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बुधवार, 28 अक्तूबर 2009

अब दिल्ली दूर नहीं ......

सभी ब्लॉगर मित्रो को प्रणाम !

आज रात की ट्रेन से दिल्ली जाना हो रहा है, हमारे मामाजी के बेटे यानि कि हमारे छोटे भाई की सगाई का समारोह है सो अब आप लोगो से ०३/११/२००९ को मुलाकात होगी ! ब्लॉग शुरू करने के बाद से पहली बार कहीं जाना हो रहा है, सुना है बड़ा आजीब लगता है अगर - दिन अपने ब्लॉग से दूर रहे तो ..... देखते है क्या अनुभव होता है !!

वैसे जो भी होगा आप सब को पता चलेगा ही क्यों अगली पोस्ट तो उस पर ही होगी !! :)

चलिए फ़िर मिलते है दिल्ली से लौट कर !!

सादर आपका
शिवम् मिश्रा
मैनपुरी, उत्तर प्रदेश.

1857 के क्रांतिकारी इतिहास का साक्षी है कवर का नगला


आज से 152 वर्ष पहले जब भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का शंखनाद हुआ था। पूरा जनपद क्रांति की आग में जल रहा था। मैनपुरी के चौहान वंशी राजा तेज सिंह अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंक दिया था। जनपद भर में अंग्रेजों के खजाने लुट रहे थे। मालगुजारी की वसूली बंद कर दी गयी थी और अंग्रेज सैनिकों, अधिकारियों को मार डालने की योजना बनायी जा चुकी थी।

ऐसे में मैनपुरी का ऐतिहासिक भोगांव कस्बा भी क्रांति की इस आग से अछूता नहीं था। अलीगढ़ में सेना ने विद्रोह कर दिया था। मैनपुरी में भी 22 मई को 4 बजे मैनपुरी के जिला कलेक्टर को सूचना मिली की नौंवी पल्टन ने ईस्ट इंडिया सरकार के विरुद्ध विद्रोह कर दिया है और भारतीय सैनिक बंदूकों से फायर करते हुये अधिकारियों के स्थानों की तरफ कूच कर चुके हैं। इस स्थिति को देखते हुये ले. कोक्स, कै. कैलनर भाग खडे़ हुये। तत्कालीन मजिस्ट्रेट जॉन पॉवर नि:सहाय अवस्था में था। अंग्रेज अधिकारी भागते हुये ईसन नदी के पुल पर जाकर छिप गये। लेकिन वह विद्रोही सैनिकों को चकमा नहीं दे सके। उन्होंने मॉन्ट गुमरी और वाटसन के घरों को लूट लिया तथा उनके घरों में आग लगा दी। सैनिकों ने शस्त्रागार को भी पूरी तरह लूट लिया। अनेक अंग्रेजों को विद्रोही सैनिकों ने बंदी बना लिया था। क्रांतिकारी सैनिकों ने मालखाना लूट लिया था और यह क्रांति की आग देखते देखते भोगांव तक पहुंच गयी।

29 मई 1857 को मेजर हैंस, कै. कैरी और लै. वारबोर फरेर और कर्नल स्मिथ सन्नद्ध हुये। लै. वारबोर को 30 मई को भोगांव और 31 मई को कुरावली पहुंचने का आदेश मिला और अंग्रेज सेना 30 मई को भोगांव पहुंच गयी। उस समय भोगांव में वर्तमान जूनियर हाईस्कूल एवं वर्तमान नेशनल महाविद्यालय के मध्य मैदान में अंग्रेजों की ओर से एक पुर्विया पल्टन पड़ी हुयी थी। इस पल्टन ने 31 मई को अंग्रेजी सेना के खिलाफ विद्रोह कर दिया। इस विद्रोह का दमन करने मेजर हैंस और कै. कैरी अंग्रेज सिपाहियों की फौज को लेकर 1 जून को भोगांव पहुंचे। जब यह दोनों अफसर क्रांतिकारी सेना के सामने पहुंचे और उनके सरेंडर करने के लिये कहा तो क्रांतिकारी फौज उनके ऊपर टूट पड़ी। देखते-देखते अंग्रेजी सेना के तमाम अंग्रेज सैनिक घटनास्थल पर धराशायी हो गये। मेजर हैंस और कै. कैरी जान बचाते हुये वहां से भागे। परंतु भारतीय सिपाहियों ने उनकों चारों तरफ से घेर लिया। एक क्रांतिकारी सिपाही ने मेजर हैंस के सिर पर तलवार से इतना तेज बार किया कि उनके प्राण पखेरू वहीं पर उड़ गये। कै. कैरी किसी प्रकार घोडे़ पर चढ़कर मैनपुरी की ओर भाग लिया। उसके साथ लगभग 50 अंग्रेज सिपाही थे जिन्हें घेर कर भारतीय क्रांतिकारी सैनिकों ने मार डाला।

कुछ दिनों बाद ईस्ट इंडिया कंपनी की अंग्रेज सेना पुन: सातवीं घुड़सवार पल्टन लेकर भोगांव आई। भोगांव के पास ही क्रांतिकारियों की सेना से उनकी भीषण मुठभेड़ हुयी। अंग्रेजी सेना पीछे खदेड़ दी गयी। सैकड़ों की संख्या में अंग्रेज यहां पर भी मारे गये। क्रांतिकारियों ने यहां के थाने पर आक्रमण कर दिया और इस लड़ाई में क्रांतिकारियों ने लै. कैंट जॉव को इतना बुरी तरह घायल कर दिया कि आगे चलकर उसकी मृत्यु हो गयी। मारे गये सैकड़ों अंग्रेज सिपाहियों को अंग्रेज सेना मैनपुरी उठाकर ले गयी तथा गोला बाजार के पास एक कब्रिस्तान में दफना दिया। गोरों की लाशों के दफनाये जाने के कारण इस जगह का नाम कवर का नगला पड़ गया। गोलाबाजार के पास सैकड़ों की संख्या में दफन अंग्रेज क्रांति की 152 साल पुरानी कहानी के आज भी गवाह बने हुये हैं।

21 जून को सूर्याेदय के पूर्व क्रांतिकारी फौज ने मैनपुरी जेल का फाटक तोड़ दिया। मुक्त बंदियों और क्रांतिकारियों ने मिलकर अंग्रेजों के घरों को खूब लूटा तथा उनमें आग लगा दी। जेल के फाटक का टूटना मैनपुरी जनपद से विदेशी सत्ता की समाप्ति का सूचक था। अधिकांश अंग्रेज अपने प्राणों की रक्षा करते हुये आगरा की ओर भाग गये। विदेशियों के पलायन के बाद मैनपुरी की बागडोर राजा तेजसिंह ने संभाली थी |

-अनिल मिश्रा

मंगलवार, 27 अक्तूबर 2009

नानक वाणी में प्रेमिका हैं प्रभु !!

गुरु नानक का जन्म रावी नदी के तटवर्ती गांव तलवंडी में वर्ष 1469 में कार्तिक पूर्णिमा के दिन हुआ था। बाद में यह स्थान 'ननकाना साहब' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। नानक की बड़ी बहन नानकी के नाम का अनुकरण करते हुए पिता कालू मेहता ने अपने बेटे का नाम नानक रखा था। नानक बचपन से ही प्रतिदिन संध्या समय मित्रों के साथ बैठकर सत्संग किया करते थे। उनके मित्रों में भाई मनसुख का नाम विशेष रूप से लिया जाता है, क्योंकि उन्होंने ही सबसे पहले नानक की वाणियों का संकलन किया था। कहते हैं कि नानक जब वेई नदी में उतरे, तो तीन दिन बाद प्रभु से साक्षात्कार करने पर ही बाहर निकले। 'ज्ञान' प्राप्ति के बाद उनके पहले शब्द थे 'एक ओंकार सतनाम' विद्वानों के अनुसार, 'ओंकार शब्द तीन अक्षर '', '' और '' का संयुक्त रूप है। '' का अर्थ है जाग्रत अवस्था, '' का स्वप्नावस्था और '' का अर्थ है सुप्तावस्था। तीनों अवस्थाएं मिलकर ओंकार में एकाकार हो जाती हैं।'

लोगों में प्रेम, एकता, समानता, भाईचारा और आध्यात्मिक ज्योति का संदेश देने के लिए नानक ने जीवन में चार बड़ी यात्राएं कीं, जो 'चार उदासी' के नाम से प्रसिद्ध हैं। उनकी यात्राओं में उनके साथ दो शिष्य बाला और मरदाना भी थे। गुरु नानक का कंठ बहुत सुरीला था। वे स्वयं वाणी का गान करते थे और मरदाना रबाब बजाते थे।

नानक की समस्त वाणी 'गुरु ग्रंथ साहिब' में संकलित है। अपने काव्य के माध्यम से नानक ने पाखंड, राजसी क्रूरता, नारी गुणों, प्रकृति चित्रण, अध्यात्म के गूढ़ रहस्यों का सजीव चित्रण किया है। अपने काव्य में नानक ने प्रभु को 'प्रेमिका' का दर्जा दिया है। नानक का मत था कि अपने आप को उसके प्रेम में मिटा दो, ताकि तुम्हें ईश्वर मिल सके। जब पूर्ण विश्वास के साथ हम सब कुछ प्रभु पर छोड़ देते हैं, तो प्रभु स्वयं हमारी देख-रेख करता है। गुरु नानक ने गृहस्थ जीवन अपनाकर समाज को यह संदेश दिया कि प्रभु की प्राप्ति केवल पहाड़ों या कंदराओं में तप करने से ही प्राप्त नहीं होती, बल्कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी आध्यात्मिक जीवन अपनाया जा सकता है। नानक का मत था कि वे सभी उपाय, जिनसे आप प्रभु का साक्षात्कार कर सकते हैं, अपनाते हैं, तो जीवन में सात्विकता आती है। इससे आपका मन आनंद, प्रेम और दया भाव से भरा रहता है। वे किसी व्यक्ति, समाज, संप्रदाय या देश के नहीं थे, बल्कि सबके थे और सब उनके। नानक के अनुसार, न कोई हिंदू है, न मुसलमान। सारा संसार मेरा घर है और संसार में रहने वाले सभी लोग मेरा परिवार है।

आज सभी लोग सांसारिक तृष्णा में लिप्त हैं और सतही जीवन जी रहे हैं। जीवन की वास्तविकता से दूर जाने के कारण जीवन में नीरसता, कुंठा और निराशा बढ़ती जा रही है। हम छोटी सी बात पर लड़ने-मरने को तैयार हो जाते हैं। हमारा अन्त:करण हमसे छूटता जाता है और हम अधिक तनाव में रहने लगते हैं। ऐसे में नानक की वाणी तपते मन में ठंडी फुहारों के समान हैं।

-डॉ. सुरजीत सिंह गांधी

शो़क समाचार - आख़िर हार गई अर्चना मौसी !!


"आख़िर हार गई, अर्चना !!" - यही कहना था उन सभी का जिसने भी यह सुना कि अर्चना पाठक नहीं रहीं !!
अर्चना पाठक मैनपुरी जनपद के बुद्धिजीवियों के लिए कोई नया नाम नहीं, सभी जानते थे उनको और उनके संघर्ष पूर्ण जीवन को !! किसी से भी कुछ भी छिपा नहीं, एक खुली किताब की तरह !

पिछले २ महीने से लगातार अपनी गिरती हुयी सेहत से परेशान अर्चना ने दिनांक २४/१०/२००९, दिन शनिवार प्रातः ११ बजे आख़िर हार मान ली और अपने चौथियाना मोहल्ला के निवास पर अपनी अन्तिम साँस ली ! वे लंबे समय से गुर्दे की बीमारी से जूझ रही थीं |

मैनपुरी में आप हस्तकला विशेषज्ञ के रूप में जानी जाती थीं | अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र जैसे विषयो से डबल एम.. की हुई अर्चना ने कलकत्ता के विख्यात कालाविध शंतिरंजन बोस से हस्तकला का प्रशिक्षण लिया था | आप लेदर बाटिक, क्ले मॉडलिंग, पोट्रेट, समेत कला के विभिन्न विधाओं की विशेषज्ञ थीं | अपने कैमल क्रयालिन की राष्ट्रीय पेंटिंग प्रतियोगिता में २ बार प्रथम पुरस्कार हासिल कर मैनपुरी जनपद को गौरवान्वित किया|

मैनपुरी में जिस ज़माने में लड़कियों की शिक्षा पर ही सवाल उठाये जाते थे उस समय अर्चना पाठक एक केडिट के रूप में भारत स्काउट एंड गाइड्स एवं एन सी सी में मैनपुरी का प्रतिनिधित्व कर रहीं थीं | यह उनके जीवन के छात्रावस्था काल की बात है |

उनका जीवन अनेक उतार चडाव से भरा था पर हर बार वो अपने आप को प्रोत्साहित कर आगे बढ़ती जाती थीं | कभी हार न मानना ही उनके जीवन का मूल मंत्र था | पर उस परम पिता की इच्छा के आगे वो भी हार गयीं !

मैनपुरी में आयोजित विभिन्न कला प्रतियोगिताओ में निर्णायक के रूप में आमंत्रित की गई अर्चना पाठक को जानने वाले जनपद के विभिन्न बुद्धिजीवियों ने गहरा शोक प्रकट किया है उनके निधन पर |

अपनी अर्चना मौसी को और क्या दे सकता था मैं सिवाए इस विनम्र श्रद्धांजलि के |

जाओ खूब खुश हो कर जाओ,
और जाते जाते यह भी जान जाओ,
जिसने हर बार की तकरार तुमसे न जाने किन किन बातों पर,
वही मैं आज यह कहता हूँ बहुत याद आओगी तुम न जाने किन किन बातों पर !!
बहुत कुछ सहा तुम ने ता-उमर,
अब बहुत हुआ जहाँ भी रहो खुश रहना,
'उससे' कर देना शिकायत,
नहीं तुम्हे है अब कुछ सहना,
बस मौसी अब खुश रहना !!

शनिवार, 24 अक्तूबर 2009

अगले साल फिर बीस हजारी होगा सेंसेक्स

सेंसेक्स अगले साल जनवरी में फिर 20 हजारी हो जाएगा। वहीं नेशनल स्टाक एक्सचेंज के निफ्टी भी 6 हजार के स्तर को पार कर जाएगा। देश के प्रमुख उद्योग चैंबर एसोचैम ने ये आसार व्यक्त किए हैं। चैंबर ने निवेशकों के भरोसे को अपने इस अनुमान का आधार बनाया है। विदेशी संस्थागत निवेशकों [एफआईआई] द्वारा दलाल स्ट्रीट में पूंजी झोंकने का सिलसिला जारी रखने से भी इस भरोसे को बल मिला है।

बीते साल जनवरी में सेंसेक्स ने 21 हजार का स्तर छुआ था। लेकिन दुनिया भर में आए वित्तीय बवंडर ने भारतीय शेयर बाजार का भी बंटाधार कर दिया। इससे सेंसेक्स अक्टूबर, 08 में आठ हजार के स्तर से भी नीचे चला गया था। फिलहाल यह 17 हजार के आसपास घूम रहा है।

एसोचैम के मुताबिक अगस्त, 09 में औद्योगिक उत्पादन की विकास दर बढ़कर 10.4 फीसदी हो गई। इसके आगे भी बढ़ने के अनुमान हैं। दूसरे अन्य कारक भी बाजार में जान फूंकने का काम करेंगे। ग्रामीणों की आमदनी में इजाफा होने से उनकी भी बाजारों में हिस्सेदारी बढ़ेगी। इसके अलावा टेलीकाम, आटो और एफएमसीजी क्षेत्र में जारी तेजी भी सेंसेक्स को 20 हजार के स्तर तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाएगी।

क्रोध की ऊर्जा का रूपांतरण


अर्जुन को समझाते हुए कृष्ण कहते हैं, 'काम' के मार्ग में बाधा आने पर क्रोध का जन्म होता है। क्रोध मन के संवेगों का प्रवाह है, जिस पर बांध न बनाए जाने पर वह व्यक्ति को पतन की ओर ले जाता है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि 60 सेकेंड का क्रोध व्यक्ति के शरीर को 600 सेकेंड तक कंपित करता है, क्योंकि क्रोध से जुड़े तथ्य व्यक्ति को 600 सेकंड तक व्यथित करते रहते हैं। क्रोध एक ऐसी आग है, जिसमें जलने वाले व्यक्ति की ऊर्जा का क्षय हो जाता है।

लड़ने को सदैव तत्पर

मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति हर स्थिति-परिस्थिति में अपने अनुकूल परिणाम चाहता है। इसके लिए ज्यादातर व्यक्ति लड़ने और बहस करने के लिए तत्पर हो जाते हैं। वहीं कोई व्यक्ति लड़ने को उद्यत हो रहा हो, तो हम तुरंत ईंट का जवाब पत्थर से देना शुरू कर देते हैं। जरा-सी बात पर हमारे अंदर का पशु क्रोध के रूप में सामने आ जाता है।

क्रोध के कारण

हमारे अंदर क्रोध का कारण शारीरिक, जैविक, परिवेश, संस्कार, दृष्टिकोण आदि हो सकता है। चिड़चिड़ाना, रोना, कड़वे वचन बोलना, कुंठा, हिंसा, ईष्र्या, द्वेष आदि के रूप में भी क्रोध की अभिव्यक्ति होती है। क्रोध के समय हम इतने व्यथित हो जाते हैं कि इससे बचने के बजाय उसमें ही उलझ जाते हैं। अधिकतर लोग क्रोध के बाद क्रोध के औचित्य को ही सिद्ध नहीं करते हैं, बल्कि अपने कुतर्क से इसके लिए दूसरों को उत्तरदायी भी ठहराते हैं।

अध्यात्म है क्रोध की औषधि

यदि व्यक्ति साधना और ध्यान का निरंतर अभ्यास करता है, तो वह जान पाता है कि उसे क्रोध क्यों आता है। वह समझ जाता है कि वह स्वयं ही क्रोध का कारण है। अध्यात्म से जुड़ा व्यक्ति निरंतर अभ्यास करता है, जिससे वह क्रोध से बच सके। निरंतर अभ्यास से मन शांत होने लगता है और बड़ी-बड़ी समस्याएं विवेकपूर्ण ढंग से सुलझा लेता है। निर्णय लेने की क्षमता भी बढ़ जाती है।

ऊर्जा परिवर्तित करना

आध्यात्मिक व्यक्ति अपने प्रति सजग हो जाता है। क्रोध का उत्तर वह क्रोध से नहीं देता। जब सामने वाले को जताया जाए कि उसकी बात पर आप न तो क्रोधित हैं और न ही उसकी बात का बुरा माना है, तो आप महसूस करेंगे कि वह न केवल शांत हो जाएगा, बल्कि शर्मिंदगी भी महसूस करेगा। व्यक्ति यदि चाहे, तो अपनी क्रोध की ऋणात्मक ऊर्जा को सकारात्मकता की ओर ले जा सकता है। सकारात्मक ऊर्जा के साथ व्यक्ति उचित निर्णय लेने की स्थिति में पहुंच जाता है। सच तो यह है कि क्रोध की ऋणात्मक ऊर्जा तर्क-कुतर्क करती है, जबकि सकारात्मक ऊर्जा जीवन को एक नया आयाम देती है।

-डॉ. सुरजीत सिंह गांधी

गुरुवार, 22 अक्तूबर 2009

नेताजी की मौत से जुड़ा हर रिकार्ड उजागर हो - केंद्रीय सूचना आयोग [सीआईसी]



केंद्रीय सूचना आयोग [सीआईसी] ने कहा है कि सुभाष चंद्र बोस की मौत से जुड़ा हर रिकार्ड सार्वजनिक किया जाना चाहिए। सीआईसी ने गृह मंत्रालय को निर्देश दिया है कि वह 1945 में नेताजी के अचानक लापता होने के मामले की जांच करने वाले जस्टिस मुखर्जी आयोग के सभी दस्तावेज सार्वजनिक करे, चाहे वे किसी भी मंत्रालय और राज्य सरकार से संबंधित हों।

सीआईसी ने इससे पहले भी गृह मंत्रालय को इस मामले में मुखर्जी आयोग द्वारा सूचीबद्ध प्रमाण उजागर करने को कहा था। लेकिन, आयोग ने अन्य राज्यों से जुड़े रिकार्डो पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। आयोग ने अब अपने फैसले में कहा है, 'गृह मंत्रालय 20 कार्य दिवसों के अंदर आवेदनकर्ता को हर जानकारी मुहैया कराए।' सूचना के अधिकार के तहत चंद्रचूड़ घोष ने यह जानकारी मांगी थी। अर्जी दायर करने के करीब 34 महीने बाद आयोग का यह फैसला आया है।

इससे पहले पिछले महीने सीआईसी के समक्ष गृह मंत्रालय का पक्ष रखते हुए संयुक्त सचिव लोकेश झा ने कहा था कि मंत्रालय को इस मामले में अपने दस्तावेज जारी करने में कोई हर्ज नहीं है लेकिन अन्य मंत्रालय व कुछ राज्य सरकारों से जुड़े दस्तावेज जारी करने में गृह मंत्रालय असमर्थ है। गौरतलब है कि नेताजी की गुमशुदगी से जुड़े मामले की जाच के लिए 1999 में एक सदस्यीय मुखर्जी आयोग का गठन किया गया था। आयोग की जांच रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं की गई है।

भाईचारे का संदेश दे रहा है छठ पर्व


बिहार में इस वर्ष छठ पूजा सांप्रदायिक भाई-चारे का संदेश दे रही है। पटना के कमला नेहरू नगर की नसीमा खातून छठ पर्व के पहले दिन गुरुवार को 'नहाय-खाय' के साथ अपना छठ पर्व शुरूकर चुकी है।
नसीमा की तरह यहां बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाएं छठ व्रत कर रही है। चार दिनों तक चलने वाले लोक आस्था के इस पर्व के पहले दिन नहाय-खाय के साथ ही छठ पर्व शुरू हुआ। नसीमा ने कहा कि वह इस पर्व को तीन वर्ष से करते आ रही है। उन्होंने कहा कि छठी मईया की कृपा से ही पुत्र की प्राप्ति हुई है। मैं नियमपूर्वक गंगा तट पर जाकर सूर्य को अ‌र्घ्य दूंगी।
इधर, रेशमा भी पहली बार छठ पर्व कर रही है। उन्होंने कहा कि इसमें हिंदू-मुस्लिम वाली कोई बात नहीं है। श्रद्घा और विश्वास ही सही पूजा है। उल्लेखनीय है कि पटना में छठ में प्रसाद बनाने के लिए अधिकांश चूल्हे भी मुस्लिम परिवार द्वारा ही बनाए जाते है। मुस्लिम परिवार का कहना है कि आदमी को मिट्टी से शिक्षा लेनी चाहिए।
दरअसल, चूल्हे में लगने वाली मिट्टी किसी प्रकार के भेदभाव के शिकार नहीं होती। लगातार 20 वर्षो से छठ के लिए चूल्हा बेचने वाले मोहम्मद सलालुद्दीन का कहना है कि वह अन्य दिनों में बर्तन बेचने का काम करते है, लेकिन छठ के मौके पर वह चूल्हे बनाने का काम करते है। छठ व्रती 'खरना' के दिन इन्हीं चूल्हों पर प्रसाद बनाया जाता है।

गुलजार को लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड


ऑस्कर विजेता गुलजार को सिनेमा जगत में उनके योगदान के लिए 11वें ओसियान सिने फिल्म समारोह में लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड 2009 से सम्मानित किया जाएगा। गुलजार को यह पुरस्कार राजधानी में 24 अकतूबर को उद्घाटन समारोह में दिया जाएगा।
ओसियान की तरफ से जारी एक बयान में कहा गया कि यह पुरस्कार गुलजार की रचनात्मकता और मनोरंजन जगत को उनके योगदान का सम्मान है जो सांस्कृतिक भाषाई और अन्य सीमाओं से परे है।
विमल राय की फिल्म बंदिनी के गीत मोरा गोरा रंग लई ले से प्रसिद्धि पाने वाले गुलजार मुसाफिर हूं यारो (परिचय), तेरे बिना जिन्दगी से कोई (आंधी), मेरा कुछ सामान (इजाजत) और तुझसे नाराज नहीं जिन्दगी (मासूम) जैसे यादगार गीत लिखने के लिए जाने जाते हैं।
हाल ही में धूम मचाने वाले उनके गीतों में कजरारे अमिताभ बच्चन अभिनीत बंटी और बबली बीड़ी जलाई ले (ओमकारा) और स्लमडॉग मिलेनियर का गीत जय हो शामिल है जिसने इस साल का ऑस्कर जीता।
गुलजार ने आंधी, परिचय, मौसम और माचिस जैसी फिल्मों का निर्देशन भी किया है। गुलजार सिनेमा हस्ती ही नहीं, बल्कि जाने माने कवि भी हैं जिन्हें 2002 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा जा चुका है।
पिछले साल लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार वरिष्ठ फिल्म निर्माता मृणाल सेन को मिला था।

सभी मैनपुरी वासीयों की ओर से गुलज़ार साहब को बहुत बहुत बधाईयां और शुभकामनाएं !

बुधवार, 21 अक्तूबर 2009

अकरम की पत्नी की हालत गंभीर


पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेट कप्तान वसीम अकरम की पत्नी को एयर एंबुलेंस में हालत बिगड़ने के बाद बुधवार को यहाँ एक अस्पताल में भर्ती कराया गया जहाँ उनकी स्थिति गंभीर बनी हुई है। 
एयर एंबुलेंस सिंगापुर जा रही थी और उसे यहाँ हवाई अड्डे पर ईंधन भरने के लिए उतारा गया था। 
लाहौर से आ रही एंबुलेंस में मौजूद डॉक्टरों की सलाह पर हुमा को अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया। अस्पताल ने एक बयान में कहा कि उन्हें जरूरी गहन चिकित्सा सुविधा मुहैया कराई जा रही है। हुमा को सिंगापुर में उपचार कराना था।अस्पताल सूत्रों के अनुसार हुमा के कई महत्वपूर्ण अंग काम नहीं कर रहे हैं और उन्हें वेंटिलेंटर पर रखा गया है। उन्होंने बताया कि हुमा की स्थिति नाजुक है। सूत्रों के अनुसार मुख्य राष्ट्रीय चयनकर्ता के श्रीकांत के पुत्र की शादी में शामिल होने के लिए यहाँ आए पूर्व क्रिकेटर रवि शास्त्री यह खबर सुनकर अस्पताल पहुँचे। वह करीब दो घंटे तक वहाँ रहे।
 
आप सब से यही विनती है कि इस संकट की घडी में वासिम भाई के परिवार के लिए अपनी दुओं का खजाना खोल दें और हुमा जी के जल्द बहेतरी की दुआ करे !

अत्याधुनिक हथियारों से लैस होगा एनएसजी



केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम ने शुक्रवार को कहा कि किसी भी प्रकार की आतंकी घटना से निपटने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड [एनएसजी] को अत्याधुनिक हथियारों से सुसज्जित किया जाएगा।
एनएसजी के 25वें स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित एक समारोह को संबोधित करते हुए चिदंबरम ने कहा, 'हमने एनएसजी को नागरिक विमानों के इस्तेमाल के लिए अधिकृत कर दिया है। एनएसजी को जल्द ही उच्च तकनीक वाले नए अत्याधुनिक हथियारों से लैस किया जाएगा। यह प्रक्रिया अपने अंतिम दौर में है।'

चिदंबरम ने कहा, '26/11 की घटना के बाद एनएसजी की भूमिका एक बार फिर से परिभाषित हुई है। हमने एनएसजी के मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद, कोलकाता तथा अन्य दो क्षेत्रीय केंद्र स्थापित किए है। प्रत्येक केंद्र पर 5000 जवान तैनात रहेगे।'
एनएसजी की भूमिका की सराहना करते हुए उन्होंने कहा, 'आतंकवाद के खतरे से निपटने के लिए देश को समृद्ध और कुशल प्रशिक्षित एनएसजी की आवश्यकता है।'
इस मौके पर प्रसिद्ध गीतकार गुलज़ार और संगीतकार गायक शंकर महादेवन भी मौजूद थे !

कुछ खास है हम सभी में


12 साल का ईशविंदर 'स्पेशल चाइल्ड' है। वह सामान्य बच्चों से अलग है, क्योंकि उसका आईक्यू लेवल सामान्य से कम है। इस परिस्थिति को आम भाषा में मंदबुद्धि कहा जाता है, लेकिन ईशविंदर की ऊर्जा व सकारात्मकता उसे इस संबोधन से कहीं आगे ले जाते हैं। वह नवंबर माह में होने जा रहे इंटरस्टेट स्पेशल ओलंपिक के लिए फिटनेस टेस्ट पास करने वाले बच्चों में से एक है। बीते साल लुधियाना में ऐसे ही बच्चों के लिए हुए एक विशेष खेल मुकाबले में उसने 100 तथा 200 मीटर दौड़ स्पर्धा में दो स्वर्ण व सॉफ्टबॉल थ्रो में एक रजत पदक हासिल किया था।
19 साल का सौरभ जैन क्रिकेट का दीवाना है और किसी दिन टीम इंडिया के साथ खेलना चाहता है, लेकिन उसके स्कूल में क्रिकेट नहीं सिखाया जाता और आस-पड़ोस के बच्चे उसे अपने साथ नहीं खिलाते। भले ही लोग उसे मंदबुद्धि कहते हों, लेकिन अपने पसंदीदा खेल के बारे में उसे सब मालूम है। श्रीलंका में हुई ट्राईसीरीज के बारे में पूछे गए सभी सवालों का सही उत्तर दे कर उसने इसे सिद्ध भी कर दिया। वह पंजाब में आयोजित विशेष खेल मुकाबलों में 3 पदक व एक ट्राफी जीत चुका है और अब इंटरस्टेट स्पेशल ओलंपिक की तैयारी कर रहा है।
 
[क्या है स्पेशल ओलंपिक?]

स्पेशल ओलंपिक पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति स्व. जॉन एफ. कैनेडी की बहन यूनिस कैनेडी श्रिवर द्वारा 1968 में स्थापित की गई संस्था द्वारा विश्व के विभिन्न भागों में आयोजित करवाये जाते हैं। इन्हें शारीरिक अक्षमता वाले खिलाड़ियों के लिए आयोजित 'पैरालिंपिक' की जगह 'स्पेशल ओलंपिक' कहा जाता है क्योंकि यह स्पर्धा स्पेशल बच्चों की है, जिन्हें इंटेलेक्चुल डिसएबल कहा जाता है। संस्था ऐसे बच्चों को 'मेंटली रिटार्डिड' बोलने के सख्त खिलाफ है। अब तक स्पेशल ओलंपिक 180 देशों में लाखों स्पेशल बच्चों के जीवन को एक नई दिशा और ऊर्जा प्रदान कर चुकी है।

[हेल्दी एथलीट प्रोजेक्ट]

स्पेशल ओलंपिक के अंतर्गत खेल ही नहीं करवाए जाते, बल्कि उनसे पहले इन बच्चों के विशेष हेल्थ चेकअप भी होते हैं। विभिन्न शहरों में फ्री कैंपों का आयोजन कर स्पेशल बच्चों की फिटनेस के बारे में अभिभावकों के मार्गदर्शन के साथ-साथ स्थानीय डाक्टरों को भी प्रशिक्षित किया जाता है। संस्था के हेल्दी एथलीट्स कोआर्डिनेटर (एशिया पैसिफिक) डा. राजीव प्रसाद कहते हैं, ''इनको विशेष देखभाल की जरूरत होती है, लेकिन समाज के डर या शर्म के कारण माता-पिता इन्हें घर से बाहर भी नहीं निकालते। आमतौर पर डॉक्टर भी इलाज से कतराते हैं, क्योंकि इनके चैकअप के दौरान डॉक्टर के संयम की भी परीक्षा हो जाती है।

[एक थप्पड़ ने बदल दिया नजरिया]

डा. राजीव प्रसाद कहते हैं, "एक बार मैंने एक बच्चे की आंखों के चेकअप पर 20-25 मिनट लगाए, लेकिन उसके रिस्पांस न देने पर मैं खीज गया और उस पर चिल्ला उठा। उस बच्चे ने तपाक से एक थप्पड़ मेरे मुंह पर जड़ दिया। उस थप्पड़ ने मेरा जीवन बदल दिया। मुझे एहसास हुआ कि मैं कुछ मिनटों में ही संयम खो बैठा, लेकिन इन बच्चों में तो हम से ज्यादा सहनशीलता है। हमारी कही गई अधिकतर बातें (जो उन्हें समझ नहीं आती) उनके लिए बक-बक जैसी ही तो हैं, जिन्हें वे झेलते हैं। उसी दिन से मैंने इन बच्चों के लिए काम करने करने की ठान ली!''

मंगलवार, 20 अक्तूबर 2009

मराठा मंदिर में डीडीएलजे के 14 साल




शाहरुख खान और काजोल अभिनीत फिल्म दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे [डीडीएलजे] मंगलवार को दक्षिण मुंबई के मराठा मंदिर थिएटर में अपने प्रदर्शन के 14 साल पूरे कर रही है। थिएटर के मैनेजर और स्टाफ इस मौके पर बेहद खुश एवं उत्साहित हैं, लेकिन उन्हें इस बात का बेहद दु:ख है कि उनके अनेक निमंत्रण के बावजूद शाहरुख और काजोल में से कोई एक बार भी इस थिएटर में नहीं आया।


मैनेजर प्रवीण राणे के अनुसार, मराठा मंदिर एक मात्र थिएटर है जहां डीडीएलजे चौदह साल से दिखाई जा रही है, लेकिन शाहरुख और काजोल को थिएटर में साक्षात् देखने की ख्वाहिश आज भी अधूरी है।



आदित्य चोपड़ा निर्देशित डीडीएलजे 1995 में 20 अक्टूबर को प्रदर्शित हुई थी। तब से आज भी प्रत्येक दिन मराठा मंदिर में मैटिनी शो में डीडीएलजे दिखाई जाती है। आज भी इसे देखने के लिए दर्शकों की अच्छी-खासी तादाद जुटती है।

सोमवार, 19 अक्तूबर 2009

..तो थोड़ी-थोड़ी पिया करो


फेस्टिव सीजन चल रहा है। मूड भी कुछ एनजॉय करने का है। ऐसे में पीने वाले भला कहां पीछे रहेंगे। डॉक्टर्स और एक्सपर्ट कितना भी कहें थोड़ी-थोड़ी पिया करो, पर जिनकी शाम मय के साथ बीतती है उन्हें इसकी परवाह कहां। पर इतना जान लीजिए कि हर कोई 'गालिब' नहीं होता। इसलिए कुछ बातों का ख्याल रखना भी जरूरी है। मसलन क्या पिएं, कितना पिएं, डाइट क्या हो? साथ ही साथ पीने की कुछ तहजीब और सलीका भी है, इसे ही तो कहते हैं पीना इसी का नाम है।
  सभी जगह दीवाली से पहले नया कोटा आ गया और ब्रांड्स की भी कोई कमी नहीं है। कुछ जगह तो दीवाली के बाद के लिए भी एडवांस बुकिंग भी शुरू हो चुकी थी। कुछ बार अलग अंदाज में फेस्टिव सीजन सेलीब्रेट करने जा रहे हैं। मसलन संगीत का मजा और आपकी गैदरिंग के अनुरूप जगह।
 
पैग 50 एमएल

वैसे बार में पैग के मानक तय हैं स्माल पैग 25 एमएल और लार्ज पैग 50 एमएल का। ध्यान रहे छोटे और बड़े पैग आप अपनी सेहत, उम्र और आदत के अनुसार चुन सकते हैं। इधर बात करें तो सिटी में मैकडाउल, रम, बोदका, जिन, सिगनेचर, रेड बोदका और ब्लंडर्स स्प्राइड, टीचर्स जैंसे ब्राड खूब पसंद किए जा रहे हैं।
 
तहजीब और सलीका

अब बात पीने पिलाने के सलीके की। कहां पी रहे हैं, किस तरह पी रहे हैं इन बातों का ख्याल रखना भी जरूरी है। ड्रिंक्स लेते वक्त इस बात का ध्यान रखें कि आप अपनी कैपिसिटी क्रास न करें, यानि 'अब बस' कहना आना चाहिए। दूसरी बात, डि्रंक्स लेते वक्त स्मोकिंग कर रहे हैं तो ध्यान दें कि साथ में दूसरे लोग भी बैठे हैं। इससे दूसरे को प्रॉब्लम हो सकती है। अगर पीने के बाद बहक जाने की 'बीमारी' है तो भीड़ भाड़ में पीने से बचें और पीने का अंदाज 'होल्ड द ड्रिंक' वाला हो, बोले तो 'हौले-हौले' 'आहिस्ता आहिस्ता'।

'ड्रिंकिंग इज इंज्यूरियस फॉर हेल्थ' शराब के बावत डाक्‌र्ट्स की पहली राय यही है। यानि जितना हो इससे बचा ही जाए। और जो कहीं पीना ही पडे़ तो कुछ बातों का ख्याल रखें। डॉक्टर के अनुसार ड्रिंकिंग के साथ कुछ रूल्स फालो करेंगे तो शराब का सूरूर तो पूरा मिलेगा ही, इसके साइड इफेक्ट्स कम से कम सामने आएंगे। इस बावत दून हॉस्पिटल के सीनियर फिजीशियन डॉ. केपी जोशी कुछ टिप्स दे रहे हैं, अगर आप पीने पिलाने वालों की कैटगरी में आते हैं तो ये सुझाव खास आपके लिए हैं।
 
आइडियल पैक्स

डॉ. केपी जोशी बताते हैं कि शराब के 20 एमएल के दो पैग ही लिए जाने चाहिए। इससे ज्यादा शराब का सेवन हार्मफुल होता है और उसके कई साइड इफैक्ट भी सामने आते हैं। वहीं एक शोध में यह बात सामने आई है कि रेड वाइन अगर संतुलित मात्रा में ली जाए तो बुढ़ापे का असर कुछ देर से दिखेगा।
 
आइडियल डाइट

अगर शराब का सेवन कर रहे हैं तो प्रॉपर डायट लिया जाना जरूरी है। ऐसे में ड्रिं‌र्क्स को प्रोटीनयुक्त डाइट जरूर लेनी चाहिए। ऐसी डाइट लें जिसमें सलाद की पूरी मात्रा हो। नॉन वेजिटेरियन चिकन-मटन यूज कर सकते हैं।
 
साइड इफेक्ट

जरूरत से ज्यादा शराब पीने से पेट में जलन, गैस के साथ ही उल्टी की प्रॉब्लम हो सकती है। ज्यादा ड्रिंक करने से पेट में अल्सर की भी प्रॉब्लम हो सकती है। इसके साथ ही एल्कोहॉलिक लीवर डिजीज हो सकती हैं।

रविवार, 18 अक्तूबर 2009

३५० वी पोस्ट :- गौर से देखो तो 'इच्छा' आस-पास ही है

हम और आप फैशन के मुताबिक कपड़े पहनते हैं, जूते खरीदते हैं और तो और बच्चो का पुराने खिलौनों से खेलना भी हमें अच्छा नहीं लगता। क्या आप जानते हो कि हमारे आसपास कुछ बच्चे ऐसे भी हैं, जिन्हें नए और पुराने में फर्क करने का मौका ही नहीं मिलता। यह बच्चा कोई भी हो सकता है। घर में सफाई करने वाली नौकरानी का बच्चा, स्कूल के प्यून का बच्चा या

फिर रास्ते में पड़ने वाली किसी गरीब बस्ती का बच्चा।
1. इस दीवाली पर स्टडी टेबल की सफाई करते हुए अगर ऐसी कोई कॉमिक या कहानियों की किताब मिली है जिसे आप पूरा पढ़ चुके हो, तो इसे उन्हें दिया जा सकता है।
2. इसी तरह पुराने या छोटे हो चुके कपड़ों को गरीब बच्चों को दिया जा सकता है। छोटे हुए जूते या पुराने फैशन के मोजे भी उन्हें दिए जा सकते हैं। पुरानी एसेसरीज जैसे बेल्ट, हैट, छाता, चूड़ियां, ब्रैसलेट, ईयररिंग्स आदि भी उनके काम आ सकती हैं।
3. हाथ से बनाए ग्रीटिंग कार्ड के साथ उन्हें दीवाली का शुभकामना संदेश दो।
4. पटाखों और फुलझड़ियों को उनके साथ मिलकर जलाओ। इससे उन्हें पटाखे फोड़ने का मौका मिलेगा और आपको खुशियां बांटने की संतुष्टि। दीवाली की मिठाई उनके साथ बांटकर खाओ। तोहफे में मिले सारे चॉकलेट्स खुद खाने के बजाए कुछ शेयर उनके लिए भी रखो।
5. सर्दियां आने वाली हैं। अगर अपनी जैकेट या मफलर आपको आउट ऑफ फैशन लगती है, तो यह भी उनके काम आ सकती है।
कहने का मतलब यह है कि हर वह चीज जो आपको लगता है कि पुरानी पड़ चुकी है, उनके काम आ सकती है। इसलिए आज दीवाली पर अपने साथ-साथ 'इच्छा' जैसे बच्चों का भी ख्याल करो और बदले में आपको मिलेगा खुशियां बांटने का अनमोल आनंद!  क्यों कि अगर गौर से देखो तो 'इच्छा' आस-पास ही है बस हमारी नज़र उस पर नहीं पड़ती ! 

मुगल सल्तनत की दीवाली



मुगल सल्तनत का काल भारतीय इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। मुगल बादशाह अपने साथ यहां इस्लामी संस्कृति को लाए, किन्तु यह भी कैसे मुमकिन था कि इस महान राष्ट्र की सदियों पुरानी संस्कृति, परंपराओं और त्योहारों से वे अप्रभावित रह पाते?
दीवाली सदियों से हिंदू संस्कृति का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण त्योहार माना जाता रहा है। प्रकाश की जगमग और उल्लास भरे इस पर्व ने मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर को भी आकर्षित किया। बाबर ने दीवाली के त्योहार को 'एक खुशी का मौका' के तौर पर मान्यता प्रदान की।
बाबर ने अपने बेटे हुमायूं को भी दीवाली के जश्न में शामिल होने की प्रेरणा दी। बाबर के उत्तराधिकारी के रूप में हुमायूं ने इस परंपरा को न केवल अक्षुण्ण रखा, अपितु इसे व्यक्तिगत रुचि से और आगे बढ़ाया। हुमायूं के शासन-काल में दीवाली के मौके पर पूरे राजमहल को झिलमिलाते दीपों से सजाया जाता था और आतिशबाजी की जाती थी। हुमायूं खुद दीवाली उत्सव में शरीक होकर शहर में रोशनी देखने निकला करते थे। हुमायूं - 'तुलादान' की हिंदू परंपरा में भी रुचि रखते थे।

मुगल-सल्तनत के तीसरे उत्तराधिकारी को इतिहास अकबर महान के नाम से जानता है। अकबर द्वारा सभी हिन्दू त्योहारों को पूर्ण मनोयोग और उल्लास के साथ राजकीय तौर पर मनाया जाता था। दीवाली अकबर का खास पसंदीदा त्योहार था। अबुल फजल द्वारा लिखित आईने अकबरी में उल्लेख मिलता है कि दीवाली के दिन किले के महलों व शहर के चप्पे-चप्पे पर घी के दीपक जलाए जाते थे। अकबर के दौलतखाने के बाहर एक चालीस गज का दीपस्तंभ टांगा जाता था, जिस पर विशाल दीपज्योति प्रज्जवलित की जाती थी। इसे 'आकाशदीप' के नाम से पुकारा जाता था। दीवाली के अगले दिन सम्राट अकबर गोवर्धन पूजा में शिरकत करते थे। इस दिन वह हिन्दू वेशभूषा धारण करते तथा सुंदर रंगों और विभिन्न आभूषणों से सजी गायों का मुआयना कर ग्वालों को ईनाम देते थे।
अकबर के बाद मुगल सल्तनत की दीवाली परंपरा उतनी मजबूत न रही, मगर फिर भी अकबर के वारिस जहांगीर ने दीवाली को राजदरबार में मनाना जारी रखा। जहांगीर दीवाली के दिन को शुभ मानकर चौसर अवश्य खेला करते थे। राजमहल और निवास को विभिन्न प्रकार की रंग-बिरंगी रोशनियों से सजाया जाता था और जहांगीर रात्रि के समय अपनी बेगम के साथ आतिशबाजी का आनंद लेते थे।

शाहजहां और उनके बेटे दारा शिकोह ने भी दीवाली परंपरा को जीवित रखा। शाहजहां और दारा शिकोह इस त्योहार को पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाते और अपने नौकरों को बख्शीश बांटते थे। उनकी शाही सवारी रात्रि के समय शहर की रोशनी देखने निकलती थी।
आखिरी मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर का दीवाली मनाने का निराला ही अंदाज था। जफर की दीवाली तीन दिन पहले ही शुरू हो जाती थी। दीवाली के दिन वे तराजू के एक पलड़े में बैठते और दूसरा पलड़ा सोने-चांदी से भर दिया जाता था। तुलादान के बाद यह सब गरीबों को दान कर दिया जाता था। तुलादान की रस्म-अदायगी के बाद किले पर रोशनी की जाती थी। कहार खील-बतीशे, खांड और मिट्टी के खिलौने घर-घर जाकर बांटते। गोवर्धन पूजा के दिन नागरिक अपने गाय-बैलों को मेंहदी लगाकर और उनके गले में शंख और घुंघरू बांधकर जफर के सामने पेश करते। जफर उन्हे इनाम देते व मिठाई खिलाते थे।

कुछ आसपास की - दिवाली के अगले दिन छिड़ेगा हिंगोटा युद्ध



मध्यप्रदेश के इंदौर जिले में गौतमपुरा और रुणजी गांवों के जांबाज लड़ाके 'हिंगोट युद्ध' की सदियों पुरानी परंपरा निभाने के लिए सावधान की मुद्रा में आते दिख रहे हैं।
यह रिवायती जंग दिवाली के अगले दिन यानी विक्रम संवत की कार्तिक शुक्ल प्रथमा को यहां से 55 किलोमीटर दूर गौतमपुरा में छिड़ती है। इसमें एक खास किस्म के हथियार 'हिंगोट' को दुश्मनों पर दागा जाता है। हिंगोट दरअसल एक जंगली फल है, जो हिंगोरिया नाम के पेड़ पर लगता है। आंवले के आकार वाले फल से गूदा निकालकर इसे खोखला कर लिया जाता है। इसके बाद इसमें कुछ इस तरह से बारुद भरी जाती है कि आग दिखाने पर यह किसी अग्निबाण की तरह सर्र से निकल पड़ता है। इसे देसी ग्रेनेड के नाम से भी जाना जाता है।
हिंगोट युद्ध गौतमपुरा और रुणजी के लड़ाकों के बीच सदियों से होता आ रहा है। गौतमपुरा के योद्धाओं के दल को 'तुर्रा' नाम दिया जाता है, जबकि रुणजी गांव के लड़ाके 'कलंगी' दल की ओर से हिंगोट युद्ध की कमान संभालते हैं। फिजा में बिखरे त्योहारी रंगों और पारंपरिक उल्लास के बीच कार्तिक शुक्ल प्रथमा को सूरज ढलते ही हिंगोट युद्ध का बिगुल बज उठता है। इस अनोखी जंग के गवाह बनने के लिए हजारों दर्शक दूर-दूर से गौतमपुरा पहुंचते हैं।
इस जंग में 'कलंगी' और 'तुर्रा' दल के या एक-दूसरे पर कहर बनकर टूटने के उत्साह से सराबोर और हिंगोट व ढाल से लैस होते हैं। गौतमपुरा नगर पंचायत के अध्यक्ष विशाल राठी ने बताया कि हिंगोट युद्ध धार्मिक आस्था और शौर्य प्रदर्शन, दोनों से जुड़ा है। इसमें जीत-हार के अपने मायने हैं। उन्होंने कहा कि इस बार भी हिंगोट युद्ध में कलगी और तुर्रा दल के बीच रोचक टकराव होने के आसार हैं। दोनों दलों के योद्धा महीनों से भिड़ंत की तैयारी कर रहे हैं। राठी ने कहा कि धार्मिक आस्था के मद्देनजर हिंगोट युद्ध में पुलिस और प्रशासन रोड़े नहीं अटकाते, बल्कि 'रणभूमि' के आस-पास दर्शकों की सुरक्षा व घायलों के इलाज का इंतजाम करते हैं।

शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2009

याद-ए-वतन आती है दूर तक समझाने को....

एक शायर ने लिखा है कि 'हमने जब वादी ए गुरबत में कदम रखा था, दूर तक याद ए वतन आई थी समझाने को'..कुछ ऐसा ही हाल उन भारतीयों का भी होता है जो परदेश में जा बसे हैं और अपनी पेशेवराना जिम्मेदारियों के चलते दीपावली जैसे बड़े त्योहार पर वतन नहीं आ पाते। इसके बाद भी वह दूसरे देश की सरजमीं पर पूरे जोश के साथ त्योहार मनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते।



अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया और ब्रिटेन ऐसे कुछ देश हैं जहां प्रवासी भारतीयों की संख्या काफी ज्यादा है। इन देशों में भारतीयों के अपने-अपने आस्था स्थल भी हैं जहां लोग इकट्ठा होकर त्योहार के दौरान वतन में होने जैसा अहसास पाते हैं।
कनाडा निवासी गुरमनजोत कौर ने कहा कि दीपावली पर अपने देश की याद सबसे ज्यादा आती है लेकिन ऐसे में दिल को समझाने का तरीका यही होता है कि आप विदेश में भी रहते हुए अपने त्योहार को धूमधाम से मनाएं। उन्होंने कहा कि कनाडा और खासकर टोरंटो में हिंदुओं के मुकाबले सिखों की तादाद काफी है लेकिन फिर भी दीपावली पर यहां उत्सवी माहौल कम नहीं होता। पराया देश होने के कारण यहां दिवाली पर छुट्टी नहीं मिलती लेकिन फिर भी सभी अपना काम निपटा कर गुरुद्वारे जाते हैं और वहां अरदास की जाती है।
चंडीगढ़ की मूल निवासी कौर ने कहा कि हम गुरुद्वारे और घर में मोमबत्तियां और दीए जलाते हैं। काफी आतिशबाजी की जाती है। सब एक दूसरे से मिलने भी जाते हैं। खास बात यह होती है कि इस दिन सभी भारतीय परिधान पहनते हैं।
कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी से एम एस करने एक साल पहले अमेरिका गए कुंदन पाटीदार ने कहा कि अमेरिका में न्यूयॉर्क और कैलिफोर्निया ऐसे दो बड़े शहर हैं जहां भारतीयों की तादाद काफी ज्यादा है। यहां 'एसोसिएशन ऑफ इंडियंस इन अमेरिका' भी सक्रिय है जिसके जरिए अधिकतर भारतीय एक दूसरे से संपर्क में रहते हैं।
उन्होंने कहा कि दीपावली पर अपने देश में नहीं होने पर सबसे ज्यादा यह बात सालती है कि आप हर घर को रोशनी से नहाए और आसमान में आतिशबाजी को नहीं निहार सकते।
कुंदन कहते हैं कि यहां 'साउथ स्ट्रीट सीपोर्ट' में 17 अक्टूबर को उत्सव मनाया जाएगा। इस दौरान आतिशबाजी और अन्य कार्यक्रम होंगे। लंदन में एचसीएल में साफ्टवेयर पेशेवर ज्ञानेंद्र चतुर्वेदी भी मानते हैं कि ब्रिटेन में भले ही दीपावली का जश्न अच्छी तरह मनाया जाता हो लेकिन अपने वतन में होने की बात कुछ और ही होती है।
उन्होंने बताया कि लंदन में भारतीयों की आबादी चार लाख के आसपास है। इसके चलते दीपावली पर होने वाले उत्सव में यह अहसास नहीं होता कि आप अपनों के बीच नहीं हैं। फिर भी अपने देश की याद आती जरूर है।
चतुर्वेदी ने कहा कि यहां साउथ हॉल में हर साल दीयों और आतिशबाजी के साथ दीपावली मनाई जाती है। इस बार भी यहां अधिकतर प्रवासी इकट्ठे होंगे और त्योहार मनाएंगे।

दीवाली के साथी


जरा कल्पना कीजिये, मोमबत्ती, मिठाई व आतिशबाजी नहीं होते, तो हम दीवाली कैसे मनाते? इन तीन के बिना कितनी फीकी होती हमारी दीवाली । क्या दीवाली भी सामान्य त्योहारों की तरह ही बनकर नहीं रह जाती?
क्यों आप सोच में पड़ गए न!? चलो पता करते हैं इन तीन के बारे में कि वे सबसे पहले कब और कैसे आई? हमने कब जाना कि मिठाई जैसी कोई चीज है और आतिशबाजी या मोमबत्ती का प्रचलन किस तरह से शुरू हुआ? है न ये कुछ रोचक सवाल? ऐसे सवाल, जो शायद कभी आपके जेहन में न आए हों, पर अब इन्हें जानकर दीवाली के सेलिब्रेशन का मजा कुछ और बढ़ जाएगा।
 
[चीनी नहीं इंडियन साल्ट]


दीवाली पर मिठाइयों के साथ-साथ आपको चॉकलेट्स, टॉफियां भी उपहार में मिलती होंगी। पर चीनी के बिना ये चीजें होतीं क्या? शहद में यदि ये तैयार भी होती, तो शायद इसमें चीनी जैसा आनंद न होता।
चीनी पहली बार कब बनी? इसे जानने के पचड़े में हमें नहीं पड़ना, पर यह जरूर जान लें कि चीनी से पहले दुनिया ने शहद का प्रयोग किया। और जब चीनी का प्रयोग शुरू हुआ, तब यह महज दवाई के तौर पर इस्तेमाल होती थी। ग्रीक सभ्यता में चीनी सैकरोन कहलाती थी। भारत में चीनी मिलने के प्रमाण अन्य स्त्रोतों के अलावा, ग्रीक फिजिशियन डायोसोरिडस से भी मिला है। उन्होंने मध्यकाल में पंजाब क्षेत्र में मिलने वाली मीठे और सफेद नमक जैसी चीज को इंडियन साल्ट कहा था।
 
[आतिशबाजी का आविष्कार]


सही मायने में आतिशबाजी की परंपरा तब शुरू हुई, जब चीनियों ने बारूद का आविष्कार किया। वे इटली के व्यापारी मार्कोपोलो थे, जिन्हें चीन से यूरोप बारूद लाने का श्रेय दिया जाता है। धीरे-धीरे जब बारूद दुनिया भर में पॉपुलर हुआ, तो आतिशबाजी भी प्रत्येक उत्सव और त्योहारों का अंग बनने लगी। चीनी बौद्ध भिक्षु ली तियान को पटाखे का आविष्कारक मानते हैं। इस आविष्कारक को श्रद्धांजलि देने लिए ही वे हर वर्ष 18 अप्रैल के दिन को सेलिब्रेट करते हैं। यह जानना बड़ा रोचक है कि सदियों पहले लोग इन आवाजों के लिए हरे बांस का प्रयोग करते थे। चीन में किसी उत्सव या खास दिन को सेलिब्रेट करने के लिए लोग ढेर सारे हरे बांस के गट्ठर को आग में झोंककर दूर हट जाते और इसके थोड़ी देर बाद ही जोरदार धमाके का लुत्फ उठाते थे। बहरहाल, अभी जो आप लोग आतिशबाजी से रंग-बिरंगी रोशनी का आनंद लेते हो, पहले यह नहीं था। केवल नारंगी रंग की रोशनी ही हरे बांस के गट्ठर के जलने के दौरान नजर आती थी। वे इटली के रसायन विज्ञानी थे, जिन्होंने आतिशबाजी को रंगीन बनाया। दरअसल, इन्होंने ही लाल, हरे, नीले और पीले रंग पैदा करने वाले रसायन की खोज की। ये रसायन थे क्रमश: स्ट्रांशियम , बेरियम , कॉपर (नीला) और सोडियम (पीला)।
जब पोटाशियम क्लोरेट, बेरियम और स्ट्रांशियम नाइट्रेट जैसे रसायन के आविष्कार हुए, तब भारत में भी कई आतिशबाजी कंपनियां आई और पटाखों का उत्पादन तेजी से शुरू हुआ। इनमें स्टैंडर्ड फायरव‌र्क्स लिमिटेड, शिवकाशी एक ब्रांड नेम है। आज कोरिया, इंडोनेशिया, जापान के पटाखे भी आपको बाजार में मिल जाएंगे। बटरफ्लाई, स्पिनव्हील्स, फ्लॉवर पॉट्स इन खास आतिशबाजियों के नाम हैं। इनमें से कई ऐसे हैं, जिनको जलाने के लिए चिंगारी की नहीं, रिमोट की जरूरत पड़ती है।

[चर्बी से मोम तक]


प्राचीन सभ्यताओं में जानवरों के खाल की वसा और कीट पतंगों से मिले मोम को पेपर ट्यूब्स में डालकर मोमबत्ती बनाने के प्रमाण हैं। अमेरिकी कैंडल फिश नामक तैलीय मछली का उपयोग मोमबत्ती जैसी चीज बनाने के लिए करते थे। जब पैराफिन का आविष्कार हुआ, तब से चर्बी के प्रयोग की परंपरा बिल्कुल बंद हो गई।
कहते हैं मधुमक्खी के छत्ते से मोम बनाने की शुरुआत तेरहवीं सदी में हुई। इस पेशे में रहने वाले लोग घूम-घूमकर अपने कस्टमर की डिमांड के अनुसार चर्बी वाली या मधुमक्खी के छत्ते से मिले मोम से बनी मोमबत्ती बेचते थे। फिर स्टीरिक एसिड (मोम को कड़ा करने वाला केमिकल) और गुंथी हुई बातियों का इस्तेमाल होने के बाद मोमबत्ती ने नया स्वरूप ग्रहण किया। आज कई तरह की डिजाइनर मोमबत्तियां आ गई हैं। ऑयल कैंडल, फ्रेगरेंस वाली कैंडल और न जाने कितने प्रकार के कैंडल्स आप मार्केट में देख सकते हैं ।
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क्यों कि अब सब साधन मौजूद है चलिए दीवाली मानते है !



आपको और आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं !

और भी देशों में होता है रोशनी का जलसा



रोशनी का महत्व सिर्फ भारत के सबसे बड़े त्योहार दीपावली भर में नहीं है, बल्कि दुनिया के कुछ और देशों में भी है जहां क्रिसमस से पहले आस्था या मान्यताओं के कारण लोग अपने घरों में प्रकाश को अहमियत देते हैं।
वैसे, ऐसे ज्यादातर देशों में रोशनी के त्योहार क्रिसमस से जुड़े हैं जिनके तहत ईसा मसीह के जन्मदिन से पहले कुछ हफ्तों या दिनों तक नियमित तौर पर दीप या मोमबत्तियां जलाई जाती हैं। लेकिन कुछ देश ऐसे भी हैं जहां रोशनी के जलसे के पीछे की कहानी हजारों साल पुरानी और दिलचस्प है।
अगर शुरुआत 'हनुक्का' से करें तो यहूदी धर्म मानने वालों में रोशनी का यह पर्व मनाने का सिलसिला काफी पुराना है। इसके पीछे एक दिलचस्प कहानी है। ईसा के जन्म से पूर्व 165वीं शताब्दी में मैकाबी और सीरिया के लोगों के बीच अब के इजरायल के आसपास संघर्ष हुआ था। संघर्ष क्षेत्र में रोशनी के लिए महज एक दिन का तेल बचा लेकिन लोगों ने पाया कि उनके साथ एक चमत्कार हुआ और एक दिन का तेल आठ दिन तक चला। इसके बाद से यहां भी यहूदी कैलेंडर के मुताबिक दिसंबर के आसपास नौ मोमबत्तियां जलाने की परंपरा शुरू हो गई।
हॉलैंड में भी रोशनी के उत्सव के पीछे कहानी कुछ ऐसी ही है। कहा जाता है कि यहां एक बार मर्टिन नाम का एक व्यक्ति बर्फीले तूफान के बीच अपने घर लौट रहा था। उसने एक लबादा पहन रखा था। अचानक उसने अंधेरे में एक व्यक्ति को बैठे देखा। उसने व्यक्ति पर दया दिखाई और उसे अपना लबादा दे दिया।
मार्टिन एक संत थे और उनके दयाभाव के सम्मान में हॉलैंड में हर वर्ष 11 नवंबर को रोशनी का पर्व मनाया जाने लगा। इस दिन बच्चे लालटेन लेकर घर-घर जाते हैं और गीत गाते हैं। थाइलैंड में नवंबर में पूर्णिमा के दिन दीप पर्व मनाया जाता है। इस दिन 'क्रेथोन्ग' यानी केले के पत्तों से बने कमल के आकार के पात्र में एक दीया, कुछ फूल और सिक्के लेकर लोग नदी किनारे जाते हैं। दीया जलाने के बाद प्रार्थना की जाती है। माना जाता है कि पूर्णिमा के दिन 'क्रेथोन्ग' को नदी किनारे ले जाने से दुर्भाग्य दूर हो जाता है।
स्वीडन में क्रिसमस से पहले तक मौसम बहुत ठंडा हो चुका होता है। दिसंबर के महीने में यहां दिन में बमुश्किल कुछ घंटे ही धूप खिलती है। क्रिसमस से पहले 13 दिसंबर को स्वीडन के लोग 'सेंट लूसिया डे' मनाते हैं जो एक तरह का दीप उत्सव ही होता है। इस दिन लोग अपने घरों में खास तौर पर प्रकाश व्यवस्था करते हैं। फ्रांस में दीपावली की किस्म का ही एक त्योहार मनाया जाता है। दिसंबर में क्रिसमस से पहले चार दिन लगातार रविवार मोमबत्तियां जलाई जाती हैं। कुछ परिवार लकड़ियां भी जलाते हैं जिसका मकसद ईसा मसीह के जन्म से पहले के चार रविवार रोशन करना होता है।
म्रिस की बात करें तो यहां अधिकतर ईसाई 'कॉप्टिक आर्थोडॉक्स' गिरिजाघर को मानते हैं। यहां छह और सात जनवरी को क्रिसमस मनाया जाता है। इस दौरान गिरिजाघरों और घरों को रोशनी से सजाने के अलावा गरीबों को भी मोमबत्तियां देने की परंपरा है। मिस्र में यह उत्सव चार सप्ताह से लेकर 45 दिन तक चलता है। दिलचस्प बात यह है कि मासांहार के शौकीन मिस्र के लोग इस उत्सव के दौरान उपवास रखते हैं और शाकाहार ही लेते हैं।
फिलिपीन में एशिया में सबसे ज्यादा ईसाई रहते हैं। यहां क्रिसमस से नौ दिन पहले एक विशेष 'मास' [प्रार्थना] होता है जिसमें ईसा मसीह के जन्म की बात सुनाई जाती है। इस दौरान पूरे नौ दिन सितारे के आकार वाले दीए लगाए जाते हैं। नौ दिन के उत्सव के दौरान एक दीप यात्रा भी निकाली जाती है जिसमें लोग सितारे के आकार वाला दीया अपने साथ लेकर चलते हैं।
मैक्सिको में भी क्रिसमस से नौ दिन पहले लोग एक दूसरे के घर जली हुई मोमबत्तियां लेकर जाते हैं। चीन में ईसाई अल्पसंख्यक हैं और उनमें क्रिसमस में 'क्रिसमस ट्री' में पूरी तरह रोशनी करने की परंपरा है। लेकिन मूल चीन के लोग जनवरी के अंत में चीनी नववर्ष मनाते हैं और इस दौरान खासकर घरों के अंदर रोशनी करने का महत्व रहता है।
ब्राजील में रोशनी का उत्सव नववर्ष से जुड़ा है जब इस देश के लोग 31 दिसंबर की रात जल की अफ्रीकी देवी 'इएमांजा' की पूजा करते हैं। वे मानते हैं कि इस दिन सैंकड़ों मोमबत्तियां जलाने से देवी उन्हें दुआ देगी। कवांजा में हर वर्ष 26 दिसंबर को अफ्रीकी फसलों का त्योहार मनाया जाता है। इस दौरान हर परिवार एक सप्ताह तक सात मोमबत्तियां या दीए जलाता है।

गुरुवार, 15 अक्तूबर 2009

हैप्पी बर्थडे चाचा कलाम !!

आज हम सब के चहेते, भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ.ऐ.पी.जे.अब्दुल कलाम का जन्मदिन है !
 

डॉ..पी.जे.अब्दुल कलाम का जन्म तमिलनाडु में १५ अक्टूबर सन १९३१ को हुआ थाडॉ. .पी.जे.अब्दुल कलाम सन २००२ से २००७ तक भारत के राष्ट्रपति रहे हमारे देश के राष्ट्रपति बनने से पहले डॉ..पी.जे.अब्दुल कलाम इसरो में साइंटिस्ट भी रहे हैहमारे देश में डॉ.कलाम को 'मिसाईल मैन ऑफ़ इंडिया' के नाम से भी जाना जाता हैडॉ.कलाम ने भारत में स्पेस टेक्नोलोजी में महत्वपूरण योगदान दियासन १९९८ में भारत में पोखरण परमाणु परीक्षण के समय डॉ.कलाम  ने अहम् भूमिका अदा की। आज भी डॉ.कलाम अन्ना यूनिवर्सिटी, चेन्नई में प्रोफ़ेसर है और भारत के विभिन्न रिसर्च संस्थानों में भी समय समय पर अपने विचारो और ज्ञान से छात्रो को मार्गदर्शित करते रहते हैं।

डॉ.कलाम ने अपनी पढाई के लिए एक अखवार विक्रेता का कार्य भी किया इस बात का विवरण उन्होने अपनी पुस्तक "A Boy and His Dream" में किया हैडॉ.कलाम ने काफी प्रेणादायक पुस्तके भी लिखी हैं, उन्होने अपनी पुस्तक "Wings Of Fire" में भारतीय युवको को मार्गदर्शित किया हैउन्होने अपनी पुस्तक "Guiding Souls Dialougues on the Purpose of Life" में अपने अध्यात्मिक विचारो का विवरण किया हैडॉ.कलाम तमिल भाषा में कविता भी लिखते हैं


डॉ.कलाम ने "Madras Institute Of Technology " से Areonautical Engineering से Graducation कीडॉ.कलाम ने  भारत के प्रथम "Satellite Launch Vehicle(SLV-III)" के  Project दिरेक्टोर के पद पर भी काम किया हैइसके बाद डॉ.कलाम ने भारत की प्रमुख मिसाईल अग्नि और प्रथ्वी के विकास में भी Chief Executive की भूमिका अदा की हैडॉ.कलाम सन १९९२ से १९९९ तक "Department of Defence Research & Development" के प्रमुख वैज्ञानिक सलहाकार भी रहे हैडॉ.कलाम को अब तक ३० से भी अधिक विश्वविद्यालय  Doctrate की उपाधि प्रदान कर चुके हैं


भारत सरकार ने डॉ.कलाम को सन १९८१ में पदम् भूषण और सन १९९० में पदम् विभूषण की उपाधि से सम्मानित किया है और सन १९९७ में उनको इसरो में महत्वपूरण कार्यो और योगदान के लिए भारत रतन की उपाधि से भी सम्मानित किया है

डॉ.कलाम विज्ञानं द्वारा समाज की समस्याओ को दूर करने में विश्वास रखते हैडॉ.कलाम ने अपनी पुस्तक "इंडिया २०२०" में भारत को एक 'नालेज पॉवर' और विकसित देश बनने के एक्शन प्लान पर महत्व दिया हैडॉ.कलाम आज भी विज्ञानं के विकास कार्यो में समय समय पर अपना योगदान देते रहते हैं

उनका कहना है कि, "हम सबको सपने देखने चाहिए फिर उन सपनो को पूरा करने के लिए मेहनत करनी चाहिए जब तक कि हमारे सपने पूरे हो जाए ।" 
 
( साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन से साभार  )                       
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डॉ..पी.जे.अब्दुल कलाम को सभी मैनपुरी वासीयों की ओर से जन्मदिन की बहुत बहुत हार्दिक बधाईयां और शुभकामनयें !


बॉस को शुक्रिया कहने का दिन कल - 16 अक्टूबर


यदि बॉस ने आपकी तरक्की या आपके कल्याण के लिए कुछ किया है तो 16 अक्टूबर का दिन उसका शुक्रिया अदा करने के लिए सबसे उपयुक्त दिन है, क्योंकि इस तारीख को बॉस दिवस जो पड़ता है।
हालांकि बहुत से परामर्शदाता यह भी मानते हैं कि यदि बॉस ने आपके लिए कुछ नहीं किया है, तब भी मधुर संबंध बनाए रखने के लिए किसी न किसी बहाने 16 अक्टूबर को उनको शुक्रिया जरुर बोलिए।
बॉस डे की शुरुआत 1958 में अमेरिका के डीरफील्ड, इलिनोइस स्थित फार्म इंश्योरेंस कंपनी की सचिव पैट्रिसा बेज हैरोस्की ने की थी। भारत में हालांकि यह दिवस लोकप्रिय नहीं है और बहुत से लोग इसके बारे में नहीं जानते। हिंदुस्तान कंप्यूटर्स लिमिटेड में अभियंता के रूप में कार्यरत ऋषि कुमार ने कहा कि वह बॉस डे के बारे में नहीं जानते और बॉस का आभार व्यक्त करने के लिए किसी दिन विशेष की जरूरत भी नहीं समझते। वैसे उनके अपने बॉस के साथ दोस्ताना रिश्ते हैं।
अमेरिका में 16 अक्टूबर को इस दिन की शुरुआत इसलिए हुई, क्योंकि इस तारीख को पैट्रिसा के बॉस का जन्मदिन था। इसलिए उन्होंने यूएस चैम्बर ऑफ कॉमर्स में इस दिन का पंजीकरण बॉस डे के रूप में करा दिया। पंजीकरण के चार साल बाद 1962 में इलिनोइस राज्य के गवर्नर ओटो केरनर ने भी हैरोस्की की पहल का समर्थन किया और 16 अक्टूबर को बॉस डे मनाए जाने की आधिकारिक घोषणा कर दी।
इसके बाद अमेरिका में यह दिन काफी लोकप्रिय हो गया और अब इसे वहां राष्ट्रीय बॉस दिवस का दर्जा मिल गया है। अमेरिका से निकलकर बॉस डे अब ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका और आयरलैंड जैसे देशों में भी मनाया जाने लगा है। अमेरिका में बॉस डे के अस्तित्व में आने के बाद कई ऐसी किताबें भी लिखी गईं जिनमें बॉस से मधुर संबंध स्थापित करने के तौर-तरीके बताए गए हैं। हेनरी रिच‌र्ड्सन की पुस्तक 'बॉस एंड हिज एंप्लॉई' में कहा गया है कि यदि जीवन में आगे बढ़ना है तो हर हाल में बॉस से बनाकर रखिए।
उन्होंने लिखा है कि यदि बॉस तुनकमिजाज हो तो अत्यंत सावधानी बरतने की जरूरत है। जब वह गुस्से में हो तो उसकी बात को कभी मत काटिए और हां में हां मिलाइए। कोई भी काम करने से पहले उसका परामर्श जरूर लीजिए। इससे बॉस और कर्मचारी के बीच स्वस्थ संबंधों का विकास होगा।
समाजशास्त्री स्वर्ण सहगल का कहना है कि बॉस का आभार व्यक्त करने के लिए किसी खास दिन की जरूरत नहीं है। आभार कभी भी व्यक्त किया जा सकता है। उनका कहना है कि बॉस और अधीनस्थ कर्मचारी, दोनों समाज का ही हिस्सा हैं और उन्हें एक दूसरे के साथ सामाजिक व्यवहार करना चाहिए। बॉस में न तो अहं और तुनकमिजाजी होनी चाहिए और न ही कर्मियों में बॉस के आदेश का उल्लंघन करने की मनोवृत्ति होनी चाहिए।

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