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शनिवार, 31 जुलाई 2010

एक रिपोस्ट :- 'लोकमान्य' की याद में !

सही मायने में लोकमान्य थे बाल गंगाधर तिलक (२३/०७/१८५६ - ०१/०८/१९२०)



'स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, और हम इसे लेकर रहेंगे' का नारा देकर देश में स्वराज की अलख जगाने वाले बाल गंगाधर तिलक उदारवादी हिन्दुत्व के पैरोकार होने के बावजूद कट्टरपंथी माने जाने वाले लोगों के भी आदर्श थे। धार्मिक परम्पराओं को एक स्थान विशेष से उठाकर राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाने की अनोखी कोशिश करने वाले तिलक सही मायने में 'लोकमान्य' थे।
एक स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक, शिक्षक और विचारक के रूप में देश को आजादी की दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले तिलक ने कांग्रेस को सभाओं और सम्मेलनों के कमरों से निकाल कर जनता तक पहुंचाया था।
हिन्दुत्ववादी विचारक और भारतीय जनता पार्टी के पूर्व रणनीतिकार गोविन्दाचार्य ने कहा कि तिलक का उदारवादी हिन्दुत्व दरअसल अध्यात्म पर आधारित था और यही उनकी विचारधारा की विशेषता थी। गोविन्दाचार्य ने कहा कि तिलक के हिन्दुत्व के मर्म को उनकी किताब 'गीता रहस्य' का अध्ययन करके समझा जा सकता है। उन्होंने कहा कि उनके स्वराज के नारे और सभी को साथ लेकर चलने की इच्छा ने उन्हें उदारवादी और कट्टरपंथीकहे जाने वाले लोगों में समान रूप से लोकप्रिय बनाया।
महात्मा गांधी तिलक के विचारों से बेहद प्रभावित थे और गांधी के विचार तिलक की सोच का अगला चरण माने जाते हैं जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को आकार दिया था। तिलक बातचीत और विचार-विमर्श को देश की राजनीतिक स्वतंत्रता हासिल करने का सबसे अच्छा जरिया मानते थे।
प्रख्यात समाजसेवी और लेखक सुभाष गताडे ने तिलक के व्यक्तित्व के बारे में कहा कि वर्ष 1850 में गठित कांग्रेस की गतिविधियां शुरुआत में काफी वर्षों तक सिर्फ सभाओं और सम्मेलनों तक ही सीमित रही थीं लेकिन तिलक ने उसे जनता से जोड़ने की पहल की। गताडे ने कहा कि जब वर्ष 1908 में तिलक को अपने अखबार 'केसरी' में क्रांतिकारियों के समर्थन में लिखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था तो मजदूरों ने जोरदार आंदोलन किया था जिसकी वजह से पूरा मुंबई कई दिन तक बंद रहा था।
उन्होंने बताया कि लोकमान्य तिलक ने कांग्रेस को जन-जन तक पहुंचाया। उन्होंने उदारवादियों के साथ-साथ कट्टरपंथियों का भी समर्थन हासिल किया था। वह राजनीतिक स्तर पर उग्र जबकि सामाजिक सतह पर पुराने मूल्यों को प्रति संरक्षणवादी व्यक्ति थे यही वजह है कि उन्हें नरम और गरम दोनों ही तरह के व्यक्तित्व के लोगों ने अपनाया था।
तिलक द्वारा महाराष्ट्र में गणेश पूजा का चलन शुरू किए जाने पर गोविन्दाचार्य ने कहा कि तिलक का स्पष्ट मत था कि धार्मिक परम्पराओं को किसी स्थान विशेष तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचाना जाना चाहिए।
गताडे ने इस बारे में कहा कि तिलक गणेश पूजा के जरिए हिन्दू चेतना का मूल्यांकन करना चाहते थे। वह न सिर्फ अगड़ी जाति बल्कि पिछड़े वर्ग के लोगों में भी धर्म के प्रति नई चेतना जगाने के इच्छुक थे। वर्ष 1890 में कांग्रेस में शामिल हुए तिलक ने पार्टी के खांटी उदारवादी रवैए का विरोध किया। वह गोपाल कृष्ण गोखले के नरम रुख और विचारों के विरोधी थे। वर्ष 1907 में कांग्रेस के सूरत सम्मेलन के दौरान पार्टी में गरम दल तथा नरम दल के रूप में दो गुट बने और तिलक गरम दल के नेता बन गए।
वर्ष 1908 में मिली छह साल की कैद की सजा काटने के बाद लौटे तिलक ने पार्टी के दोनों गुटों को एकजुट करने की कोशिश की। गताडे ने बताया कि तिलक को महसूस हुआ कि दोनों धड़ों की कलह से कांग्रेस की विचारधारा कमजोर हो रही है लिहाजा उन्होंने अंग्रेजों को इसका फायदा नहीं लेने देने और विचारधारा को मजबूत करने के लिए दोनों गुटों को एकजुट करने की कोशिश की थी।
तेइस जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरि में मराठी चितपावन ब्राह्मण परिवार में जन्मे बाल गंगाधर तिलक कॉलेज में शिक्षा हासिल करने वाले भारतीयों की पहली पीढ़ी के सदस्य थे। उन्होंने भारतीय शिक्षण प्रणाली में सुधार के लिए डेक्कन एजुकेशन सोसायटी का गठन किया था। बकौल गोविन्दाचार्य, तिलक ने नेशनल स्कूलिंग में भारतीयता का खास ख्याल रखा था। स्वतंत्र भारत में एक संघीय सरकार के गठन की हसरत लिए तिलक का एक अगस्त 1920 को निधन हो गया।

भारत माँ के इस सच्चे सपूत को सभी मैनपुरी वासीयों का शत शत नमन |

एक रिपोस्ट - ३१ जुलाई'२०१० - अमर शहीद उधम सिंह जी की याद में !

जनरल डायर को नहीं , ओडवायर को मारा था ऊधम सिंह ने


लोगों में आम धारणा है कि ऊधम सिंह ने जनरल डायर को मारकर जलियांवाला बाग हत्याकांड का बदला लिया था, लेकिन भारत के इस सपूत ने डायर को नहीं, बल्कि माइकल ओडवायर को मारा था जो अमृतसर में बैसाखी के दिन हुए नरसंहार के समय पंजाब प्रांत का गवर्नर था।
ओडवायर के आदेश पर ही जनरल डायर ने जलियांवाला बाग में सभा कर रहे निर्दोष लोगों पर अंधाधुंध गोलियां बरसाई थीं। ऊधम सिंह इस घटना के लिए ओडवायर को जिम्मेदार मानते थे।
26 दिसंबर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गांव में जन्मे ऊधम सिंह ने जलियांवाला बाग में हुए नरसंहार का बदला लेने की प्रतिज्ञा की थी, जिसे उन्होंने अपने सैकड़ों देशवासियों की सामूहिक हत्या के 21 साल बाद खुद अंग्रेजों के घर में जाकर पूरा किया।
इतिहासकार डा. सर्वदानंदन के अनुसार ऊधम सिंह सर्वधर्म समभाव के प्रतीक थे और इसीलिए उन्होंने अपना नाम बदलकर राम मोहम्मद आजाद सिंह रख लिया था जो भारत के तीन प्रमुख धर्मो का प्रतीक है।
ऊधम सिंह अनाथ थे। सन 1901 में ऊधम सिंह की माता और 1907 में उनके पिता का निधन हो गया। इस घटना के चलते उन्हें अपने बड़े भाई के साथ अमृतसर के एक अनाथालय में शरण लेनी पड़ी।
ऊधम सिंह के बचपन का नाम शेर सिंह और उनके भाई का नाम मुक्ता सिंह था, जिन्हें अनाथालय में क्रमश: ऊधम सिंह और साधु सिंह के रूप में नए नाम मिले।
अनाथालय में ऊधम सिंह की जिंदगी चल ही रही थी कि 1917 में उनके बड़े भाई का भी देहांत हो गया और वह दुनिया में एकदम अकेले रह गए। 1919 में उन्होंने अनाथालय छोड़ दिया और क्रांतिकारियों के साथ मिलकर आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए।
डा. सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी तथा रोलट एक्ट के विरोध में अमृतसर के जलियांवाला बाग में लोगों ने 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन एक सभा रखी जिसमें ऊधम सिंह लोगों को पानी पिलाने का काम कर रहे थे।
इस सभा से तिलमिलाए पंजाब के तत्कालीन गवर्नर माइकल ओडवायर ने ब्रिगेडियर जनरल रेजीनल्ड डायर को आदेश दिया कि वह भारतीयों को सबक सिखा दे। इस पर जनरल डायर ने 90 सैनिकों को लेकर जलियांवाला बाग को घेर लिया और मशीनगनों से अंधाधुंध गोलीबारी कर दी, जिसमें सैकड़ों भारतीय मारे गए।
जान बचाने के लिए बहुत से लोगों ने पार्क में मौजूद कुएं में छलांग लगा दी। बाग में लगी पट्टिका पर लिखा है कि 120 शव तो सिर्फ कुएं से ही मिले।
आधिकारिक रूप से मरने वालों की संख्या 379 बताई गई, जबकि पंडित मदन मोहन मालवीय के अनुसार कम से कम 1300 लोग मारे गए थे। स्वामी श्रद्धानंद के अनुसार मरने वालों की संख्या 1500 से अधिक थी, जबकि अमृतसर के तत्कालीन सिविल सर्जन डाक्टर स्मिथ के अनुसार मरने वालों की संख्या 1800 से अधिक थी। राजनीतिक कारणों से जलियांवाला बाग में मारे गए लोगों की सही संख्या कभी सामने नहीं आ पाई।
इस घटना से वीर ऊधम सिंह तिलमिला गए और उन्होंने जलियांवाला बाग की मिट्टी हाथ में लेकर माइकल ओडवायर को सबक सिखाने की प्रतिज्ञा ले ली। ऊधम सिंह अपने काम को अंजाम देने के उद्देश्य से 1934 में लंदन पहुंचे। वहां उन्होंने एक कार और एक रिवाल्वर खरीदी तथा उचित समय का इंतजार करने लगे।
भारत के इस योद्धा को जिस मौके का इंतजार था, वह उन्हें 13 मार्च 1940 को उस समय मिला, जब माइकल ओडवायर लंदन के काक्सटन हाल में एक सभा में शामिल होने के लिए गया।
ऊधम सिंह ने एक मोटी किताब के पन्नों को रिवाल्वर के आकार में काटा और उनमें रिवाल्वर छिपाकर हाल के भीतर घुसने में कामयाब हो गए। सभा के अंत में मोर्चा संभालकर उन्होंने ओडवायर को निशाना बनाकर गोलियां दागनी शुरू कर दीं।
ओडवायर को दो गोलियां लगीं और वह वहीं ढेर हो गया। अदालत में ऊधम सिंह से पूछा गया कि जब उनके पास और भी गोलियां बचीं थीं, तो उन्होंने उस महिला को गोली क्यों नहीं मारी जिसने उन्हें पकड़ा था। इस पर ऊधम सिंह ने जवाब दिया कि हां ऐसा कर मैं भाग सकता था, लेकिन भारतीय संस्कृति में महिलाओं पर हमला करना पाप है।
31 जुलाई 1940 को पेंटविले जेल में ऊधम सिंह को फांसी पर चढ़ा दिया गया जिसे उन्होंने हंसते हंसते स्वीकार कर लिया। ऊधम सिंह ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर दुनिया को संदेश दिया कि अत्याचारियों को भारतीय वीर कभी बख्शा नहीं करते। 31 जुलाई 1974 को ब्रिटेन ने ऊधम सिंह के अवशेष भारत को सौंप दिए। ओडवायर को जहां ऊधम सिंह ने गोली से उड़ा दिया, वहीं जनरल डायर कई तरह की बीमारियों से घिर कर तड़प तड़प कर बुरी मौत मारा गया।

भारत माँ के इस सच्चे सपूत को हमारा शत शत नमन |

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

एक २ इन १ पोस्ट - २९ जुलाई - एक ख़ास दिन !

 आज २९ जुलाई है - भारत देश की २ विभूतियों का बहुत गहरा नाता है आज के दिन से !
एक का आज जन्मदिन है तो एक की आज पहली बरसी है !
आइये इस २ इन १ पोस्ट के माध्यम से उन दोनों को ही अपने श्रद्धासुमन अर्पित करें !

 

बहुमुखी प्रतिभा के धनी उद्यमी थे जेआरडी टाटा (२९/०७/१९०४ - २९/११/१९९३)

दुनिया की दस सबसे खुबसूरत महिलाओं में एक रही राजमाता गायत्री देवी का निधन

 

समस्त मैनपुरी वासीयों की ओर से इन दोनों महान विभूतियों को शत शत नमन !

 

( इन्टरनेट की खराबी के कारण आज पोस्ट लिखने में बहुत दिक्कत आ रही है इस लिए अपनी २ पुरानी पोस्टो का लिंक दे रहा हूँ ! )

 

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

पांच रुपये के सिक्कों ने बचाई थी जान - परमवीर चक्र विजेता जोगेंद्र सिंह यादव

'टाइगर हिल की वह रात आज भी मुझे पूरी तरह से याद है, जब दुश्मनों ने मुझ पर गोलियां चलाईं तो मेरी जेब में पड़े पांच रुपये के सिक्कों ने मेरी जान बचाई थी। दुश्मनों द्वारा फेंके गए हैंड ग्रेनेड से मेरा बायां हाथ भी जख्मी हो गया था। एक हाथ में एके-47 राइफल लेकर दुश्मनों पर गोली चलाई।'
यह कहना है कारगिल के योद्धा व परमवीर चक्र विजेता जोगेंद्र सिंह यादव का। वह बताते हैं- 'पांच जुलाई 1999 को कमांडर ने हमें सात जवानों के साथ टाइगर हिल पर दुश्मनों से मोर्चा लेने के लिए रवाना किया। टाइगर हिल काफी ऊंचाई पर है। ऐसे में दुश्मनों को हम जल्दी दिख गए। उन्होंने फायरिंग के साथ ही गोलाबारी शुरू कर दी। इसमें साथ के छह जवानों के साथ ही मैं स्वयं भी घायल हो गया। इसके बाद दुश्मनों ने घायल पड़े एक-एक जवान को गोली मारी। संयोग से दुश्मनों की गोली मेरी जेब में पांच रुपये के कुछ सिक्कों को लगी। उन सिक्कों ने वह गोली झेल ली। मेरा बायां हाथ पहले ही लहूलुहान हो चुका था।'
आगे बताते हैं- 'जब दुश्मन वापस लौटने लगे, तो चुपके से लुढ़क कर मैं एक पत्थर की आड़ में हो गया और राइफल उठाकर दुश्मनों के ऊपर फायरिंग शुरू कर दी, जख्मी हाथ से मांस झूल रहा था जिससे राइफल चलाने में दिक्कत हो रही थी। कुछ फायरिंग एक पत्थर के पीछे से, तो कुछ फायरिंग दूसरे पत्थर के पीछे से की। इस तरह से कुछ ही सेकेंड में लुढ़कते हुए कई स्थानों से फायरिंग की, जिस पर दुश्मनों को यह अहसास हुआ कि भारतीय फौजी काफी संख्या में उनकी तरफ बढ़ रहे हैं और वे दूर भाग गए।'
मूलरूप से बुलंदशहर के औरंगाबाद अहीर के निवासी जोगेंद्र यादव साहिबाबाद के लाजपत नगर ई-130/1 में रहते हैं और जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा में नियुक्त हैं। भारत सरकार ने उन्होंने 26 जनवरी 2000 में परमवीर चक्र से सम्मानित किया। उनका एक भाई जितेंद्र सिंह यादव भी सेना में हैं और बड़ौदा में नियुक्त है।

रविवार, 25 जुलाई 2010

विजय दिवस पर विशेष :- एक साथी और भी था.....!!







खामोश है जो यह वो सदा है, वो जो नहीं है वो कह रहा है ,
साथी यु तुम को मिले जीत ही जीत सदा |
बस इतना याद रहे ........ एक साथी और भी था ||


जाओ जो लौट के तुम, घर हो खुशी से भरा,
बस इतना याद रहे ........ एक साथी और भी था ||


कल पर्वतो पे कही बरसी थी जब गोलियां ,
हम लोग थे साथ में और हौसले थे जवां |
अब तक चट्टानों पे है अपने लहू के निशां ,
साथी मुबारक तुम्हे यह जश्न हो जीत का ,
बस इतना याद रहे ........ एक साथी और भी था ||


कल तुम से बिछडी हुयी ममता जो फ़िर से मिले ,
कल फूल चहेरा कोई जब मिल के तुम से खिले ,
पाओ तुम इतनी खुशी , मिट जाए सारे गिले,
है प्यार जिन से तुम्हे , साथ रहे वो सदा ,
बस इतना याद रहे ........ एक साथी और भी था ||

जब अमन की बासुरी गूजे गगन के तले,
जब दोस्ती का दिया इन सरहद पे जले ,
जब भूल के दुश्मनी लग जाए कोई गले ,
जब सारे इंसानों का एक ही हो काफिला ,
बस इतना याद रहे ........ एक साथी और भी था ||

बस इतना याद रहे ........ एक साथी और भी था ||


- जावेद अख्तर 


सभी मैनपुरी वासीयों की ओर से कारगिल युद्ध के सभी अमर शहीदों को शत शत नमन !

शनिवार, 24 जुलाई 2010

मेरा बुलबुल सो रहा है .........शोर - ओ - गुल ना मचा !!

एक माइक्रो पोस्ट :-

प्रिय ब्लॉगर मित्रो,
प्रणाम !

आप सब का बहुत बहुत आभार !

आपको यह जान ख़ुशी होगी कि कार्तिक अब पहले से काफी बहेतर महसूस कर रहा है और अभी सो रहा है ............ कुछ देर पहले जनाब उठे थे ...... पर दर्द के कारण नहीं ...........सु सु करनी थी ! ;-)

मैं दिल से यही मानता हूँ कि आज मेरे बेटे की रक्षा सिर्फ़, सिर्फ़ और सिर्फ़ उस परम पिता परमात्मा ने की है या यह सब उसको मिले तमाम आशीषो का नतीजा है, जो उसको आप लोगो से या बाकी परिजनों से समय समय पर मिलते रहे है !

अपने पूरे परिवार की ओर से आप सब से यही विनती करता हूँ कि कार्तिक पर अपना यह स्नेह हमेशा बनायें रखियेगा !

आप सब का बहुत बहुत धन्यवाद |

सादर आपका

शिवम् मिश्रा

शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

आज शिवम् का कार्तिक है कल आप का भी कार्तिक हो सकता है.......

मेरे ऑफिस के गौरव ने आज दोपहर में बताया की कार्तिक के सडक हादसे में चोट लग गयी है....खबर सुनकर मुझे से रहा नहीं गया.फ़ौरन शिवम् को फोन लगा कर कार्तिक के बारे में खेर खबर ली...शिवम् ने बताया की मोटर साईकिल की चपेट में आ जाने से कार्तिक की सिर में चोट आई है..जिससे सिर से खून भी निकला...सुनकर तेज़ गुस्सा आया...मैंने पूछा क्या तुम टक्कर मरने वालों को जानते हो...शिवम् ने बताया कि मोटर साईकिल पर तीन लोग सवार और तेज़ गति से बाइक चला रहे थे.....सुन कर ओर भी गुस्सा आया....बरहाल कार्तिक को ज्यादा चोट नहीं आई थी...इसलिए तसल्ली थी....लेकिन दुःख कम नहीं हुआ....मैंने सोचा आखिर कब मैनपुरी के लोगों में सिविक्स सेन्स आएगा.मैनपुरी के अधिकतर युवाओं में सिविक्स सेन्स की कमी आम बात हो गयी....हर किसी को इतना तो सेन्स होता ही है की स्कूल की छुट्टी के वक़्त वाहन को धीमे चलाना चाहिए....अगर ऐसा किया गया होता तो शायद कार्तिक को चोट ना आती....उपर से बाइक पर तीन लोग सवार थे....आसानी से समझ सकते है आलम क्या होगा....दुःख तो इस बात का है ये तब हो रहा जब पुलिस हर दिन बे-तरतीब ढंग से वाहन चलाने वालों के चालान कट रही है....यानि कानून भी ऐसे लोगों का कुछ नहीं कर सकता....यहाँ पर सिर्फ सिविक्स सेन्स ही है जो माहोल को बेहतर बना सकता है....लेकिन ऐसा कब होगा....? लेकिन मैं इतना जानता हूँ कि अगर सुधार नहीं हुआ तो आज शिवम् का कार्तिक है कल आप का भी कार्तिक हो सकता है.......
****हृदेश सिंह

भगवान् का लाख लाख शुक्र है !

आज का दिन बहुत बुरा जा रहा है ..............कार्तिक का आज एक छोटा सा एक्सिडेंट हो गया ! भगवान् का लाख लाख धन्यवाद की उसने कार्तिक की रक्षा की ! आप सब के आशीर्वाद से उसको ज्यादा चोट नहीं आई हैं और वह अब सदमे से भी बाहर है !

हुआ यह कि रोज़ की तरह मैं उसको स्कूल से लेने गया ...........कल कार्तिक स्कूल में अपनी २ किताबे छोड़ आया था ..........मैं उसकी टीचर से बात कर रहा था तभी रिक्शा वाले ने उसको बाहर बुलाया और वह मेरी बगल से स्कूल के गेट के बाहर खड़े रिक्शा वाले के पास जाने के लिए गेट से निकला और तभी ना जाने कहाँ से २ लड़के तेज़ी से बाइक से वहाँ से निकले और कार्तिक को टक्कर मारते हुए आगे बढ़ गए ! कार्तिक टक्कर से जमीन पर गिर गया और उसके सर का पिछला हिस्सा जमीन से टकरा गया और काफी खून निकलने लगा !

आवाज़ सुन मैं बाहर आया और देखा की कार्तिक की चोट से खून बह रहा है और वहाँ खड़े लोगो ने उन लडको को पकड़ रखा है .............मैंने जल्दी से कार्तिक के प्रिंसिपल से उनकी गाडी ले जाने के विषय में पुछा तो वह खुद मेरे साथ कार्तिक को ले कर हॉस्पिटल चलने को तैयार हो गए | १० मिनट में हम लोग हॉस्पिटल में थे और डाक्टर कार्तिक की चोट देख रहा था | यह जान बहुत राहत हुयी कि चोट गहरी नहीं थी और केवल पट्टी ही होनी थी !

पट्टी करवाने के बाद हम लोग प्रिंसिपल साहब की ही गाडी से घर तक आये और मैंने उनको धन्यवाद दिया तो वह बोले, "मिश्रा जी , कार्तिक हमारा भी तो बच्चा है......फिर धन्यवाद काहे का ?? "

घर पर तब तक रिक्शे वाले के मार्फ़त खबर हो चुकी थी और सब बेहद बेचैन थे ख़ास कर कार्तिक की दादी और माँ !

पूरे घटनाक्रम में यह अभी तक तय नहीं पाया हूँ कि गलती किस की थी ............पर हाँ यह जरूर है कि मेरे होते कार्तिक के इतनी चोट लग गयी ...........यह बात मुझे ताउम्र कचोटती रहेगी !

बस इतना जानता हूँ कि भगवान् ने आज मेरे कार्तिक की रक्षा करी है !

एक बात और यहाँ कहना चाहता हूँ...................आजकल हम अपने आस पास रोज़ देखते है कि छोटी उम्र के लड़के बाइक ले कर फर्राटे से इधर उधर घूमते रहते है यह कहाँ तक ठीक है ?? यह अनुभवहीन वाहन चालक क्या अपने साथ साथ सड़क पर चलने वालों की जान भी जोखिम में नहीं डालते ?? आज जो २ लड़के कार्तिक से टकराए थे उनकी उम्र भी १६ -१७ साल से ज्यादा नहीं रही होगी !

बुधवार, 21 जुलाई 2010

पाबला जी - गेट वेल सून !




आदरणीय पाबला जी ,

सिर्फ़ बात कहनी थी ................................ गेट वेल सून .............सर जी !!

सादर आपका

शिवम् मिश्रा
मैनपुरी ,
उत्तर प्रदेश !

रविवार, 18 जुलाई 2010

एक साल का इंतजार छोड़िए - अभी से कीजिए रुपये के सिंबल का प्रयोग


भारतीय रुपये को अपनी नई पहचान तो मिल गई लेकिन इसका प्रयोग कब शुरू होगा इसको लेकर भ्रम की स्थिति थी। सरकार ने इसके व्यावसायिक प्रयोग के लिए जहां एक साल तक इंतजार करने की बात कही थी वहीं देश के प्रतिभावान आईटी इंजीनियरों ने इसे कंप्यूटर पर अभी से ही उपलब्ध करा दिया है।

अब कंप्यूटर पर काम करने वालों के मन में यह सवाल जरूर उठ रहा होगा कि आखिर इसका प्रयोग हम अपने पीसी या लैपटॉप पर करेंगे कैसे। तो इंतजार छोड़िए रुपये के सिंबल को यूनीकोड की स्वीकार्यता मिलने का और मौजूदा की-बोर्ड से ही इसके प्रयोग के लिए तैयार हो जाइए। मेंगलूर की एक कंपनी ने आपकी समस्या का हल खोजा है। कंपनी ने एक ऐसा फॉन्ट तैयार किया है जिसे डाउनलोड कर आप आज से ही इसका प्रयोग शुरू कर सकते हैं।

फोरेडियन टेक्नोलोजिज प्रा. लि. ने Rupee_Foradian.ttf नाम का एक फॉन्ट तैयार किया है जिसे कंपनी वेबसाइट http://blog.foradian.com से नि:शुल्क डाउनलोड किया जा सकता है। कंपनी के सीईओ उन्नी कोरोथ ने कहा कि तकनीकी उन्नति के इस दौर में भारत सरकार द्वारा रुपये के सिंबल की व्यावसायिक उपलब्धता में एक साल से ज्यादा लगने की बात कहे जाने के बाद हमने इस विषय पर काम करने का फैसला किया और हमें इसमें जल्द सफलता भी मिल गई। कंपनी ने सबसे पहले सिंबल का वेक्टर इमेज तैयार किया और इसकी मैपिंग कर इसे 'ग्रेव एसेंट सिंबल' में परिवर्तित कर दिया।

सिंबल को की-बोर्ड के किस 'की' में डाला जाए इसके लिए ऐसी 'की' का चयन किया गया जिसका इस्तेमाल सबसे कम किया जाता हो। 'टैब-की' को इसके लिए सबसे मुफीद माना गया और सिंबल को इसी से मैप कर दिया गया।

कंपनी ने बताया कि फॉन्ट के ट्रायल वर्जन को जबरदस्त रिस्पांस मिला और एक घंटे में 11 सौ बार इसे डाउनलोड किया गया। जब डाउनलोड पांच हजार के पार हो गया तब कंपनी ने इसके फुल वर्जन पर काम करना शुरू किया। फॉन्ट की पहुंच ज्यादा से ज्यादा लोगों तक हो इसके लिए डाउनलोड की नि:शुल्क व्यवस्था की गई है।

कैसे करें फॉन्ट डाउनलोड

1. सबसे पहले कंप्यूटर पर

http://blog.foradian.com टाइप करें।

2. वेबसाइट से Rupee_Foradian.ttf फाइल डाउनलोड करें।

3. डाउनलोडेड फाइल को कॉपी कर कंट्रोल पैनल फोल्डर के अंदर फॉन्ट्स फोल्डर में पेस्ट कर दें।

इसके साथ ही आप अपने पीसी पर रुपये के सिंबल का प्रयोग शुरू कर सकते हैं।

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

समीर लाल , धीरू सिंह , शिवम् मिश्रा जैसे लोगो का अब क्या होगा ??


समीर भाई और धीरू भाई ............कहाँ हो आप लोग ??

एक बहुत ही बुरी खबर लाया हूँ !!

मेरे और आप के जैसे लोगो के लिए इस से ज्यादा बुरी और दुखद खबर कोई और नहीं हो सकती !

मेरा तो दिल ही टूट गया है जब से यह खबर मिली है !!
आप लोगो का भी यही हाल होगा .............जानता हूँ................... पर बात को आखिर कब तक पेट में लिए बैठा रहू ??

सो यहाँ आ गया ताकि आप सब के साथ अपना दुःख बाँट सकू !

जानना चाहा रहे है ना आखिर किस बात पर इतना बवाल कर रहा हूँ ................ बताता हूँ |


अब तक कहीं भी जाता था तो बस टैक्सी या ऑटो की सवारी ले लेता था .............आप दोनों भी यही करते रहे होगे ..............है ना ?? जो मीटर हुआ दे दिया शान से ..........है कि नहीं ...............?? कहीं कोई दिक्कत नहीं आती थी ..........पर अब ऐसा नहीं होने वाला ! सुख भरे दिन बीते रे भैया अब दुःख आयो रे !!

एक नया मीटर गया है ...................साला सवारी के वजन के हिसाब से चलेगा !! :-(
मतलब समझे ................हम में से कोई भी जब किराया पूछेगा तब जवाब मिला करेगा ...............२० रूपया किलो के हिसाब से चलेगे बाबु जी !!

झेल सकोगे ........................??

अरे अंकल ....................किराया नहीं ...................यह जवाब झेल सकोगे ??

दिल टूट के बिखर ना जायेगा .....................?? :-(

क्या कहा हो नहीं सकता ...............तो क्या मैं झूट बोल रहा हूँ ......................?? मत मानो ..... बाद में मत बोलना कि बताया नहीं !!

वैसे पूरी जानकारी भी दे रहा हूँ ऐसे ही हवा में लम्बी लम्बी नहीं छोड़ रहा हूँ ...............पढ़ते रहो आगे.... !!
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जो मोटे लोग टैक्सी में चलना चाहते हैं, वे अपना वजन घटाना शुरू कर दें। श्रीलंका में ओपन यूनिवर्सिटी के इंजीनियरिंग के एक छात्र ने ऐसा टैक्सी मीटर बनाने का दावा किया है, जो दूरी की बजाय सवारी के वजन के हिसाब से टैक्सी का भाड़ा बताएगा। इस छात्र का नाम है कालिंदु सिरीवारदेने।

कालिंदु का दावा है कि उसने जो टैक्सी मीटर बनाया है, वो यात्रा में लगने वाले समय, सड़क की हालत और मुसाफिर के सामान समेत वजन के आधार पर भाड़ा बताएगा।

उन्होंने कहा कि दूरी के हिसाब से भाड़ा बताने वाले मौजूदा टैक्सी मीटरों से अक्सर मुसाफिरों या चालक को नुकसान होता है।

उसका कहना है कि नए मीटर के इस्तेमाल से किसी को नुकसान नहीं होगा और मुसाफिरों को वाजिब भाड़ा ही देना होगा। लेकिन उन्होंने कहा कि अधिक वजनदार सामान लेकर चलने वाले और पहाड़ी इलाके में सफर करने वालों को अधिक किराया देना पड़ेगा।

उन्होंने बताया उनका आविष्कार बौद्धिक संपदा कानून [इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी एक्ट] के तहत पंजीकृत है और वह विश्वव्यापी बौद्धिक संपदा संगठन [व‌र्ल्डवाइड इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी ऑर्गनाइजेशन] के तहत पंजीयन के लिए जल्द ही आवेदन करेंगे।

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बोलिए क्या हुआ ?? लग गया ना जोर का झटका धीरे से ?? तो आइये मिल कर रोते है अपने मोटापे के नाम पर ! यह तो गनीमत है कि अभी कुछ दिन है अपने हाथ में .........यहाँ भारत में अभी नहीं ना आया है यह मीटर !! कुछ जुगाड़ लगाया जाए कि या तो हम लोग एक दम स्लिम ट्रिम हो जाए या यह मीटर यहाँ ना आने पाए ! आप क्या कहते है ??

प्रभाष जी के जन्मदिन पर विशेष

ख़लिश हिन्दुस्तानी पत्रकार ''प्रभाष जोशी''
रोज़ की तरह देश विदेश की खबरों के लिए मैं नेट पर बैठा था.हिंदुस्तान के पोर्टल से पता चला की ''प्रभाष जोशी'' का निधन हो गया.मैं चोंक गया.ये कैसे हो सकता है...दर्जनों सवाल एक साथ दिमाग में लहराने लगे.लेकिन ये सच था. 5 नव. 09 रात उनका ह्रदय गति रुकने से उनका निधन हो गया.मुझे बेहद दुःख हुआ.इस दुखद समाचार को फोरन सत्यम पर ब्रेक करने के बाद उनके साथ बिताये पलों को याद करने लगा. मेरी उनसे मुलाक़ात भारतीय जनसंचार संस्थान में हुई थी. तारीख थी 25 अगस्त 04. उस समय इस संस्थान में पढाई कर रहा था.उनके बारे मैंने बहुत कुछ सुना था.ऐसे में उन से मिलने को में बेताब था.प्रो.आनंद प्रधान के साथ कलफ लगे सफ़ेद कुरता और धोती में वे क्लास में दाखिल हुए.उनके चेहरे पर गज़ब का आत्मविश्वाश था.एक सम्मोहन था.हम लोग उसमें कैद हो चुके थे.क्लास शुरू हुई.पहली बात चुनाव को लेकर हुई.देश का पहला आम चुनाव 1952 में हुआ था. प्रभाष जी ने बताया की उसमें वे शामिल रहे.किसी रिश्तेदार के लिए प्रचार किया था.कहने का मतलब सीधा है की प्रभाष जी उन पत्रकारों में थे जिन्होंने पहले चुनाव से लेकर १४ वी लोकसभा तक के चुनाव देखे थे.प्रभाष जी ने 1956 के आसपास पत्रकारिता की शुरुआत की.उनकी कलम सच की स्याही से भरी थी.ये ही उनकी लोकप्रियता का कारण था.उनकी पर्सनाल्टी खलीश हिन्दुस्तानी पत्रकार की थी.उनका कहना था कि''असली पत्रकार वही है जो जन पांडे (एक खास विधि से जमीन में पानी के श्रोत को तलाश करने वाला) कि तरह जमीन पर हाथ रखकर चीजों की पहचान कर सके.क़र्ज़ और भुखमरी से मरने वाले किसानों को लेकर बेहद दर्द था.मीडिया में कार्पोरेट के दखल से होने वाले नुकसानों को सबसे पहले प्रभाष जी ने ही जनता को बताया था.आंध्र प्रदेश में किसानों की मो़त पर उन्होंने जमकर लिखा था.सरकार को उस पर सफाई तक देनी पड़ी थी. प्रभाष जी मानते थे कि''पत्रकार को स्वतंत्र बुद्धि विवेक को त्यागना नहीं चाहिए.फिर परस्थिति कुछ भी हो.पत्रकार को यही जीवित रखती है.''आज के दौर में इस तरह से अपनी बात कहते हुए मैंने बहुत कम लोग देखे है.ये बात वही कह सकता है जो खुद इस तरह का हो. प्रभाष जी वाकई में ऐसे थे......प्रभाष जी ने मुझ से कहा था कि ''पत्रकार को अपना विष सम्हाल कर रखना चाहिए.इस पर उन्होंने दिनकर की ''क्षमा शीर्षक'' वाली कविता की कुछ लाइन सुनाई.नए पत्रकारों को वे हमेसा आगे बढाते थे.खबर से लेकर सम्पादकीय तक को किस तरह से लिखना चाहिए इस पर उनके पास अनुभवों का खजाना था.प्रभाष जी का कहना था कि''सम्पादकीय लिखते समय पाठक को माई बाप मानकर चलना चाहिए.मुझे उनकी सबसे ज्यादा जिस बात ने प्रभावित किया वो ये थी कि ''इरादों में खोट नहीं देखनी चाहिए.गाँधी जी भी ऐसा ही कहते थे.जोश और उत्साह से भरे पत्रकारों के लिए वे कहते थे कि ''अविरोध में नए पत्रकार काम करते चलें.भले उनका संपादक बिका हो.''
हृदेश सिंह

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