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रविवार, 28 फ़रवरी 2010

मोहे अपने ही रंग मैं रंग दे

देख बहारें होली की...

होली को दुनिया का सबसे क्रिएटिव पर्व कह सकते हैं.जितनी वेरायटी इस पर्व में नज़र आती है इतनी शायद किसी और में नही है......यूँ तो होली के रंग मैं कई रंग है.होली का अपना एक दर्शन है.जिसमें खुशी है .....मोहब्बत हैं....... शरारत है.....और तो और इसमें अध्यात्म भी है.यही कारण है कि होली के रंग और ढंग पर बहुत कुछ लिखा गया.मथुरा से लेकर मुल्तान तक होली के रंग दिखाई देते हैं.मैनपुरी चूँकि ब्रज प्रान्त का ही एक हिस्सा है.इस कारण होली यहाँ का बेहद खास पर्व माना जाता है.मैनपुरी की सीमा से लगे एटा जनपद में हज़रत अमीर खुसरो का जन्म हुआ था.होली को नया रंगों देने हज़रत अमीर खुसरो का खास योगदान है.होली को सूफियाना रंगों मैं रगने का काम खुसरो ने ही किया.......
मोहे अपने ही रंग मैं रंग दे
तू तो साहिब मेरा महबूब इलाही
हमारी चुनरिया पिया की पयरिया वो तो दोनों बसंती रंग दे
जो तो मांगे रंग की रंगाई मोरा जोबन गिरबी रख ले
आन परी दरवार तिहारे
मोरी लाज शर्म सब ले
मोहे अपने ही रंग मैं रंग दे
हज़रत अमीर खुसरो ने होली को परमात्मा से जोड़दिया .खुसरो यहाँ अपने मुर्शिद यानि खुदा से कह रहे है की मुझे अपने ही रंग मैं रंग दो..होली की खासियत ये है की दुनिया का ये सबसे सस्ता और अनूठा पर्व है,इस पर्व को मनाने के लिए दिल में प्यार होना चाहिए.सब्र और तमन्ना इस पर्व को मानाने के लिया दो अहम् चीजें हैं.मैनपुरी में होली सभी धर्मों के लोग दिल से मानते हुए देख जा सकतें है.होली पर नजीर अकबराबादी ने भी खूब लिखा है.... और क्या खूब लिखा है.गोर फरमाएं ...
परियों के रंगों दमकते हों
खूं शीशे जाम छलकते हों
महबूब नशे मैं छकते हों
जब फागन रंग झमकते हों
तब देख बहारें होली की.
एक और दखें -
तुम रंग इधर लाओ और हम भी इधर आवें
कर ऐश की तेयारी धुन होली की बर लावें
और रंग की बूंदों की आपस मैं जो ठहराबें
जब खेल चुकें होली फ़िर सिने से लग जावें

होली का यही एक रंग नही है.होली के रंग में डूबने के लिए होली के दर्शन को समझना होगा.इसके मायने जानने होंगें...होली हमारी संस्कृति की श्रेष्ठता को दर्शाती है.....होली हमारी पुरातन बोधिक क्षमता के विकसित होने का प्रमाण देती है...कोई शक नही है की सम्प्रिदयिकता के इस माहोल में होली ही ऐसा पर्व है जो हर दूरी को कम कर सकती है...हर दीवार को गिराने का दम रखती है.......तो देख बहारें होली की.........

हृदेश सिंह

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

रफ़्तार....

छोटे होते जिले
मैनपुरी जैसे छोटे शहरों का विकास थम गया है.प्रदेश में २० लाख से कम आबादी वाले शहरों के तादात हालाकिं कम हैं.बाबजूद जिस रफ़्तार से इन जिलों का विकास होना चाहिए था उस तरह से नहीं हो सका है. राजनेतिक लालच...स्वार्थ...और वेय्क्तिगत सोच ने इन जिलों की खूबसूरती छीन ली है. ये जिले शहरी करण के शानदार नमूने कहे जा सकते हैं. सुकून....अपनापन...सादगी..दौड़ भाग से दूर जिंदगी का लुत्फ़....इन जिलों की सबसे बड़ी खूबसूरती है. ज़ेहन को सुकून और दिल को रहत देने वाली ये चीजें रफ्ता रफ्ता अब इन जिलों से नदारत जारी रहें हैं. एक खली पन इन जिलों को खाता जा रहा...
मैनपुरी जिले की सीमा तीन पडोसी जिलों को स्पर्श करती है...पहली इटावा...दूसरी फर्रुक्खावाद और तीसरी एटा,ये जिले पुरा पाषाण काल से भी सम्बद्ध हैं.जैसे पूरा पाषाण काल के सुबूत सैफई से मिलते हैं....गुप्त कल के सुबूत फर्रुक्खावाद की ज़मीन से और एटा से दिल्ली सल्तनत से नजदीक होने का प्रमाण मिलता है. मशहुर सूफी संत और इतिहासकार हजरत अमीर खुसरो इस ज़मीन की पैदाइश हैं.इस लिए इन जिलों का बनना और संवरना दोनों मायने रखता है.इन जिलों की जनता से मेरा हर दिन का नाता है.....इन लोगों से बात होती है तो जैसे ये लोग थक गए हैं.जोश..उत्साह अब यहाँ रहने वालों के चेहरे से गायब हैं.कुल मिलाकर इन जिलों में वक्त थम गया है.
बात पुरानी नहीं है....इन जिलों में बचपन की छुट्टियाँ बिताने का अलग मजा था.गावं...नाना-नानी और उनकी कहानी ये है ये इन जिलों की निशानी थीं.....अब ऐसा नहीं है....बच्चे अब दादी- नानी की कहानियों से दूर डोरे मोन और सिन चेन की दुनियां में अधिक मशरूफ है.मैं कई दादी और नानी को जनता हूँ जिन से मिलने अब उनके पोते पोती नहीं आते है.अपनों से दूर रहने का गम इनकी झुर्रियों से साफ झलकता है...सब कुछ तेज़ी से बदल रहा है.सोच संस्कार और लोकाचार.शायद यही कारण हैं कि अब इन जिलों में भी फादर्स डे...मदर्स डे...रोज़ डे...इंतजार के साथ मनाये जाने लगें हैं...नयी पीढ़ी को इन जिलों में करियर के साथ अब पढाई का भी स्कोप नजर नहीं आता है.इसीलिए इन जिलों के स्कूलों में अब पढाई का स्तर गिर रहा हैं. ये जिले बेहद छोटे हैं.....सब एक दुसरे से किसी न किसी रूप से जुड़े हैं.ऐसे में गलती की गुन्जायिश कम...लेकिन नई पीढ़ी के लिए ये किसी बंदिस से काम नहीं है...मोल...मल्टी प्लेक्स और पार्क नई पीढ़ी के लिए जैसे ये सिलेबस का हिस्सा बन गयें हैं.यही वजह है कि नई पीढ़ी इन जिलों को छोड़ कर महानगरों का रुख कर रही है.....मानो! ये जिले अब और छोटे हो रहे हैं....

बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के जन्म दिवस पर खास

.....कोई इनकी सोई हुई दुम हिला दे

स नई पोस्ट में आज उर्दू अदब की अज़ीम-ओ -शान शख्सियात फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का ज़िक्र करने जा रहा हूँ.पिछले तीन सालों से में फ़ैज़ पर लिखने की कोसिस में था...कभी मोका नहीं....मसरूफियत में कभी वक्त निकल गया.....फ़ैज़ साहब का नाम मेरे कानों में तब पहली बार आया जब मैं जवाहर लाल यूनिवर्सटी केम्पस में पत्रकारिता की पढा कर रहा था.उस दिन तारीख 13 फ़रवरी थी.....फैज़ साहब का जन्म 13 फ़रवरी 1911 में पकिस्तान के सियालकोट में हुआ था. गंगा हॉस्टल में फ़ैज़ पर एक विचार गोष्ठी का आयोजान किया गया.फ़ैज़ साहब से इस तरह ये पहली मुलाकात थी....चंद पलों की मुलाकात में उनकी शायरी का कायल हो गया.फ़ैज़ हर दौर के शायर हैं...उनकी शायरी की बेहतरीन बात...उनकी शायरी इक मिशन को लेकर आगे बढती है.उर्दू अदब के फ़ैज़ सबसे हिम्मती शायर मालूम पड़ते हैं.उनके किस्से और शायरी दोनों ही इंसान को मुतासिर करने का दम रखती हैं.यूँ तो उनकी हर नज़्म और ग़ज़ल दिल में उतर जाती है......फिर भी फ़ैज़ साहब की कुछ नज़्म और ग़ज़ल ऐसी है जो मेरी सबसे अज़ीज़ हैं....इनमें से इक है....

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे

बोल ज़बाँ अब तक तेरी है
तेरा सुतवाँ जिस्म है तेरा
बोल कि जाँ अब तक् तेरी है
देख के आहंगर की दुकाँ में
तुंद हैं शोले सुर्ख़ है आहन
खुलने लगे क़ुफ़्फ़लों के दहाने
फैला हर एक ज़न्जीर का दामन
बोल ये थोड़ा वक़्त बहोत है
जिस्म-ओ-ज़बाँ की मौत से पहले
बोल कि सच ज़िंदा है अब तक
बोल जो कुछ कहने है कह ले

फ़ैज़ साहब ता- जिंदगी दुश्वारियां से झुझते रहे बावजूद फ़ैज़ साहब ने कभी हालत से समझोता नहीं किया.उस दौर में जब फ़ैज़ साहब का लिखा शेर जैसे ही बाज़ार में आता तो पाकिस्तान की हुकूमत हिलने लगती थी.उनकी शायरी की दबाने के लिए पाकिस्तान सरकार ने नजर बंद भी किया....

निसार मैं तेरी गलियों के अए वतन, कि जहाँ
चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले
जो कोई चाहनेवाला तवाफ़ को निकले
नज़र चुरा के चले, जिस्म-ओ-जाँ बचा के चले

है अहल-ए-दिल के लिये अब ये नज़्म-ए-बस्त-ओ-कुशाद
कि संग-ओ-ख़िश्त मुक़य्यद हैं और सग आज़ाद

बहोत हैं ज़ुल्म के दस्त-ए-बहाना-जू के लिये
जो चंद अहल-ए-जुनूँ तेरे नाम लेवा हैं
बने हैं अहल-ए-हवस मुद्दई भी, मुंसिफ़ भी
किसे वकील करें, किस से मुंसिफ़ी चाहें

मगर गुज़रनेवालों के दिन गुज़रते हैं
तेरे फ़िराक़ में यूँ सुबह-ओ-शाम करते हैं

बुझा जो रौज़न-ए-ज़िंदाँ तो दिल ये समझा है
कि तेरी मांग सितारों से भर गई होगी
चमक उठे हैं सलासिल तो हमने जाना है
कि अब सहर तेरे रुख़ पर बिखर गई होगी

ग़रज़ तसव्वुर-ए-शाम-ओ-सहर में जीते हैं
गिरफ़्त-ए-साया-ए-दिवार-ओ-दर में जीते हैं

यूँ ही हमेशा उलझती रही है ज़ुल्म से ख़ल्क़
न उनकी रस्म नई है, न अपनी रीत नई
यूँ ही हमेशा खिलाये हैं हमने आग में फूल
न उनकी हार नई है न अपनी जीत नई

इसी सबब से फ़लक का गिला नहीं करते
तेरे फ़िराक़ में हम दिल बुरा नहीं करते

ग़र आज तुझसे जुदा हैं तो कल बहम होंगे
ये रात भर की जुदाई तो कोई बात नहीं
ग़र आज औज पे है ताल-ए-रक़ीब तो क्या
ये चार दिन की ख़ुदाई तो कोई बात नहीं

जो तुझसे अह्द-ए-वफ़ा उस्तवार रखते हैं
इलाज-ए-गर्दिश-ए-लैल-ओ-निहार रखते हैं


फ़ैज़ साहब की इक नज़्म जिसने मुझे सबसे जियादा मुत्तासिर किया वो है...

ये गलिओं के आवारा कुत्ते

कि वक्शा गया जिनको जोंके गदाई

ज़माने की फटकार.सरमाया इनका.

जहां भर की दुत्कार इनकी कमाई

न आराम सब को न रहत सबेरे

गलाज़त में घर नालिओं में बसेरे

जो बिगाड़ें तो इक दुसरे से लड़ा दो

ज़रा इक रोटी का टुकड़ा दिखा दो

ये हर इक टोकर खाने वाले

ये फंखों से उकता के मर जाने वाले

ये मजलूम मखलूक दर सिर उठायें

तो इंसान सब सरकसी भूल जाये

ये चाहे तो दुनिया को अपना बना ले

ये आकाओं की हड्डियाँ तक चबा लें

कोई इनको अह्सासे ज़िल्लत दिला दे

कोई इनकी सोई हुई दुम हिला दे.

फ़ैज़ साहब के शायरी में मजलूम और मखलूक इन्सान की आरजू की शिकस्त साफ़ सुनाई देती है।लेकिन उनकी शायरी में इक उम्मीद है की ये लोग इक दिन जागेगें.......

हृदेश सिंह

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