलने का इशारा किया और एक डग्गेमार जीप में सवार हो गए.पानी तेज़ होने से गावं के संपर्क मार्ग टूट चुके थे.पता चला की जिस गावं में ये दुर्घटना हुयी है उस गावं का नाम भैंसरोली है.इस गावं तक पहुचने में कई बाधाओं को पर करना पड़ा.तेज़ बारिस में कोई घर से नही निकल रहा था.पौने 3 बजे हम लोग उस गावं में दाखिल हुये. घरों के दरवाजों पर आजीब सा सन्नाटा लटक रहा था.सन्नाटे को चीरने के लिए बस बारिस का शोर था.जीप को २ किलो मीटर दूर छुड कर हम पैदल ही घटना स्थल की और चल पड़े.एक बाग़ से होकर हम उस खेत में पहुंचे जहाँ ये विमान दुर्घटनाग्रस्त पड़ा था.देख कर मेरे होश उड़ गए.
तेज़ बारिश का पानी भी विमान की आग को बुझा नही पाया था.तेज़ बारिस भी विमान की लपटों को शांत नही कर पायीं थी. अभी तक मुझे नही पता था की इस में कोन सवार है.आलू के खेत में ओंधे पड़े इस विमान को देखकर मुझे ये एहसास हो गया था की इसमें कोई नही बचा होगा.मेने गावं वालों को बुला कर विनती कर के किसी तेरह विमान का बायीं तरफ का दरवाज़ा तोडा.अन्दर का नजारा याद करके आज भी मेरी मेरी रूह काँप जाती है.विमान में सवार लोगों की सेफ्टी बेल्ट तक का खोलने का मोका नही मिला था.सभी लोग सीटों से बुरी तरह चिपके हुए थे.पानी और आग ने लोगों के चेहरों को पुरी तरह से बिगाड़ दिया था.
जैसे इन लोगों के मास्क विमान मैं डाल दिए हों. मुझे याद है की पहली लाश एक महिला की थी.ये इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्टर अंजू शर्मा थीं. मेने हाथों का सहारा देकर निकालने की कोसिस की लेकिन अंजू का जिस्म सीट से बुरी तरह से चिपका था.मांस को खिचता देख मदद कर रहे ग्रामीण को उलटी आगयी.लाश को छुड़ते हुए वो बोला ''लला जे हमसे नाए हुये.......उसके इतना कहने पर मैंने गर्दन उठा कर अपने आगे पीछे देखा दो लोगों की तरफ इशारा किया.वे लोग मुह पे कपड़ा बाँध कर मदद को आगे आए.तब तक पुलिस एक अफसर दोड़ कर मेरे पास आए.उनका बारलेस सेट माधव राव सिंधिया के बारे में संदेश दे रहा था.इतना सुन कर में मामला समझ गया की ये हादसा मामूली नही है.पुलिस अफसर लाशों में अ़ब माधव राव सिंधिया को खोजने लगे.तभी मुझे पायलट की सीट के ठीक पीछे एक लाश सीट मे धंसी नजर आई.उसे निकल कर देखा.लाश के गले में माँ दुर्गा का सोने का एक लोकेट पड़ा हुआ था.मेने तुरन्त पुलिस अफसर को बताया की ये ही माधव राव सिंधिया की लाश है.
लाश की हालत देख कर मेरी आँख भर आयीं.एक राजा की इस तरह मौत.....में समझ नही पा रहा था.इस दुर्घटना में सिंधिया सहित ८ अन्य लोग भी मरे गए थे.इस दुर्घटना की एक खासियत ये थी की विमान शेषना एयर किंग ९० बिना ब्लेक बॉक्स का था.विमान का मालवा देख कर कहा जा सकता था की ये एक जर्जर विमान है.ग्रामीणों के मुताबिक विमान में आग आसमान में ही लग चुकी थी.कैसे.... पायलट ने इमरजेंसी लेंडिंग की कोसिस की लेकिन विमान में कोई धमाका हुआ जिससे किसी को
चने का मौका नही मिला.बरहाल ये सब जाँच के विषय होने चाहिए थे.दुर्घटना के बाद जाँच के लिए एक टीम गठित की गई लेकिन इस टीम ने जाँच में क्या पाया ये किसी को मालूम नही हो सका.ये दुर्घटना कैसी हुयी ये अभी भी राज़ है.बताते हैं की इस विमान में ब्लेक बॉक्स नही था.अगर ऐसा है तो ख़िर इतने जिम्मेदार नेता को उस जहाज़ में जाने की इजाज़त किसने दी ?ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका जबाव जानना बेहद जरुरी है.

  • हृदेश सिंह

विजयदशमी पर विशेष :- रामसेतु तथा राम के युग की प्रामाणिकता






हम भारतीय विश्व की प्राचीनतम सभ्यता के वारिस है तथा हमें अपने गौरवशाली इतिहास तथा उत्कृष्ट प्राचीन संस्कृति पर गर्व होना चाहिए। किंतु दीर्घकाल की परतंत्रता ने हमारे गौरव को इतना गहरा आघात पहुंचाया कि हम अपनी प्राचीन सभ्यता तथा संस्कृति के बारे में खोज करने की तथा उसको समझने की इच्छा ही छोड़ बैठे। परंतु स्वतंत्र भारत में पले तथा पढ़े-लिखे युवक-युवतियां सत्य की खोज करने में समर्थ है तथा छानबीन के आधार पर निर्धारित तथ्यों तथा जीवन मूल्यों को विश्व के आगे गर्वपूर्वक रखने का साहस भी रखते है। श्रीराम द्वारा स्थापित आदर्श हमारी प्राचीन परंपराओं तथा जीवन मूल्यों के अभिन्न अंग है। वास्तव में श्रीराम भारतीयों के रोम-रोम में बसे है। रामसेतु पर उठ रहे तरह-तरह के सवालों से श्रद्धालु जनों की जहां भावना आहत हो रही है,वहीं लोगों में इन प्रश्नों के समाधान की जिज्ञासा भी है।

 आईये, हम इन प्रश्नों के उत्तर खोजने का प्रयत्‍‌न करे:- श्रीराम की कहानी प्रथम बार महर्षि वाल्मीकि ने लिखी थी। वाल्मीकि रामायण श्रीराम के अयोध्या में सिंहासनारूढ़ होने के बाद लिखी गई। महर्षि वाल्मीकि एक महान खगोलविद् थे। उन्होंने राम के जीवन में घटित घटनाओं से संबंधित तत्कालीन ग्रह, नक्षत्र और राशियों की स्थिति का वर्णन किया है। इन खगोलीय स्थितियों की वास्तविक तिथियां 'प्लैनेटेरियम साफ्टवेयर' के माध्यम से जानी जा सकती है। भारतीय राजस्व सेवा में कार्यरत पुष्कर भटनागर ने अमेरिका से 'प्लैनेटेरियम गोल्ड' नामक साफ्टवेयर प्राप्त किया, जिससे सूर्य/ चंद्रमा के ग्रहण की तिथियां तथा अन्य ग्रहों की स्थिति तथा पृथ्वी से उनकी दूरी वैज्ञानिक तथा खगोलीय पद्धति से जानी जा सकती है। इसके द्वारा उन्होंने महर्षि वाल्मीकि द्वारा वर्णित खगोलीय स्थितियों के आधार पर आधुनिक अंग्रेजी कैलेण्डर की तारीखें निकाली है। इस प्रकार उन्होंने श्रीराम के जन्म से लेकर 14 वर्ष के वनवास के बाद वापस अयोध्या पहुंचने तक की घटनाओं की तिथियों का पता लगाया है। इन सबका अत्यंत रोचक एवं विश्वसनीय वर्णन उन्होंने अपनी पुस्तक 'डेटिंग द एरा ऑफ लार्ड राम' में किया है। इसमें से कुछ महत्वपूर्ण उदाहरण यहां भी प्रस्तुत किए जा रहे है।

श्रीराम की जन्म तिथि

महर्षि वाल्मीकि ने बालकाण्ड के सर्ग 18 के श्लोक 8 और 9 में वर्णन किया है कि श्रीराम का जन्म चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को हुआ। उस समय सूर्य,मंगल,गुरु,शनि व शुक्र ये पांच ग्रह उच्च स्थान में विद्यमान थे तथा लग्न में चंद्रमा के साथ बृहस्पति विराजमान थे। ग्रहों,नक्षत्रों तथा राशियों की स्थिति इस प्रकार थी-सूर्य मेष में,मंगल मकर में,बृहस्पति कर्क में, शनि तुला में और शुक्र मीन में थे। चैत्र माह में शुक्ल पक्ष नवमी की दोपहर 12 बजे का समय था।
जब उपर्युक्त खगोलीय स्थिति को कंप्यूटर में डाला गया तो 'प्लैनेटेरियम गोल्ड साफ्टवेयर' के माध्यम से यह निर्धारित किया गया कि 10 जनवरी, 5114 ई.पू. दोपहर के समय अयोध्या के लेटीच्यूड तथा लांगीच्यूड से ग्रहों, नक्षत्रों तथा राशियों की स्थिति बिल्कुल वही थी, जो महर्षि वाल्मीकि ने वर्णित की है। इस प्रकार श्रीराम का जन्म 10 जनवरी सन् 5114 ई. पू.(7117 वर्ष पूर्व)को हुआ जो भारतीय कैलेण्डर के अनुसार चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि है और समय 12 बजे से 1 बजे के बीच का है।

श्रीराम के वनवास की तिथि

वाल्मीकि रामायण के अयोध्या काण्ड (2/4/18) के अनुसार महाराजा दशरथ श्रीराम का राज्याभिषेक करना चाहते थे क्योंकि उस समय उनका(दशरथ जी) जन्म नक्षत्र सूर्य, मंगल और राहु से घिरा हुआ था। ऐसी खगोलीय स्थिति में या तो राजा मारा जाता है या वह किसी षड्यंत्र का शिकार हो जाता है। राजा दशरथ मीन राशि के थे और उनका नक्षत्र रेवती था ये सभी तथ्य कंप्यूटर में डाले तो पाया कि 5 जनवरी वर्ष 5089 ई.पू.के दिन सूर्य,मंगल और राहु तीनों मीन राशि के रेवती नक्षत्र पर स्थित थे। यह सर्वविदित है कि राज्य तिलक वाले दिन ही राम को वनवास जाना पड़ा था। इस प्रकार यह वही दिन था जब श्रीराम को अयोध्या छोड़ कर 14 वर्ष के लिए वन में जाना पड़ा। उस समय श्रीराम की आयु 25 वर्ष (5114- 5089) की निकलती है तथा वाल्मीकि रामायण में अनेक श्लोक यह इंगित करते है कि जब श्रीराम ने 14 वर्ष के लिए अयोध्या से वनवास को प्रस्थान किया तब वे 25 वर्ष के थे।

खर-दूषण के साथ युद्ध के समय सूर्यग्रहण

वाल्मीकि रामायण के अनुसार वनवास के 13 वें साल के मध्य में श्रीराम का खर-दूषण से युद्ध हुआ तथा उस समय सूर्यग्रहण लगा था और मंगल ग्रहों के मध्य में था। जब इस तारीख के बारे में कंप्यूटर साफ्टवेयर के माध्यम से जांच की गई तो पता चला कि यह तिथि 5 अक्टूबर 5077 ई.पू. ; अमावस्या थी। इस दिन सूर्य ग्रहण हुआ जो पंचवटी (20 डिग्री सेल्शियस एन 73 डिग्री सेल्शियस इ) से देखा जा सकता था। उस दिन ग्रहों की स्थिति बिल्कुल वैसी ही थी, जैसी वाल्मीकि जी ने वर्णित की- मंगल ग्रह बीच में था-एक दिशा में शुक्र और बुध तथा दूसरी दिशा में सूर्य तथा शनि थे।

अन्य महत्वपूर्ण तिथियां

किसी एक समय पर बारह में से छह राशियों को ही आकाश में देखा जा सकता है। वाल्मीकि रामायण में हनुमान के लंका से वापस समुद्र पार आने के समय आठ राशियों, ग्रहों तथा नक्षत्रों के दृश्य को अत्यंत रोचक ढंग से वर्णित किया गया है। ये खगोलीय स्थिति श्री भटनागर द्वारा प्लैनेटेरियम के माध्यम से प्रिन्ट किए हुए 14 सितंबर 5076 ई.पू. की सुबह 6:30 बजे से सुबह 11 बजे तक के आकाश से बिल्कुल मिलती है। इसी प्रकार अन्य अध्यायों में वाल्मीकि द्वारा वर्णित ग्रहों की स्थिति के अनुसार कई बार दूसरी घटनाओं की तिथियां भी साफ्टवेयर के माध्यम से निकाली गई जैसे श्रीराम ने अपने 14 वर्ष के वनवास की यात्रा 2 जनवरी 5076 ई.पू.को पूर्ण की और ये दिन चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की नवमी ही था। इस प्रकार जब श्रीराम अयोध्या लौटे तो वे 39 वर्ष के थे (5114-5075)।

रामसेतु


वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्रीराम की सेना ने रामेश्वरम से श्रीलंका तक समुद्र के ऊपर पुल बनाया। इसी पुल को पार कर श्रीराम ने रावण पर विजय पाई। हाल ही में नासा ने इंटरनेट पर एक सेतु के वो अवशेष दिखाए है, जो पॉक स्ट्रेट में समुद्र के भीतर रामेश्वरम(धनुषकोटि) से लंका में तलाई मन्नार तक 30 किलोमीटर लंबे रास्ते में पड़े है। वास्तव में वाल्मीकि रामायण में लिखा है कि विश्वकर्मा की तरह नल एक महान शिल्पकार थे जिनके मार्गदर्शन में पुल का निर्माण करवाया गया। यह निर्माण वानर सेना द्वारा यंत्रों के उपयोग से समुद्र तट पर लाई गई शिलाओं, चट्टानों, पेड़ों तथा लकड़ियों के उपयोग से किया गया। महान शिल्पकार नल के निर्देशानुसार महाबलि वानर बड़ी-बड़ी शिलाओं तथा चट्टानों को उखाड़कर यंत्रों द्वारा समुद्र तट पर ले आते थे। साथ ही वो बहुत से बड़े-बड़े वृक्षों को, जिनमें ताड़, नारियल,बकुल,आम,अशोक आदि शामिल थे, समुद्र तट पर पहुंचाते थे। नल ने कई वानरों को बहुत लम्बी रस्सियां दे दोनों तरफ खड़ा कर दिया था। इन रस्सियों के बीचोबीच पत्थर,चट्टानें, वृक्ष तथा लताएं डालकर वानर सेतु बांध रहे थे। इसे बांधने में 5 दिन का समय लगा। यह पुल श्रीराम द्वारा तीन दिन की खोजबीन के बाद चुने हुए समुद्र के उस भाग पर बनवाया गया जहां पानी बहुत कम गहरा था तथा जलमग्न भूमार्ग पहले से ही उपलब्ध था। इसलिए यह विवाद व्यर्थ है कि रामसेतु मानव निर्मित है या नहीं, क्योंकि यह पुल जलमग्न, द्वीपों, पर्वतों तथा बरेतीयों वाले प्राकृतिक मार्गो को जोड़कर उनके ऊपर ही बनवाया गया था।
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 आप सभी को विजयादशमी की बहुत बहुत बधाईयां और शुभकामनाएं |

अत्याधुनिक हथियारों से लैस होगी सेना



आतंकवाद के खिलाफ अपने अभियानों को मजबूती देने के लिए भारतीय सेना ने कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाने का फैसला किया है। इसके तहत नौ मिमी सेमीआटोमैटिक पिस्तौल और विशेष प्रकार की जनरल परपस मशीन गन [जीपीएमजी] खरीदे जाएंगे।

सेना के सूत्रों ने बताया, 'बड़े शहरों में आतंकियों से लड़ाई के दौरान नौ मिमी कारतूस की क्षमता वाली पिस्टल को बेहद कारगर पाया गया। इसलिए इन अत्याधुनिक हथियारों को सेना में शामिल करके विशेष सैनिक बल व अन्य सैन्य इकाईयों की क्षमता बढ़ाने पर विचार किया जा रहा है।'
उन्होंने कहा कि 'नई पिस्तौल रात के समय लड़ाई में मदद करने वाले यंत्रों से भी लैस होगी। इसमें लेजर बीम और अत्यधिक तीव्रता वाली फ्लश लाइट लगे होंगे।' उन्होंने बताया कि यह पिस्तौल रात में हुए मुंबई हमले जैसे आतंकी हमले में बेहद कारगर साबित होगी। फिलहाल सेना के पास नौ मिमी की बेरेटा पिस्टल हैं। इनका पिछले कई दशक से इस्तेमाल हो रहा है।
सूत्रों का कहना है कि सेना के लिए अत्याधुनिक ग्लाक-17 एस पिस्तौल खरीदने के बारे में सोचा जा रहा है। इनका इस्तेमाल राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड [एनएसजी] ने मुंबई के 'आपरेशन टोरनाडो' अभियान में किया था।

इराक और अफगानिस्तान में आतंकियों के खिलाफ अमेरिकी और नाटो सेना ने भी जीपीएमजी गन का सफलता पूर्वक इस्तेमाल किया है। यह गन 1200 मीटर तक मार कर सकती है और वजन में इतनी हल्की है कि पैराशूट से कूदते समय भी साथ में रखा जा सकता है। जीपीएमजी को मीडियम मशीन गन भी कहा जाता है। इसमें 7.62 मिमी राउंड की क्षमता होती है और काफी दूरी तक निशाना साध सकती है।

सरदार भगतसिंह का अंतिम पत्र अपने साथियों के नाम

सरदार भगतसिंह का अंतिम पत्र अपने साथियों के नाम:


22 मार्च,1931,



“साथियो,
 

स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए, मैं इसे छिपाना नहीं चाहता। लेकिन मैं एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूँ, कि मैं क़ैद होकर या पाबंद होकर जीना नहीं चाहता। मेरा नाम हिंदुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है और क्रांतिकारी दल के आदर्शों और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊँचा उठा दिया है – इतना ऊँचा कि जीवित रहने की स्थिति में इससे ऊँचा मैं हर्गिज़ नहीं हो सकता। आज मेरी कमज़ोरियाँ जनता के सामने नहीं हैं। अगर मैं फाँसी से बच गया तो वो ज़ाहिर हो जाएँगी और क्रांति का प्रतीक-चिन्ह मद्धिम पड़ जाएगा या संभवतः मिट ही जाए. लेकिन दिलेराना ढंग से हँसते-हँसते मेरे फाँसी चढ़ने की सूरत में हिंदुस्तानी माताएँ अपने बच्चों के भगत सिंह बनने की आरज़ू किया करेंगी और देश की आज़ादी के लिए कुर्बानी देनेवालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रहेगी. हाँ, एक विचार आज भी मेरे मन में आता है कि देश और मानवता के लिए जो कुछ करने की हसरतें मेरे दिल में थी, उनका हजारवाँ भाग भी पूरा नहीं कर सका. अगर स्वतंत्र, ज़िंदा रह सकता तब शायद इन्हें पूरा करने का अवसर मिलता और मैं अपनी हसरतें पूरी कर सकता. इसके सिवाय मेरे मन में कभी कोई लालच फाँसी से बचे रहने का नहीं आया. मुझसे अधिक सौभाग्यशाली कौन होगा? आजकल मुझे ख़ुद पर बहुत गर्व है. अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इंतज़ार है. कामना है कि यह और नज़दीक हो जाए.
 

आपका साथी,
भगत सिंह ”

 

रविवार, 27 सितंबर 2009

शहीद् ए आजम सरदार भगत सिंह जी (27 सितम्बर, 1907 - 23 मार्च, 1931 )







कुछ बहरों को सुनाने के लिए एक धमाका आपने तब किया था ,
एसे ही कुछ बहरे आज भी राज कर रहे है,
हो सके तो आ जाओ !!





सरफरोशी की तमन्ना
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाजू-ऐ-कातिल में है.

करता नहीं क्यूँ दूसरा कुछ बात-चीत, देखता हूँ मैं जिसे वोह चुप तेरी महफिल में है.

ए शहीद-ऐ-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार, अब तेरी हिम्मत का चर्चा गैर की महफिल में है.
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है.

वक्त आने पे बता देंगे तुझे ए आसमान, हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है.

खींच कर लाई है सब को क़त्ल होने की उम्मीद, आशिकों का आज जमघट कूचा-ऐ-कातिल में है.
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है.

है लिए हथियार दुश्मन ताक़ में बैठा उधर, और हम तैयार हैं सीना लिए अपना इधर.

खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है, सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है.

हाथ जिन में हो जूनून कट ते नही तलवार से, सर जो उठ जाते हैं वोह झुकते नही ललकार से.

और भड़केगा जो शोला-सा हमारे दिल में है, सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है.

हम तो घर से निकले ही थे बांधकर सर पे कफ़न, जा हथेली पर लिए लो बढ़ चले हैं ये क़दम.

जिंदगी तो अपनी मेहमान मौत की महफिल में है, सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है.

यूं खडा मकतल में कातिल कह रहा है बार बार, क्या तमन्ना-ऐ-शहादत भी किसी के दिल में है.

दिल में तूफानों की टोली और नसों में इन्किलाब, होश दुश्मन के उड़ा देंगे हमें रोको न आज.
दूर रह पाये जो हमसे दम कहाँ मंजिल में है,

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है. देखना है ज़ोर कितना बाज़ुय कातिल में है ||




इंक़लाब जिंदाबाद  







 शहीद् ए आजम सरदार भगत सिंह जी को उनके १०३ वे जन्मदिवस पर सभी मैनपुरीवासीयों की ओर से शत शत नमन |

चिडियां ते मैं बाज़ लडाओं......


उत्तर प्रदेश का वीर...कर्मवीर


रिष्ठ आई पी एस अफसर कर्मवीर सिंह को यूपी पुलिस का मुखिया बनाया जाना एक सराहनीय कदम है| कर्मवीर का मैनपुरी से नाता पुराना है, कर्मवीर मैनपुरी के पहले एसपी रह चुके हैं| यह वो समय था जब मैनपुरी में डाकुओं का साम्राज्य था| डाकुओं के दहशत से सरकारें तक परेशान थी| उस समय मैनपुरी में डाकू छबिराम की हुकूमत थी| जिले मैं इस डाकू की छवि 'रोबिनहुड' की थी| लोग इस डाकू को ''नेता जी'' कहकर बुलाते  थे| इस डाकू का जलवा देखने लायक था| ये बात ८० के दशक थी उस समय पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह प्रदेश के सीएम थे| दिउली कांड में २० दलितों की हत्या से इंदिरा गाँधी की सरकार हिल चुकी थीं| उपर से डाकू छबिराम का आतंक... इस सब से कांग्रेस सरकार को सदन में जबाव देते नही बन रहा था| डाकू छबिराम का इलाके में रसूक था। डाकू छबिराम चुनौती के साथ डाके डाल रहा था| इकरी, कुरावली, नवातेदा, आलीपुर खेडा जैसे इलाको में छबिराम के गिरोह की दहशत थी| जनपद फरुखाबाद, शहजानपुर तक में भी उसका आतंक फ़ैल चुका था| प्रदेश से बाहर एमपी में भी उसका कहर बरसता था| उस समय युवक कांग्रेस के प्रसीडेंट खुशी राम यादव ने छबिराम का आत्मसमर्पण कराने के भरसक कोशिश की| बताते है कि जातीय कारण और स्थानीय नेताओं की राजनीति के चलते छबिराम का आत्मसमर्पण नही हो सका| जब इंदिरा गाँधी ने वीपी सिंह से दो टूक शब्दों में ये कहा की ''राजा साहब या तो सीएम की कुर्सी छोड़ो या छबिराम मारो'' तब सीएम वीपी सिंह ने उस समय के युवा सरदार आईपीएस अफसर कर्मवीर को छबिराम को पकड़ने की जिम्मेदारी सौपी गयी |

नए अफसर के लिए ये टास्क किसी चुनौती से कम नही था| लेकिन ये चुनौती इस सरदार ने सम्भाली, और अंत में उसे अंजाम तक ले गए| बाद में कर्मवीर प्रदेश में डाकू उन्मूलन के लिए पहचाने जाने लगे| डाकू उनके नाम से थर्राने लगे थे| कर्मवीर मुठभेड़ में ख़ुद डाकुओं से मोर्चा लेते थे |

सीनियर पत्रकार खुशी राम बताते हैं, ''कर्मवीर का जोश देखने लायक होता था....वे बेहद सख्त अफसर थे| गुरु गोविन्द सिंह की तरह वे भी चिडिया से बाज़ लड़ाने का दम रखते थे| और उन्होंने ऐसा किया भी.''

छबिराम के गिरोह में कुल ७ या १० लोग थे| घोडों पर उनकी सवारी थी| जब उनका गिरोह सड़कों पर बेखोफ निकलता था तो पुलिस के जावन उसे सलाम करते हुए रास्ता देते थे| महिलाओं की छबिराम इज्ज़त करता था| उनके मायके से लाये गहने छबिराम ने कभी नही लुटे| लड़किओं की शादी में छबिराम खूब खर्च करता था...इधर 'नेता जी' लोकप्रियता बड़ती ही जा रही थी| डाका डालने का ग्राफ भी बड रहा था| ऐसे में अब कर्मवीर के लिए छबिराम का पकड़ा जाना जरुरी हो गया था| इधर कुछ नेता अपने स्वार्थ के चलते छबिराम का आत्मसमर्पण नही होने देना चाह रहे थे|

इन सब दिक्कतों के बाद भी कर्मवीर ने हिम्मत नही हारी| वीपी सिंह की ओर से दी गयी डेड लाइन खत्म हो चुकी थी| बावजूद इसके कर्मवीर ने एक दिन की मोहलत सरकार से और मांगी.मोहलत मिलने के दिन ही कर्मवीर ने छबिराम का सफाया करने की ठान ली| सटीक मुखबिरी और रणनीति से पुलिस ने ओंछा के पास जंगलों में मुठभेड़ में मार गिराया| बाद में डाकू छाबिराम की लाश को क्रिश्चयन मैदान में रखा गया| किसी डाकू कि लाश को पहली बार जनता के लिए सार्वजनिक रूप से दिखाया गया था| पूरा मैदान कर्मवीर सिंह के नारों से गूंज रहा था| लोग उनको हाथों में उठा रहे थे| ये किसी भी अफसर के लिए एक सुनेहरा पल कह सकते हैं| ये पल तोफीक इश्वर ने उन्हें दी थी| ये इज्ज़त शायद ही किसी पुलिस अफसर को यूपी में मिली हो|

इस बहादुर पुलिस अफसर के आने से यूपी पुलिस का चेहरा बदलेगा ऐसी उम्मीद की जा सकती है| क्यों की कर्मबीर ने हमेशा चिडिया से बाज़ लड़ाए हैं.....शुभकामनाएं|

शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

जिंदगी हार्ट अटैक से पहले और इसके बाद



एक वक्त था, जब हृदय को एक ऐसा अंग समझा जाता था, जो अगर एक बार बिगड़ जाए, तो फिर उसका ठीक होना असंभव था, परन्तु अब चिकित्सा विज्ञान में चमत्कारिक प्रगति हो चुकी है। इस कारण अब हृदय को दुरुस्त रखकर लंबी उम्र तक स्वस्थ-सक्रिय जिंदगी जी सकते हैं।

[बचाव]


यदि दिल की धमनियां सुचारु रूप से काम करेगी, तो दिल भी अच्छी तरह से काम करता रहेगा। हृदय की धमनियां कोलेस्ट्रॉल व प्लेटलेट्स के जमने से अवरुद्ध हो जाती हैं। इसलिए हृदय को अटैक से बचाने के लिए दिल में किसी रुकावट के बगैर रक्त संचार आवश्यक है। हार्ट अटैक से बचाव के लिए इन बातों पर अमल करे-

* यदि आप मोटापे से ग्रस्त है या आपका पेट निकला है और कमर की माप 38 इंच से अधिक है, तो फौरन वजन घटाने के प्रयास शुरू कर दें।
* यदि आप हाई ब्लडप्रेशर व मधुमेह से पीड़ित है, तो इन शिकायतों को नियंत्रित रखें।
* अपना लिपिड प्रोफाइल चेक करवाएं। यदि यह प्रोफाइल अधिक हो, हाई ब्लडप्रेशर या डायबिटीज हो, तो रोजाना एक गोली रोजुवास्टैटिन और एक गोली एस्प्रिन (75 मिलीग्राम) लें। एस्प्रिन टैब्लेट्स लेने से हार्टअटैक की संभावना 60' तक घट जाती है।
* प्रतिदिन योग व अन्य व्यायाम करे।
* खानपान में चावल व मैदा का कम से कम प्रयोग करे, पर दाल, सब्जियों व फलों को अधिक स्थान दें। मीठा व नमक कम लें। खाना कम खाएं।
* घी, चिकनाई व तली खाद्य वस्तुओं से परहेज करे।
* धूम्रपान, मदिरापान और मांसाहार से दूर रहे।
[दौरे के बाद]

यदि आपको हार्ट अटैक हो चुका है, तो आप निराश न हों। इन दिनों आधुनिक दवाओं के उपलब्ध होने और अनुशासित दिनचर्या से आप लंबी व बेहतरीन जिंदगी जी सकते है। अटैक के बाद इन बातों का ख्याल रखें-

* हृदय रोग विशेषज्ञ ने आपके लिए जो दवाएं निर्धारित की है, उन्हे नियमित रूप से लेते रहे।
* अपने पास हृदय रोग विशेषज्ञ का फोन नंबर रखें। एंबुलेंस सर्विस के बारे में भी आपको जानकारी होनी चाहिए।
* जीवन के प्रति आशावादी सोच रखें और तनाव को नियंत्रित करने की कोशिश करे।
* प्रतिदिन योग, व्यायाम व मेडिटेशन करे। ऐसा करने से आपकी धमनियां दुरुस्त रहेगी और दोबारा अटैक होने की संभावनाएं बहुत कम हो जाएंगी।
* खान-पान में मौसमी सब्जियों और फलों को स्थान दें और चिकनाईयुक्त आहार से परहेज करे।
* महीने में एक बार अपने हृदय रोग विशेषज्ञ से चेकअप कराएं।

- डॉ. आरती दवे लालचंदानी
(वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ)

मेहमान का कोना

एक मुक्कमल शायरी


सांसों में लोबान जलाना आख़िर क्यों ?
पल-पल उसकी याद का आना आख़िर क्यों ?
तू दरिया है में क़तर हूँ.किस्मत है,
इस पर यूँ इतराना आख़िर क्यों ?
जिसको देखो वो मसरूफ है अपने में,
रिश्तों का फ़िर ताना बाना आख़िर क्यों ? 


एक खता यानि ख्वाहिश थी जीने की,
पुरी उम्र का जुर्माना आख़िर क्यों ?
मसले उसके शम्सो कमर के होते हैं,
मेरी मशक्कत आबो दाना आख़िर क्यों ?

- पवन कुमार  (IAS)



एक बानगी

हर पल आँख चुराना आख़िर क्यों?
दुश्मन के घर आना जाना आख़िर क्यों?
मेरे उसके जुर्म में कोई फर्क नही,
फ़िर मुझ पर इतना जुर्माना आख़िर क्यों ?
छोटे घर की बेटी दबकर रहती है,
  ढूंढ रहा वो बड़ा घराना आख़िर क्यों ?
मुठ्ठी में जो बंद किए है सूरज को,
उसको जुगनू से बहलाना आख़िर क्यों ?
मुझको तो हर पल पीने की आदत है,
उसकी आखों में मयखाना आख़िर क्यों ?
छोटे तबके वाले भी तो इंसां हैं,
महफिल में उनसे कतराना आख़िर क्यों ?
''अनवर''तेरी गज़लों के सब दीवाने
तू गालिब का दीवाना आख़िर क्यों ?


- फ़साहत अनवर

गुरुवार, 24 सितंबर 2009

रमेश के कांसे ने विश्व कुश्ती में रचा इतिहास - 42 साल बाद भारत को पहला पदक दिलाया



भारतीय पहलवान रमेश कुमार ने डेनमार्क के हेरनिंग में चल रही विश्व कुश्ती चैंपियनशिप के 74 किलो फ्री स्टाइल वर्ग में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया। बीजिंग ओलंपिक में सुशील कुमार के कांस्य पदक के बाद कुश्ती में किसी बड़ी प्रतियोगिता में भारत का यह पहला पदक है।
हरियाणा के सोनीपत के पास छोटे से गांव पुरखास के इस पहलवान ने वह कर दिखाया जो ओलंपिक कांस्य पदक विजेता पहलवान सुशील कुमार यहां नहीं कर सके। उन्होंने इस प्रतिष्ठित स्पर्धा में 42 साल बाद भारत को पहला पदक दिलाया। विश्व कुश्ती के इतिहास में भारत का यह केवल चौथा पदक है। इससे पहले 1967 में नई दिल्ली में हुई प्रतियोगिता में विशंबर ने रजत और 1961 में जापान में आयोजित प्रतियोगिता में उदय चंद ने कांस्य और महिला वर्ग में अलका तोमर में 2006 में चीन में कांस्य पदक जीता था।
रमेश ने मोलडोवा के अलेक्जेंडर बर्का को तकनीकी अंकों के आधार पर हराया। रेपेचेज राउंड के बाद स्कोर 7-7 से बराबर था। रमेश ने निराशाजनक शुरुआत की और 0-3 से पिछड़ गए। दूसरे सत्र में शानदार वापसी करते हुए उसने दो अंक बनाए और आखिरी सत्र में पांच अंक लेकर जीत दर्ज की। इससे पहले रमेश ने अमेरिका के डस्टिन श्लाटेर को 3-2 से हराया था। ब्रिटेन के माइकल ग्रंडी को 4-2 और बुल्गारिया के किरिल तेर्जिव को 7-4 से हराकर वह सेमीफाइनल में पहुंचे थे।
पिछले नौ साल से उत्तर रेलवे में कार्यरत रमेश के कोच और कुश्ती के सरकारी पर्यवेक्षक नरेश कुमार ने बताया कि एक ही दिन में फाइनल तक के मुकाबले होने से हमारे पहलवानों को नुकसान उठाना पड़ा है और यही मुकाबला पहले की तरह दो या दिन तक चलता तो रमेश के रजत या स्वर्ण जीतने के ज्यादा मौके होते। नरेश ने कहा कि हम इस मामले को अंतरराष्ट्रीय कुश्ती महासंघ तक ले जाएंगे क्योंकि एक वजन वर्ग के फाइनल तक के मुकाबले एक ही दिन होने से पहलवानों को विश्राम या अपनी रणनीति तय करने का मौका नहीं मिल पाता है। यही मुकाबला अगर मुक्केबाजी की तरह दो या तक चले तो हमारे पहलवानों को ज्यादा लाभ हो सकता है।
सेमीफाइनल में अजरबैजान के चामसुलवारा सी के हाथों 0-5 से हारकर हालांकि वह स्वर्ण पदक की दौड़ से बाहर हो गए। इस वर्ग में स्वर्ण पदक रूस के डेनिस टी ने जीता। इससे पहले ओलंपिक कांस्य पदक विजेता सुशील कुमार वह कारनामा करने से चूक गए जो विश्व मुक्केबाजी में विजेंदर सिंह ने कर दिखाया। सुशील को 66 किलो फ्रीस्टाइल के कांस्य पदक प्ले आफ मैच में पराजय का सामना करना पड़ा।

मैनपुरी के सभी खेल प्रेमियों की ओर से पहलवान रमेश कुमार को 'इतिहास' रचने की बहुत बहुत बधाई |

महान अंतरिक्ष वैज्ञानिक थे सतीश धवन (25/09/1920 - 03/01/2002)



देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम को नई ऊंचाई पर पहुंचाने में अहम भूमिका निभाने वाले महान वैज्ञानिक प्रो. सतीश धवन एक बेहतरीन इंसान और कुशल शिक्षक भी थे, जिन्हें भारतीय प्रतिभाओं पर अपार भरोसा था।
भारतीय प्रतिभाओं में उनके विश्वास को देखते हुए उनके साथ काम करने वाले लोगों तथा उनके छात्रों ने कठिन मेहनत की ताकि उनकी धारणा की पुष्टि हो सके। सतीश धवन को विक्रम साराभाई के बाद देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम की जिम्मेदारी सौंपी गई था और वह इसरो के अध्यक्ष नियुक्त किए गए।
विक्रम साराभाई ने ऐसे भारत की परिकल्पना की थी जो उपग्रहों के निर्माण एवं प्रक्षेपण में सक्षम हो और नई प्रौद्योगिकी सहित अंतरिक्ष कार्यक्रम का पूरा फायदा उठा सके। सतीश धवन ने न सिर्फ उनकी परिकल्पना को साकार किया बल्कि भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम को नई ऊंचाई देते हुए भारत को दुनिया के गिनेचुने देशों की सूची में शामिल कर दिया। वह एक बेहतरीन इंसान भी थे जिन्होंने कई लोगों को बेहतर प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित किया।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान कार्यक्रम [इसरो] की वेबसाइट के अनुसार राकेट वैज्ञानिक सतीश धवन ने संस्था के अध्यक्ष के रूप में अपूर्व योगदान किया और उनके प्रयासों से भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम में असाधारण प्रगति हुई तथा कई बेहतरीन उपलब्धियां हासिल हुई। वेबसाइट के अनुसार अंतरिक्ष कार्यक्रम के प्रमुख रहने के दौरान ही उन्होंने 'बाउंड्री लेयर रिसर्च' की दिशा में अहम योगदान किया, जिसका जिक्र दर्पन स्लिचटिंग की पुस्तक 'बाउंड्री लेयर थ्योरी' में किया गया है। सतीश धवन इंडियन इंस्टीट्यूट आफ साइंस, बेंगलूर के लोकप्रिय प्राध्यापक थे और उन्हें इस संस्थान में पहला सुपरसोनिक विंड टनेल स्थापित करने का श्रेय है। उनके प्रयासों से संचार उपग्रह इंसैट, दूरसंवेदी उपग्रह आईआरएस और ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान पीएसएलवी का सपना साकार हो सका और भारत चुनिंदा देशों की कतार में शामिल हो गया।
श्रीनगर में 25 सितंबर 1920 को जन्मे सतीश धवन ने इंडियन इंस्टीट्यूट आफ साइंस में कई सकारात्मक बदलाव किए। उन्होंने संस्थान में अपने देश के अलावा विदेशों से भी युवा प्रतिभाशाली फैकल्टी सदस्यों को शामिल किया। उन्होंने कई नए विभाग भी शुरू किए और छात्रों को विविध क्षेत्रों में शोध के लिए प्रेरित किया। तीन जनवरी 2002 को उनके निधन के बाद श्रीहरिकोटा स्थित उपग्रह प्रक्षेपण केंद्र का नाम बदलकर प्रो. सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र कर दिया गया। उनके निधन पर तत्कालीन राष्ट्रपति के आर नारायणन ने शोक व्यक्त करते हुए कहा था कि भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के शानदार विकास और उसकी ऊंचाई का काफी श्रेय प्रो. सतीश धवन के दूरदृष्टिपूर्ण नेतृत्व को जाता है।

भारत के इस महान अंतरिक्ष वैज्ञानिक को सभी मैनपुरी वासीयों की ओर से शत शत नमन |

चांद पर पानी मिलने के प्रमाण



वैज्ञानिकों ने गुरुवार को घोषणा की कि भारत के पहले चंद्र मिशन चंद्रयान-1 ने चांद की सतह पर पानी की मौजूदगी के प्रमाण खोज निकाले हैं। हांलाकि इसकी पुष्टि इसरो ने नहीं की है।
चंद्रयान-1 के साथ भेजे गए नासा के उपकरण 'मून मिनरलोजी मैपर [एम-3]' ने परावर्तित प्रकाश की तरंगदै‌र्ध्य [वेवलेंथ] का पता लगाया जो ऊपरी मिट्टी की पतली परत पर मौजूद सामग्री में हाइड्रोजन और आक्सीजन के बीच रासायनिक संबंध का संकेत देता है।
चंद्रयान-1 द्वारा जुटाए गए विवरण का विश्लेषण कर एम-3 ने चंद्रमा पर पानी के अस्तित्व की पुष्टि कर दी है। इस खोज ने चार दशक से चले आ रहे इन कयासों पर विराम लगा दिया है कि चंद्रमा पर पानी है या नहीं।
वैज्ञानिकों ने पहले दावा किया था कि चंद्रमा पर लगभग 40 साल पहले पानी का अस्तित्व था। यह दावा उन्होंने अपोलो अंतरिक्ष यात्रियों द्वारा स्मृति के रूप में धरती पर लाए गए चंद्र चट्टानों के नमूनों के अध्ययन के बाद किया था, लेकिन उन्हें अपनी इस खोज पर संदेह भी था, क्योंकि जिन बक्सों में चंद्र चट्टानों के अंश लाए गए, उनमें रिसाव हो गया था। इस कारण ये नमूने वातावरण की वायु के संपर्क में आकार प्रदूषित हो गए थे।

इंडियन राम भी हुए 'मेड इन चाइना' के मुरीद


महंगाई के इस जमाने में सस्ता माल मिले तो कौन नहीं लपकना चाहेगा। अब यही काम रामलीला कमेटियां कर रही हैं तो इसमें उनका क्या कसूर। जी हां, चीन आ रहे सस्ते माल ने राम, रावण और सीता का कलेवर बदल दिया है। उनकी पोशाक से लेकर तीर-धनुष और तूणीर तक पर 'मेड इन चाइना' की मुहर आसानी से देखी जा सकती है।
कमेटी के संचालक भी खुश है कि एक तो सस्ता माल, ऊपर से कलाकारों पर चीन में बनी ड्रेस फबती भी खूब है। यही नहीं, हिंदुस्तानी माल के मुकाबले टिकाऊ भी है।
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सटे गोंडा में रामलीला कमेटी चलाने वाले पंडित राम कुमार कहते हैं, 'इस बार रामलीला के पात्रों की पोशाक विदेशों खासकर चीन से आयात की गई है।' पहले ये पोशाकें तमिलनाडु के मदुरै और पश्चिम बंगाल के कोलकाता से मंगाई जाती थी। लेकिन अब सब कुछ बदल गया है। चीन से आयातित पोशाक व अन्य साजो-सामान न सिर्फ देखने में आकर्षक हैं, बल्कि सस्ते और टिकाऊ भी हैं।
लखनऊ के अमीनाबाद में श्री गोपाल चित्रशाला के मालिक प्रेम कुमार ने भी बताया कि चीन से आए साजो-सामान इस बार ज्यादा पसंद किए गए। पिछले तीस साल से पोशाक और अन्य साजो-सामान किराए पर दे रहे प्रेम बताते हैं, 'पहले रामलीला में इस्तेमाल होने वाला सारा सामान पड़ोसी राज्यों से आता था, लेकिन अब तो चीनी माल का बोलबाला है। इससे हमारा बिजनेस भी बढ़ गया है।' संगम चित्रशाला के मालिक मुन्ना लाल भी प्रेम कुमार की बातों पर मुहर लगाते नजर आते हैं। वे कहते हैं, 'पहले तो साजो-सामान आता था वह काफी भारी-भरकम होता था, जबकि चीन से आयातित माल काफी हल्का है। इसके अलावा चीनी सामानों में ज्यादा चमक-दमक भी है।'
रामलीला के बाद उसके पात्रों की पोशाक, मुखौटा, तीर, धनुष, गदा और तलवार का क्या होता है, यह पूछे जाने पर मुन्ना कहते हैं कि उनका इस्तेमाल स्कूलों और थियेटर समूहों द्वारा किया जाता है।

नए वर्ष में खत्म होगा मोबाइल नंबर बदलने का झंझट



अगर आप अपने मोबाइल सेवा देने वाली कंपनी से खुश नहीं है तो फिर नए वर्ष में इसे बदलने के लिए तैयार हो जाइए। नए वर्ष में इसलिए, क्योंकि तब आपको पुराने नंबर के बदलने का डर नहीं रहेगा। 31 दिसंबर, 2009 के बाद से आप चाहे जिस भी कंपनी का मोबाइल कनेक्शन लें, आपका नंबर आपके साथ ही रहेगा।
बुधवार को दूरसंचार नियामक प्राधिकरण [ट्राई] ने मोबाइल नंबर पोर्टबिलिटी [एमएनपी] को लागू करने संबंधी निर्णायक दिशानिर्देश जारी कर दिए।
इसके मुताबिक मेट्रो और 'ए' वर्ग के शहरों में 31 दिसंबर, 2009 से नंबर पोर्टबिलिटी की सुविधा मोबाइल सेवा कंपनियों को देनी होगी। देश के अन्य हिस्से में यह सुविधा 20 मार्च, 2010 से लागू होगी। माना जा रहा है कि इस सुविधा के लागू होने के बाद मोबाइल कंपनियों के बीच बेहतर सेवा देने को लेकर प्रतिस्पद्र्धा बढ़ेगी। ग्राहक खोने के भय से मोबाइल आपरेटर अपनी सेवा की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए बाध्य होंगी। हालांकि इस सेवा के लिए ग्राहकों को कुछ फीस भी देनी पड़ सकती है।
एमएनपी लागू होने के बाद अगर एयरटेल की सेवा लेने वाला ग्राहक किसी कारणवश वोडाफोन या रिलायंस की सेवा लेने का फैसला करता है, तब भी उसका एयरटेल वाला नंबर ही काम करता रहेगा। ट्राई के निर्देशों के मुताबिक यह सेवा एक ही लाइसेंस प्राप्त क्षेत्र में उपलब्ध होगी। इसका मतलब यह हुआ कि दिल्ली का ग्राहक यह चाहे कि यहां का नंबर मुंबई में भी काम करने लगे तो यह संभव नहीं होगा। साथ ही एक नंबर को तीन महीने [90 दिनों] तक इस्तेमाल के बाद ही पोर्टबिलिटी के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा। मतलब यह कि एक कंपनी का कनेक्शन कम से कम तीन महीने तो रखना ही पड़ेगा।
इस सुविधा के लिए ग्राहकों से लिए जाने वाले शुल्क का निर्धारण मोबाइल कंपनियां ही करेंगी। टेलीकाम नियामक के मुताबिक ग्राहकों को एमएनपी की सुविधा लेने के लिए नए मोबाइल सेवा प्रदाता के पास आवेदन करना पड़ेगा। साथ ही उसे मौजूदा मोबाइल फोन सेवा कंपनी के बकाए बिल का भुगतान करना होगा। अगर वह ऐसा नहीं करता है तो कंपनी को नंबर काटने का अधिकार होगा। नंबर पोर्टबिलिटी का आवेदन करने के 24 घंटे के भीतर ही इसे वापस लिया जा सकेगा, लेकिन पोर्टबिलिटी फीस वापस नहीं की जाएगी। ग्राहकों को इस सेवा को प्रदान करने में कंपनियां अधिकतम चार दिनों का समय ले सकती हैं। जम्मू व कश्मीर, असम और पूर्वोत्तार के राज्यों में कंपनियों को ज्यादा समय दिया जाएगा।

बुधवार, 23 सितंबर 2009

अब तीखी मिर्च से बनेंगे ग्रेनेड

मिर्ची खाने वाले इस बात से बखूबी वाकिफ हैं कि मिर्च तीखी हो तो कान से धुंआ बनकर निकलती है, लेकिन क्या आपने कभी चिली ग्रेनेड के बारे में सुना है। देश के रक्षा वैज्ञानिक अब तीखी मिर्च से ग्रेनेड बनाने की तैयारी कर रहे हैं।
असम के तेजपुर स्थित डिफेंस रिसर्च लेबोरेटरी [डीआरएल] ने अनुसंधान के बाद निष्कर्ष निकाला है कि दुनिया की सबसे तीखी मिर्च 'भूत जोलोकिया ' को ग्रेनेड में तब्दील किया जा सकता है और यह घातक भी नहीं होगा। भारतीय मिर्च की एक तेजतर्रार किस्म भूत जोलोकिया को नागा मिर्च भी कहा जाता है। यह अमेरिका को निर्यात की जाती है। यह वहां के लोगों के भोजन का एक प्रमुख हिस्सा है।
वर्ष 2007 में गिनीज बुक ऑफ व‌र्ल्ड रिकार्ड ने भूत जोलोकिया को सर्वाधिक तीखी मिर्च घोषित किया था। इस मिर्च का करिश्मा यहीं तक नहीं है। डीआरएल के वैज्ञानिकों का कहना है कि इसका पाउडर तैयार कर, उसे जानवरों को दूर भगाने में इस्तेमाल किया जा सकता है।
डीआरएल के वैज्ञानिक तीखे स्वाद वाली इस मिर्च से ग्रेनेड बनाने की कोशिश में हैं। भीड़ को तितर-बितर करने और अन्य उद्देश्यों के लिए पुलिस और सेना इस ग्रेनेड का इस्तेमाल कर सकते हैं। डीआरएल के वैज्ञानिक आर पी श्रीवास्तव ने बताया कि 'चिली ग्रेनेड' की सबसे बड़ी खासियत यह होगी कि यह घातक प्रकृति का नहीं होगा। उन्होंने बताया कि भीड़ को नियंत्रित करना हो या चरमपंथियों को उनके ठिकाने से बाहर निकालना हो, चिली ग्रेनेड लक्ष्य को भौतिक रूप से कोई नुकसान पहुंचाए बिना, अपना काम कर लेगा।
डीआरडीओ और विश्व वन्यजीव कोष भी मिर्च से ऐसा पाउडर तैयार करने के लिए प्रयासरत हैं, जिसे जंगली हाथियों को दूर भगाने के लिए रस्सियों और बाड़ पर लगाया जा सके। पूर्वोत्तर के कई हिस्सों में जंगली हाथी तबाही मचाते हैं।
इस सिलसिले में एक प्रायोगिक परियोजना पर काम चल रहा है। इसके लिए मजबूत वनस्पति रेशों से जूट की बाड़ तैयार कर उस पर भूत जोलोकिया का पाउडर छिड़क दिया गया ताकि जंगली हाथी इसके करीब न आ सकें। हाथियों को पास न फटकने देने के लिए इस मिर्च के इस्तेमाल से कुछ और प्रयोग भी किए गए जो सफल रहे हैं। अब असम सरकार मिर्च की खेती को बढ़ावा देने के लिए एक परियोजना पर काम कर रही है। भूत जोलोकिया मिर्च नगालैंड और असम की खासियत है।
राज्य के कृषि विभाग ने अपने वानिकी एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग को चयनित इलाकों में मिर्च की इस किस्म का उत्पादन करने का निर्देश दिया है। कृषि मंत्री प्रमिला रानी ब्रह्म ने बताया कि शुरू में मिर्च की खेती के लिए दो जिलों गोलाघाट और बक्सा को चुना गया है। उन्होंने बताया कि फिलहाल 300 हेक्टेयर भूमि में इस मिर्च की खेती की जाएगी जिससे अच्छा राजस्व मिलने की संभावना है।
भोजन में मसाले के तौर पर इस्तेमाल की जाने वाली मिर्च पेट की बीमारियां दूर करने में मददगार होती है। इसे हृदयघात के लिए भी अच्छा इलाज माना जाता है।

जय हो - ओशनसैट-2 का सफल प्रक्षेपण, कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित

भारत ने अपने 16वें दूर-संवेदी उपग्रह ओशनसैट-2 और अन्य छह छोटे यूरोपीय उपग्रहों को बुधवार को 11.51 बजे धु्रवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान [पीएसएलवी-14] की सहायता से सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन [इसरो] का भरोसेमंद स्वदेशी राकेट पीएसएलवी [पोलर सेटेलाइट लांच व्हीकल] बुधवार दोपहर 11:51 बजे ओशनसेट को लेकर रवाना हुआ। यह राकेट अपने साथ सात उपग्रहों को एक साथ लेकर रवाना हुआ है जिस में, हिंद महासागर में होने वाली हलचलों पर नजर रखने के लिए भारतीय उपग्रह ओशनसैट-2 भी अपने मिशन पर रवाना हुआ है ।

ओशनसैट-2 सहित सात उपग्रहों के प्रक्षेपण के 20 मिनट के अंदर इन्हें कक्षा में सफलता पूर्वक स्थापित कर दिया गया। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने छह यूरोपीय नैनो सेटेलाइट के साथ ओशनसेट-2 के सफल प्रक्षेपण के लिए इसरो के दल को बधाई दी।
इसरो के अध्यक्ष जी. माधवन नायर ने छह नैनो सेटेलाइट के साथ ओशनसैट-2 के प्रक्षेपण को शानदार उपलब्धि करार दिया। 51 घंटे की उल्टी गिनती के बाद 44.4 मीटर लंबे और चार चरण वाले अंतरिक्षयान पीएसएलवी सी सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से अंतरिक्ष के अपने सफर पर रवाना हुआ। उसने एक के बाद एक सभी उपग्रह कक्षा में स्थापित कर दिए।

आसमान साफ था और बुधवार सुबह 11 बज कर 51 मिनट पर जैसे ही पीएसएलवी ने आन बान के साथ आकाश का रुख किया वैज्ञानिकों में हर्षोल्लास की लहर दौड़ गई। उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी इस ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बनने के लिए वहां मौजूद थे।
ओशनसैट-2 देश का 16वां दूरसंवेदी उपग्रह है और यह मछली पकड़ने के संभावित क्षेत्रों की पहचान करने के साथ ही समुद्र की स्थिति की भविष्यवाणी करेगा और तटीय क्षेत्रों के अध्ययन में मदद करेगा। यह मौसम की भविष्यवाणी और जलवायु अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण सूचनाएं देगा। सफल प्रक्षेपण के तुरंत बाद अभियान केंद्र में मौजूद अंसारी और वरिष्ठ वैज्ञानिक एम जी के मेनन ने इसरो के वैज्ञानिकों को बधाई दी। इसरो अध्यक्ष जी माधवन नायर ने वैज्ञानिकों को संबोधित करते हुए इसे एक आदर्श और सटीक प्रक्षेपण बताया।
नायर ने इस शानदार उपलब्धि के लिए वैज्ञानिकों को मुबारकबाद देते हुए कहा इस प्रक्षेपण ने एक बार फिर हमारी क्षमता साबित कर दी है। यह समूहकार्य की एक शानदार मिसाल है साथ ही पीएसएलवी प्रक्षेपणयान की परिपक्वता साबित हो गई है।
इशरो के अध्यक्ष नायर ने कहा यह एक शानदार उपलब्धि है। हमने एक बार फिर साबित कर दिया है कि हम सटीक तरीके से काम कर सकते हैं। यह बात उन्होंने इसरो के राकेट पीएसएलवी द्वारा 20 मिनट की अवधि में सात उपग्रहों को कक्षा में स्थापित करने के चंद मिनट बाद कही।
उन्होंने कहा कि अभियान की सफलता पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की सराहना की है। प्रक्षेपण वाहन के प्रभारी वरिष्ठ अंतरिक्ष वैज्ञानिक जार्ज कोशी ने कहा कि जब भी हमारे समक्ष कठिनाई आती है, इसरो और मजबूत बनकर उभरता है।
इसरो के टेलीमेट्री, ट्रेकिंग और कमांड नेटवर्क निदेशक एस. के. शिवकुमार ने कहा कि मारिशस स्थित कमांड सेंटर ने प्रक्षेपण वाहन से अलग होते ही ओशनसेट-2 से निकलने वाले सिग्नलों को पकड़ा।
विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र के निदेशक के राधाकृष्णन ने कहा कि सात उपग्रहों के सफल प्रक्षेपण ने पीएसएलवी की परिपक्वता को एक बार भी साबित किया है। उन्होंने कहा कि यह पीएसएलवी का लगातार 15वां सफल प्रक्षेपण था।

मंगलवार, 22 सितंबर 2009

कलकत्ता की दुर्गा पूजा


मेरी पैदाइश और परवरिश दोनों कलकत्ता की है ! १९९७ में कलकात्ता छोड़ कर मैं मैनपुरी आया और तब से यहाँ का हो कर रह गया हूँ ! आज भी अकेले में कलकत्ता की यादो में खो सा जाता हूँ | कलकत्ता बहुत याद आता है , खास कर दुर्गा पूजा के मौके पर, इस लिए सोचा आज आप को अपने कलकत्ता या यह कहे कि बंगाल की दुर्गा पूजा के बारे में कुछ बताया जाये !

यूँ तो महाराष्ट्र की गणेश पूजा पूरे विश्व में मशहूर है, पर बंगाल में दुर्गापूजा के अवसर पर गणेश जी की पत्नी की भी पूजा की जाती है।

जानिए और क्या खास है यहां की पूजा में।

[षष्ठी के दिन]




मां दुर्गा का पंडाल सज चुका है। धाक, धुनुचि और शियूली के फूलों से मां की पूजा की जा रही है। षष्ठी के दिन भक्तगण पूरे हर्षोल्लास के साथ मां दुर्गा की प्राण प्रतिष्ठा करते हैं। यह दुर्गापूजा का बोधन, यानी शुरुआत है। इसी दिन माता के मुख का आवरण हटाया जाता है।

[कोलाबोऊ की पूजा]

सप्तमी के दिन दुर्गा के पुत्र गणेश और उनकी पत्नी की विशेष पूजा होती है। एक केले के स्तंभ को लाल बॉर्डर वाली नई सफेद साड़ी से सजाकर उसे उनकी पत्नी का रूप दिया जाता है, जिसे कोलाबोऊ कहते हैं। उन्हें गणेश की मूर्ति के बगल में स्थापित कर पूजा की जाती है। साथ ही, दुर्गा पूजा के अवसर एक हवन कुंड बनाया जाता है, जिसमें धान, केला आम, पीपल, अशोक, कच्चू, बेल आदि की लकडि़यों से हवन किया जाता है। इस दिन दुर्गा के महासरस्वती रूप की पूजा होती है।
 
[108 कमल से पूजा]

माना जाता है कि अष्टमी के दिन देवी ने महिषासुर का वध किया था, इसलिए इस दिन विशेष पूजा की जाती है। 108 कमल के फूलों से देवी की पूजा की जाती है। साथ ही, देवी की मूर्ति के सामने कुम्हरा (लौकी-परिवार की सब्जी) खीरा और केले को असुर का प्रतीक मानकर बलि दी जाती है। संपत्ति और सौभाग्य की प्रतीक महालक्ष्मी के रूप में देवी की पूजा की जाती है।
 
[संधि पूजा]

अष्टमी तिथि के अंतिम 24 मिनट और नवमी तिथि शुरू होने के 24 मिनट, यानी कुल 48 मिनट के दौरान संधि पूजा की जाती है। 108 दीयों से देवी की पूजा की जाती है और नवमी भोग चढ़ाया जाता है। इस दिन देवी के चामुंडा रूप की पूजा की जाती है। माना जाता है कि इसी दिन चंड-मुंड असुरों का विनाश करने के लिए उन्होंने यह रूप धारण किया था।

[सिंदूर खेला व कोलाकुली]


दशमी पूजा के बाद मां की मूर्ति का विसर्जन होता है। श्रद्धालु मानते हैं कि मां पांच दिनों के लिए अपने बच्चों, गणेश और कार्तिकेय के साथ अपने मायके, यानी धरती पर आती हैं और फिर अपनी ससुराल, यानी कैलाश पर्वत चली जाती हैं। विसर्जन से पहले विवाहित महिलाएं मां की आरती उतारती हैं, उनके हाथ में पान के पत्ते डालती हैं, उनकी प्रतिमा के मुख से मिठाइयां लगाती हैं और आंखों (आंसू पोंछने की तरह) को पोंछती हैं। इसे दुर्गा बरन कहते हैं। अंत में विवाहित महिलाएं मां के माथे पर सिंदूर लगाती हैं। फिर आपस में एक-दूसरे के माथे से सिंदूर लगाती हैं और सभी लोगों को मिठाइयां खिलाई और बांटी जाती है। इसे सिंदूर खेला कहते हैं। वहीं, पुरुष एक-दूसरे के गले मिलते हैं, जिसे कोलाकुली कहते हैं। यहाँ सब एक दुसरे को विजय दशमी की बधाई  'शुभो बिजोया' कह कर देते है | यहाँ एक दुसरे को रसगुल्लों से भरी हंडी भेंट करना का भी प्रचालन है |


 
[मां की सवारी]

वैसे तो हम सब जानते है की माँ दुर्गा सिंह की सवारी करती हैं, पर बंगाल में पूजा से पहेले और बाद में  माँ की सवारी की चर्चा भी जोरो से होती है | यह माना जाता है कि यह उनकी एक अतरिक्त सवारी है जिस पर वो सिंह समेत सवार होती हैं | 
इस वर्ष देवी दुर्गा घोड़े पर सवार होकर आ रही हैं और भैंसे की सवारी कर लौटेंगी। घोड़े की सवारी से युद्ध, रक्तपात होने की संभावना जताई जा रही है। साथ ही, भैंसे को यमराज की सवारी माना जाता है, इसलिए देवी का जाना भी शुभ फलदायक नहीं माना जा रहा है।



सोमवार, 21 सितंबर 2009

बीमा दावा पर एनसीसी का अहम फैसला


राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग [एनसीसी] ने कहा है कि लड़ाई झगड़े में मारे गए किसी पालिसी धारक की आपराधिक पृष्ठभूमि के कारण कोई जीवन बीमा कंपनी नामिनी के दावा खारिज नहीं कर सकती। जब तक कि यह साबित न हो जाए कि लड़ाई मृतक ने शुरू की थी।
लाइफ इंश्योरेंस कंपनी [एलआईसी] ने 1990 में मारे गए गुलबीर सिंह के एक नामिनी के दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि मृतक ने अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि छिपाई थी, जो पालिसी के नियमों के खिलाफ है।
न्यायमूर्ति अशोक भान की अध्यक्षता वाले सर्वोच्च उपभोक्ता निकाय ने कहा कि एलआईसी दावा उसी स्थिति में खारिज कर सकती है, जब साबित हो जाए कि पालिसीधारी ने ही झगड़े की शुरुआत की थी और उसमें मारा गया। एक पूर्व के फैसले पर ध्यान दिलाते हुए फैसले में कहा गया है कि यहां तक कि पालिसीधारी की पृष्ठभूमि आपराधिक होने के मामले में भी यह मानना कठिन है कि हत्या दुर्घटनावश नहीं हुई है, जब तक कि लड़ाई उसने शुरू न की हो।'
सिंह ने फरवरी, 1990 में एलआईसी की तीन पालिसी ली थीं। पालिसीधारी के मारे जाने के बाद यह बात सामने आई कि उसके खिलाफ कई आपराधिक मामले लंबित थे। इस आधार पर एलआईसी ने दावा खारिज कर दिया। आयोग ने स्पष्ट कहा कि पालिसीधारी ने मांगी गई पूरी जानकारी एलआईसी को दी थी, इसलिए उस पर कोई उत्तरदायित्व नहीं बचता।

हम भी कुछ कम नहीं - अब ब्लॉगर भी बना सकते है सिक्स पैक एब्स



समीर भाई, 
इन खान बंधुयो ने कोई ठेका थोड़े ही है ले रखा है सिक्स पैक एब्स बनाने का ?? लीजिये, अब आप और मेरे जैसे लोग भी सिक्स पैक एब्स का आनंद ले सकते है | 

बस आगे पढ़ते जाईये :-

 हिंदी फिल्मों के दो सुपर स्टार शाहरुख और आमिर खान ने अपनी फिल्मों के लिए सिक्स पैक एब्स क्या बनाए, पूरे देश के युवाओं में इसकी जबरदस्त क्रेज हो गई। उन्होंने ऐसा शरीर पाने के लिए भले ही जिम में घंटों पसीना बहाया हो, रीयल लाइफ में खान-पान को थोड़ा सा व्यवस्थित करके ऐसा शरीर बनाया जा सकता है।
ब्राजील के शोधकर्ताओं का कहना है कि अच्छा स्वास्थ्य और बाडी जिम जाने से नहीं बल्कि संतुलित और पौष्टिक भोजन से मिलता है। उनका तो दावा है कि ऐसा करके अधिक वजन की समस्या से भी छुटकारा पाया जा सकता है। हालांकि सेहतमंद बने रहने में व्यायाम की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता।
 
दिन में छह बार भोजन करें :

जल्दी-जल्दी में हम अक्सर नाश्ता या दिन का लंच मिस कर देते हैं। और जब भूख लगती है तो जो कुछ भी मिल जाए, उसे ही खा लेते हैं। जैसे समोसा, चिप्स या जंक फूड। शोधकर्ताओं की सलाह है कि नाश्ता 8 बजे, 11 बजे के आसपास स्नैक्स वगैरह, एक बजे दिन का भोजन और शाम चार बजे चाय के साथ हल्का स्नैक्स लिया जा सकता है। ठीक दो घंटे बाद 6 बजे के करीब रात का भोजन कर लें। रात में 9 बजे फिर हल्का नाश्ता।
 
चुनिंदा भोजन से लगाव छोड़ें :

आमतौर पर घर में बच्चों के लिए कई व्यंजनों पर प्रतिबंध रहता है। ऐसे में आगे चलकर उनकी रुचि कई भोजनों से हटती जाती है। अभिभावकों को सलाह है कि वे अपने बच्चों को शुरू से ही बादाम, बींस, साग, दूध और इससे बनी चीजें, जौ का आटा, अंडे, मक्खन, जैतून का तेल आदि के प्रति रुचि जगाएं।
 
ज्यादा से ज्यादा पेय पदार्थ :

पानी के अलावा मौसमी फल खूब खाएं। दूध से आपको जरूरी कैलोरी और कार्बोहाइड्रेट मिलता है। बेहतर होगा भोजन के अंतराल में इनका ज्यादा से ज्यादा सेवन करें। संतुलित मात्रा में काफी और चाय भी फायदेमंद है। इसके अलावा खाने में ज्यादा से ज्यादा मात्रा में रेशेदार खाद्य पदार्थो को शामिल करें।

बोल कलावती, तेरे मन में क्या है ??



कांग्रेस के युवराज ने जिस कलावती की दयनीय हालत की चर्चा संसद में कर उसे राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में ला दिया था, वही कलावती अब कांग्रेस के खिलाफ खड़ी है। कलावती महाराष्ट्र की वानी विधानसभा सीट से पर्चा दाखिल करने जा रही है।
रिपब्लिकन लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट [आरएलडीएफ] ने रविवार को कलावती के समर्थन के साथ चुनाव प्रचार के लिए उसे पांच लाख रुपये देने का भी ऐलान किया।
आरएलडीएफ के नेताओं ने विदर्भ के एक किसान की विधवा कलावती बांडुरकर से मुलाकात कर यवतमाल जिले की इस सीट से लड़ने के लिए चुनावी रणनीति पर चर्चा की। बाद में मोर्चे में शामिल पीडब्ल्यूपी के नेता जयंत पाटिल ने इस फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि कलावती किसानों के परिजनों की तकलीफों की प्रतीक है।
रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया [आरपीआई] के नेता रामदास अठावले और पाटिल ने यहां एक संवाददाता सम्मेलन में कांग्रेस पर किसानों से झूठे वादे करने का आरोप लगाया। इन नेताओं ने कहा, 'विदर्भ के दौरे पर कांग्रेस महासचिव राहुल गाधी कलावती से उसके घर पर मिले थे और लोकसभा में अपने भाषण के जरिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान उसकी ओर खींचा था। लेकिन, जब वह वादे के मुताबिक राहुल से मदद मांगने दिल्ली गई तो उसे भगा दिया गया। यह दिखाता है कि कांग्रेस का नजरिया क्या है।' पाटिल ने बताया कि उनकी पार्टी कलावती को चुनाव प्रचार के लिए पांच लाख रुपये देगी।
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राहुल बाबा रचित 'कलावती प्रेम' की 'सत्यता' के बारे में जरूर पढ़े  :-  

कलावती को भूले राहुल लाला ....पर क्यों भला ???


रविवार, 20 सितंबर 2009

आतंकियों के आका - परवेज मुशर्रफ


परवेज मुशर्रफ पाकिस्तान के राष्ट्रपति और सेनाध्यक्ष ही नहीं रहे हैं, बल्कि वह आतंकियों के आका भी रहे हैं। यहां तक कि एक भारतीय सेना के अधिकारी का गला रेतने वाले आतंकी को उन्होंने एक लाख रुपये के इनाम से नवाजा था। यह साल 2000 की बात है। लेकिन अगले ही साल अमेरिका में हुए आतंकी हमले के बाद उन्हें अमेरिकी दबाव के चलते अपने इस पसंदीदा आतंकी के संगठन पर पाबंदी लगानी पड़ी थी। मुशर्रफ का यह 'आतंकी' चेहरा पाकिस्तान के ही मीडिया ने उजागर किया है।
'द न्यूज' अखबार ने रविवार को बताया है कि मुशर्रफ आतंकी कमांडर इलियास कश्मीरी के काम से इतने खुश हुए कि उन्हें इनाम में एक लाख रुपये बख्श दिए। इलियास 1990 के दशक में जम्मू-कश्मीर में बेहद सक्रिय था। रिपोर्ट के मुताबिक 26 फरवरी, 2000 को कश्मीरी अपने 25 साथियों के साथ नियंत्रण रेखा पार कर भारतीय सीमा में घुसा। वह एक दिन पहले भारतीय सेना की कार्रवाई में 14 आतंकियों की मौत का बदला लेने के लिए गया था। उसने नाकयाल सेक्टर में भारतीय सेना पर घात लगा कर हमला बोल दिया। आतंकियों ने भारतीय सेना के एक बंकर को घेर लिया और ग्रेनेड से हमला किया। इस हमले में घायल एक सैन्य अधिकारी को कश्मीरी ने अगवा कर लिया और बाद में उसने अधिकारी का सिर कलम कर दिया। यही नहीं, उसने अधिकारी का कटा हुआ सिर पाकिस्तान सेना के शीर्ष अधिकारियों को पेश किया। इस पर खुश होकर तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ ने पाक सेना के कमांडो रहे कश्मीरी को एक लाख रुपये का इनाम दिया।
अखबार लिखता है कि कश्मीरी से मुशर्रफ को बेहद लगाव था। उन्होंने उसे आतंकी खेल खेलने की खुली छूट दे रखी थी। लेकिन 11 सितंबर, 2001 को अमेरिका में हुए आतंकी हमले के बाद दबाव के चलते मुशर्रफ को कश्मीरी के संगठन पर प्रतिबंध लगाना पड़ा।

कौन था इलियास कश्मीरी ??

कश्मीरी हरकल-उल-जिहाद अल-इस्लामी [हूजी] का कमांडर था। उसके संबंध अल कायदा और तालिबान सहित तमाम आतंकी संगठनों से थे। बताया जाता है कि वह पिछले सप्ताह ड्रोन हमले में मारा गया।
कश्मीरी पाकिस्तानी सेना के स्पेशल सर्विस गु्रप में बतौर कमांडो काम कर चुका था। अफगानिस्तान से रूसी सेना हटने के बाद पाक हुक्मरान ने उसे कश्मीरी आतंकियों के साथ काम करने के लिए भेजा था। तब 1991 में वह हूजी में शामिल हुआ। कुछ दिनों बाद हूजी प्रमुख कारी सैफुल्ला अख्तर से उसके मतभेद हो गए और उसने '313 ब्रिगेड' नाम से अपना संगठन बना लिया।
गुलाम कश्मीर के कोटली का रहने वाला कश्मीरी बारूदी सुरंग बिछाने में माहिर था। अफगानिस्तान में लड़ाई के दौरान उसकी एक आंख खत्म हो गई थी। उसे भारतीय सेना ने एक बार पूंछ इलाके में गिरफ्तार भी किया था। दो साल बाद वह जेल तोड़ कर भाग निकला था। वर्ष 1998 में कश्मीरी को भारतीय सेना पर हमले करने की जिम्मेदारी दी गई थी।
जैश-ए-मुहम्मद के गठन के बाद पाकिस्तानी सेना से कश्मीरी के रिश्ते खराब हो गए। सेना उसे जैश का सदस्य बनाना चाहती थी। सेना की इच्छा थी कि कश्मीरी जैश सरगना मसूद अजहर को नेता मान ले। पर उसे यह गवारा नहीं हुआ।
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अब सवाल यह उठता है कि इस खुलासे के बाद भी क्या भारत में आयोजित विभिन्न सेमिनार्रो में मुशर्रफ को बतौर महेमान बुलाने का सिलसिला जारी रहेगा ??
देखे  :-

बेशरम मुशर्रफ !!!!

शेयर बाजार में जारी रहेगा उतार चढ़ाव


इस सप्ताह शेयर बाजार में भारी उतार-चढ़ाव दर्ज किया जा सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि डेरिवेटिव्ज खंड में सौदों के निपटान से पहले बाजार उतार-चढ़ाव से भरा रहेगा।
बीते सप्ताह के दौरान सेंसेक्स और निफ्टी दोनों ही 16 महीने के उच्चतम स्तर को छू गए और इस अवधि में सेंसेक्स और निफ्टी में करीब तीन-तीन फीसदी तक की तेजी देखने को मिली।
बंबई स्टाक एक्सचेंज का सेंसेक्स 16,820.02 अंक और 16,229.95 अंक के दायरे में घूमने के बाद सप्ताहांत में 477 अंक अथवा 2.93 फीसदी की तेजी के साथ 16,741.30 अंक पर बंद हुआ।
इसी तरह, नेशनल स्टाक एक्सचेंज का निफ्टी 5,003.05 अंक की ऊंचाई को छूने के बाद सप्ताहांत में 146.50 अंक अथवा 3.03 फीसदी की तेजी के साथ 4,976.05 अंक पर बंद हुआ।
बाजार विश्लेषकों का मानना है कि इस सप्ताह बाजार की धारणा मजबूत रहने की संभावना है, भले ही निवेशक घरेलू डेरिवेटिव्ज खंड में सौदे निपटाने से पूर्व सतर्कता का रुख अपनाएं। इस सप्ताह अमेरिकी फेडरल रिजर्व की बैठक भी प्रस्तावित है।
आशिका स्टाक ब्रोकर्स रिसर्च के प्रमुख पारस भोथरा ने कहा कि फ्यूचर एंड आप्शन खंड में सौदों का निपटान होने से बाजार कंसोलिडेशन के चरण में होगा, लेकिन तेजी बरकरार रहने की उम्मीद है।
भोथरा ने कहा कि विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय शेयर बाजार को लेकर काफी उत्साहित हैं और वे घरेलू शेयर बाजारों में निवेश करना जारी रखेंगे। उल्लेखनीय है कि बीते सप्ताह के दौरान एफआईआई ने घरेलू शेयर बाजारों में 5,300 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश किया।
उधर, एसएमसी ग्लोबल के उपाध्यक्ष राजेश जैन का कहना है कि 22-23 सितंबर को प्रस्तावित अमेरिकी फेडरल की बैठक में अमेरिकी अर्थव्यवस्था की स्थिति और वित्तीय नीतियों पर चर्चा की जाएगी। भारतीय बाजारों की इस बैठक पर पैनी नजर होगी।

चीन - तू दोस्त है या रकीब है ??



प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के इस कथन पर यकीन करने के अच्छे-भले आधार हैं कि चीन की ओर से भारतीय सीमा के अतिक्रमण की कथित घटनाओं पर चिंतित होने की जरूरत नहीं। यह अच्छा हुआ कि प्रधानमंत्री के बाद सेना प्रमुख दीपक कपूर ने भी यह विश्वास दिला दिया कि पिछले वर्ष के मुकाबले इस वर्ष ऐसी घटनाओं में कतई इजाफा नहीं हुआ है, लेकिन क्या यह बेहतर नहीं होता कि जब मीडिया का एक हिस्सा अतिक्रमण की घटनाओं को तूल दे रहा था तभी सरकार की ओर से स्थिति स्पष्ट कर दी जाती? भारतीय नेतृत्व को इससे अवगत होना ही चाहिए कि आम जनता चीन के इरादों को लेकर सदैव सशंकित बनी रहती है। इन शंकाओं का निवारण इस तरह की सूचनाओं मात्र से नहीं हो सकता कि भारतीय वायुसेना ने वास्तविक नियंत्रण रेखा से महज 23 किमी अंदर एन-32 विमान उतार दिया। नि:संदेह इस उपलब्धि का अपना एक महत्व है और भारत को अपनी रक्षा तैयारियों के प्रति तत्पर रहना ही चाहिए, लेकिन इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि भारत अपने को आर्थिक एवं सामाजिक रूप से सशक्त करे। चीन के संदर्भ में इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि आर्थिक विकास के मामले में भारत उससे पिछड़ता चला जा रहा है। अब विश्व समुदाय को इसमें कोई संदेह नहीं रह गया कि चीन महाशक्ति के रूप में उभरने ही वाला है। इसके विपरीत भारत अभी महाशक्ति बनने का दावा ही करने में लगा है। वर्तमान में कोई भी यह कहने की स्थिति में नहीं कि भारत वास्तव में महाशक्ति का दर्जा कब तक हासिल कर सकेगा? महाशक्ति और विकसित राष्ट्र बनने के सपने देखना अलग बात है और उन्हें हकीकत में बदलना अलग।
यह सही है कि जब चीन के संदर्भ में हमारी तुलना होती है तो हम खास तौर पर यह उल्लेख कर गर्व का अनुभव करते हैं और करना भी चाहिए कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है और वह भी विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश, लेकिन क्या यह एक तथ्य नहीं कि एक गैर-लोकतांत्रिक देश होते हुए भी विश्व मंचों पर चीन की अहमियत कहीं अधिक है? यह कहना समस्या का सरलीकरण करना और अपनी कमजोरियों को छिपाना ही है कि चीन ने इतनी ताकत इसलिए हासिल कर ली, क्योंकि वह एक कम्युनिस्ट देश है। भारत की असली चिंता का कारण अपनी खामियों को दूर न कर पाना होना चाहिए। हमारे लोकतांत्रिक ढांचे में इतनी अधिक खामियां घर कर गई हैं कि छोटी-छोटी चीजें भी सुधरने का नाम नहीं लेतीं। प्रत्येक स्तर पर व्यवस्था इतनी लचर और पंगु हो गई है कि समस्या के समाधान के उपाय होते हुए भी उनका हल नहीं हो पाता। परिणाम यह है कि देश अपेक्षित प्रगति नहीं कर पा रहा है। वास्तविकता यह है कि अनेक क्षेत्रों में तो वह चीन के मुकाबले कहीं नहीं ठहरता। दुनिया इसे देख और समझ रही है, लेकिन पता नहीं क्यों हमारे नीति-नियंता जानकर भी अनजान बने हुए हैं? मौजूदा परिस्थितियों में चीन से भिड़ंत के कहीं कोई आसार नहीं हैं। हां यदि वह हमसे और आगे निकल गया तो हमारी परेशानियां बढ़नी तय हैं।

कब सचेत होंगे ??

मालिक के लिए जान की बाजी लगा देने वाले सेवक या नौकरों के किस्से अब पुराने हो गए हैं। निष्ठा और वफादारी की परिभाषा भी बदल चुकी है। मालिक कितना दौलतमंद है, उसके घर में कितने सदस्य हैं। किन कमजोर बिंदुओं से फायदा उठाया जा सकता हैं। वारदात करने का कौन सा समय उपयुक्त रहेगा। नौकरों के दिमाग में ये बातें उथल-पुथल मचाती रहती हैं। वारदातों की जांच में निकले तथ्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है। उद्योगपतियों और बड़े अधिकारियों के घरों में नौकरों द्वारा वारदात करने की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता। देश की राजधानी में ऐसी कई वारदात हो चुकी हैं और बाकी देश  भी इनसे अछूता नहीं है। नौकर रखने के प्रति जनता को सतर्कता बरतने की अपील करने वाली पुलिस का एक अधिकारी का परिवार स्वयं चूक कर बैठा। रेवाड़ी में तैनात एसपी यमुनानगर के आवास में नियुक्त नौकर उनकी पत्नी और बेटे को बेहोश करके कीमती सामान चुराकर ले गया।

अधिकतर मामलों में यही हो रहा है कि बिना जांच के रखे गए नौकर से जान-माल का खतरा बना रहता है। नौकर को रखते समय जिस चौकसी की अपेक्षा की जाती है, वह बरती नहीं जा रही है। उसका पूरा नाम, पता, पृष्ठभूमि और चरित्र की जानकारी जुटा कर फोटो सहित इसको नजदीकी थाने में जमा करवाना चाहिए। वह पहले कहां काम करता था और वहां से उसने नौकरी क्यों छोड़ दी। इसकी छानबीन भी जरूरी है। कई परिवार अनजान नौकर पर विश्वास कर लेते हैं और पूरे घर को उसी के भरोसे छोड़ देते हैं। घर के बुजुर्गो और बच्चों को नौकर के भरोसे छोड़ कर शहर से बाहर जाना खतरे से खाली नहीं होता। घर में इन सदस्यों को देखकर नौकर की कभी भी नीयत बदल सकती है। मौका मिलते ही वे उन्हें क्षति पहुंचाकर घर का कीमती सामान लेकर चंपत हो जाते हैं। दुष्कर्म और हत्या के कई मामलों में घर का नौकर ही लिप्त पाया गया है। कुछ नौकर चालाकी दिखाते हुए स्वयं वारदात नहीं करते बल्कि किसी गिरोह के माध्यम से इसे अंजाम देते हैं। इन घटनाओं के बावजूद लोग सचेत नहीं हो रहे हैं। चाहे प्लेसमेंट एजेंसियों के माध्यम से ही नौकर क्यों न आए हों, पूरी तहकीकात के बाद ही उसकी सेवाएं लेने में ही समझदारी है।

शनिवार, 19 सितंबर 2009

कश्मीर में पाकिस्तान की नापाक दखल

भारत के प्रथम गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेटन के 27 अक्टूबर, 1947 को कश्मीर के विलय-पत्र पर हस्ताक्षर करते ही भारत ने अपनी सेना को हवाई-मार्ग से श्रीनगर के लिए रवाना कर दिया था। श्रीनगर से उरी तक, यानी कृष्णगंगा नदी के पूर्वी भाग को पाकिस्तान के नियंत्रण से मुक्त करा दिया गया। एक नवंबर को राष्ट्रसंघ द्वारा युद्धविराम की घोषणा होते ही भारतीय सेना कृष्णगंगा नदी के इस पार ही रुक गई, जबकि दूसरी ओर पाकिस्तान ने युद्धविराम के 15 दिन बाद तक यानी 16 नवंबर तक कार्रवाई जारी रखी और पूरे गिलगित को अपने नियंत्रण में कर लिया। जिला मुजफ्फराबाद से 30 किलोमीटर तक यानी कृष्णगंगा का पश्चिमी भाग पाकिस्तान ने हथिया लिया और इसे आजाद कश्मीर का नाम दे दिया।
साक्ष्यों से स्पष्ट हो जाता है कि 1947 के युद्ध के लिए पाकिस्तान ही पूरी तरह उत्तरदायी है। यह बात भी साफ है कि पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर के सेनाध्यक्ष ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह और उनके साथियों की हत्या के लिए भी जिम्मेदार है। यह तथ्य भी सामने आ चुका है कि महाराजा हरि सिंह के साथ 'नो वार' समझौते के बाद भी पाकिस्तान ने 20 अक्टूबर 1947 को जम्मू-कश्मीर पर मुजफ्फराबाद के रास्ते हमला किया और जम्मू-कश्मीर की लगभग पांच हजार वर्गमील भूमि पर कब्जा जमा लिया। लार्ड माउंटबेटन की सलाह पर भारत ने पाकिस्तान के इस हमले के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र में एक अर्जी दाखिल की, जिसकी सुनवाई आज तक पूरी नहीं हो सकी है। 1 नवंबर, 1947 को संयुक्त राष्ट्र ने युद्धविराम का आदेश दिया और उस आदेश के बाद भी अस्तौर में जम्मू-कश्मीर महाराजा द्वारा नियुक्त किए गए राज्यपाल ब्रिगेडियर घनसारा सिंह को मुस्लिम स्काउटों ने बंदी बना लिया और 16 नवंबर को उन्हें पाकिस्तान की सेना के हवाले कर दिया। इसी दिन पाकिस्तानी सैनिकों ने पूरे गिलगित-बल्तिस्तान में से गैरमुस्लिम लोगों को मार भगाया और जम्मू-कश्मीर के इस हिस्से को अपनी एक बस्ती के रूप में हथिया लिया। इसकी आबादी 5-6 लाख रही होगी और क्षेत्रफल 32,500 वर्ग मील। इसी क्षेत्र में चितराल, गिलगित और कराकोरम क्षेत्र शामिल हैं। 1963 में कराकोरम के 4,500 वर्गमील क्षेत्र को पाकिस्तान ने चीन के हवाले कर दिया।
16 नवंबर को जम्मू-कश्मीर के गिलगित का लगभग एक-तिहाई क्षेत्र पाकिस्तान ने हथिया लिया और 25 नवंबर, 1947 को पाकिस्तानी सेना की सहायता से कुछ लोगों ने हजारों गैर-मुस्लिमों को मीरपुर के मैदान में इकट्ठा कर उन पर गोलीबारी शुरू कर दी। तथाकथित आजाद कश्मीर भारत के नेताओं की गलतियों के कारण अस्तित्व में आया। गिलगित-बल्तिस्तान के जिलों को पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर का वैधानिक अंग करार दिया है, जिसका क्षेत्र 32,500 वर्ग मील है। उसके एक जिले चितराल को पाकिस्तान ने स्वात घाटी का जिला घोषित कर दिया है। इतना ही नहीं, पाक अधिकृत कश्मीर के 28,000 वर्ग मील भूमि पर रहने वाले 15 लाख लोगों के लिए न्यायालय की कोई सुविधा नहीं है। इन लोगों को कोई मौलिक अधिकार प्राप्त नहीं है। न वहा संविधान लागू है, न कोई अस्पताल है, न कालेज है। इस क्षेत्र की कोई विधानसभा भी नहीं है। केवल पंचायत जैसी काउंसिल शोषण गृह है, जिसका प्रशासन पाकिस्तानी सेना का एक कर्नल चलाता है और बाकी प्रशासनिक अधिकार एक तहसीलदार को दिए गए हैं।
लाखों पाकिस्तानियों ने, जिनमें अधिकतर रिटायर्ड पाकिस्तानी सैनिक ही हैं, इन गरीब बेसहारा लोगों को न्याय से वंचित करके इनकी जमीनों पर कब्जा कर रखा है। यदि हालात नहीं बदलते तो 10 वषरें में गिलगित-बाल्तिस्तान की पूरी जनसांख्यिकी ही बदल जाएगी। हाल ही में बलावरिस्तान मुक्ति मोर्चा के एक नेता अब्दुल हामिद खान किसी तरह दिल्ली पहुंचे और भारत के नेताओं के सामने उन्होंने पाकिस्तान के उत्पीड़न से मुक्ति दिलाने में मदद करने की अपील की, परंतु ऐसा लगता है कि या तो भारत के राजनेता जम्मू-कश्मीर के इतिहास से बेखबर हैं या वे गिलगित में हो रहे नरसंहार की परिस्थितियों को स्वीकार नहीं करना चाहते।
आश्चर्य इस बात का है कि पाकिस्तान की ओर से अंतरराष्ट्रीय नियमों के इतने घोर आपराधिक उल्लंघन, मानवाधिकारों की अवहेलनाओं, राष्ट्रसंघ द्वारा पारित युद्ध-विराम के आदेश तथा पारित किए गये प्रस्तावों के खुल्लमखुल्ला उल्लंघन के बावजूद पूरा राष्ट्र इससे बेखबर रहा और पिछले छह दशकों से भारत व जम्मू-कश्मीर के लोगों, जिनमें बुद्धिजीवी, विचारक और राजनेता सभी शामिल है, ने पाकिस्तान के इन आपराधिक कृत्यों का मामला विश्व-समुदाय के सामने नहीं उठाया।
 
- प्रो. भीम सिंह  [लेखक पैंथर्स पार्टी के प्रमुख हैं]

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