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गुरुवार, 30 सितंबर 2010

मेरा दिल = खुदा का घर

एक शेर याद आया है पर किस का है यह याद नहीं  ... आज के मौके पर आप सब की नज़र है !!

बुत बना रखें है ...नमाज़ भी अदा होती है  ;
दिल मेरा दिल नहीं ...खुदा का घर लगता है !!

बुधवार, 29 सितंबर 2010

एक माइक्रो पोस्ट :- चल तू खैनी घिस !!


रहेमु बोला नत्था से ...... पहले २४ ....फिर २८ और अब ३० ...??
नत्था बोला ......अरे हम को क्या ........चल तू खैनी घिस !!
हम कौन से नेता है जो इन सब की फ़िक्र करें ...
ना मैं मंदिर जाता .....ना तू जावे मज्जिद !!
रात को बच्चे भूखे ना सोये .... 
अपनी 'उस' से बस इतनी प्रीत !! 
रहेमु बोला सही कहता है ....
ले थोड़ी खैनी तू भी घिस !!

सोमवार, 27 सितंबर 2010

एक रि पोस्ट :- शहीद् ए आजम सरदार भगत सिंह जी के जन्मदिन पर







कुछ बहरों को सुनाने के लिए एक धमाका आपने तब किया था ,
एसे ही कुछ बहरे आज भी राज कर रहे है,
हो सके तो आ जाओ !!





सरफरोशी की तमन्ना
 
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, 
देखना है ज़ोर कितना बाजू-ऐ-कातिल में है.

करता नहीं क्यूँ दूसरा कुछ बात-चीत, 
देखता हूँ मैं जिसे वोह चुप तेरी महफिल में है.
ए शहीद-ऐ-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार, 
अब तेरी हिम्मत का चर्चा गैर की महफिल में है.
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है.

वक्त आने पे बता देंगे तुझे ए आसमान, 
हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है.
खींच कर लाई है सब को क़त्ल होने की उम्मीद, 
आशिकों का आज जमघट कूचा-ऐ-कातिल में है.
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है.

है लिए हथियार दुश्मन ताक़ में बैठा उधर, 
और हम तैयार हैं सीना लिए अपना इधर.
खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है, 
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है.

हाथ जिन में हो जूनून कट ते नही तलवार से, 
सर जो उठ जाते हैं वोह झुकते नही ललकार से.
और भड़केगा जो शोला-सा हमारे दिल में है, 
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है.

हम तो घर से निकले ही थे बांधकर सर पे कफ़न, 
जा हथेली पर लिए लो बढ़ चले हैं ये क़दम.
जिंदगी तो अपनी मेहमान मौत की महफिल में है, 
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है.

यूं खडा मकतल में कातिल कह रहा है बार बार, 
क्या तमन्ना-ऐ-शहादत भी किसी के दिल में है.
दिल में तूफानों की टोली और नसों में इन्किलाब, 
होश दुश्मन के उड़ा देंगे हमें रोको न आज.
दूर रह पाये जो हमसे दम कहाँ मंजिल में है,

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है. 
देखना है ज़ोर कितना बाज़ुय कातिल में है ||



इंक़लाब जिंदाबाद  







 शहीद् ए आजम सरदार भगत सिंह जी को उनके १०४ वे जन्मदिवस पर सभी मैनपुरीवासीयों की ओर से शत शत नमन |

बुधवार, 22 सितंबर 2010

बस इतना याद रहे ....

जब जब सीमा पर लड़ते हुए या शांति काल में भी आतंकवाद का सामना करते हुए कोई सेन्य अधिकारी शहीद होता है तो अपने पीछे वह छोड़ जाता है बहुत से सवाल .....जिन का जवाब किसी के पास नहीं होता ! जब युद्ध का माहौल हो तो काफी सवाल पैदा ही नहीं होते क्यों की युद्ध तो युद्ध है अगर युद्ध होगा तो जाने तो जानी ही है .........पर शांति काल में मारे गए लोगो या सैनिको का क्या दोष ?? 

खास कर आतंकवाद के शिकार लोगो का .....क्या दोष ??

आप अपने घर में बैठे है .....कोई बाहर वाला ज़बरदस्ती आता है और आप पर और आपके परिवार पर हमला कर चला जाता है ....इस पूरे घटना कर्म में आपकी क्या गलती थी ? कोई नहीं ना !! क्या करेंगे आप ऐसे में ?? 
शायद फिर कभी ऐसा ना होगा यह सोच कर दिल को तसल्ली देंगे .....पर अगर ऐसा बार बार होने लगे तो ?? 
तब तो कुछ ना कुछ करना ही होगा ना !!

ऐसा ही कुछ करने गया हुआ थे यह शेर भी ........

आज आप से यह सब इस लिए कह रहा हूँ क्यों कि आज एक शहीद का चहेरा दिखा है !!

जब तक नाम को शक्ल नहीं मिलती नाम में वह असर नहीं होता .....पर एक बार जब नाम के साथ कोई शक्ल जुड़ जाए .....कुछ ना कुछ रिश्ते भी जुड़ ही जाते है ! 

ऐसा ही एक रिश्ता जुड़ गया आज शहीद मेजर सुरेश सूरी से ......एक साल पहले आज के ही दिन अपने देश के लिए अपना बलिदान दिया था इस अमर शहीद ने !

मेजर सूरी के बारे में जानने के लिए पढ़े :-

आतंक को करारी चोट :- दैनिक जागरण में छपी खबर |
सुरेश की स्मृति में... :- मेजर गौतम की ३ अक्टूबर २००९ की पोस्ट |

सुरेश की स्मृति में...एक साल :- मेजर गौतम की आज की पोस्ट |

इस के आगे मेरी समझ में नहीं आ रहा क्या कहू ..... बस शत शत नमन करता हूँ ....भारत माँ के इस लाल को .......साथ साथ उन सब को भी जो मेजर सूरी की ही तरह शहीद हुए पर .....जिन से हमारा कोई नाता नहीं जुड़ पाया !

जय हिंद !!

मंगलवार, 21 सितंबर 2010

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

एक रिपोस्ट :- शिकागो के जयघोष की गूंज

अब से करीब 117 साल पहले 11 सितंबर, 1893 को स्वामी विवेकानंद ने शिकागो पार्लियामेंट आफ रिलीजन में भाषण दिया था, उसे आज भी दुनिया भुला नहीं पाती। इसे रोमा रोलां ने 'ज्वाला की जबान' बताया था। इस भाषण से दुनिया के तमाम पंथ आज भी सबक ले सकते हैं। इस अकेली घटना ने पश्चिम में भारत की एक ऐसी छवि बना दी, जो आजादी से पहले और इसके बाद सैकड़ों राजदूत मिलकर भी नहीं बना सके। स्वामी विवेकाननंद के इस भाषण के बाद भारत को एक अनोखी संस्कृति के देश के रूप में देखा जाने लगा। अमेरिकी प्रेस ने विवेकानंद को उस धर्म संसद की महानतम विभूति बताया था। उस समय अभिभूत अमेरिकी मीडिया ने स्वामी विवेकानंद के बारे में लिखा था, 'उन्हें सुनने के बाद हमें महसूस हो रहा है कि भारत जैसे एक प्रबुद्ध राष्ट्र में मिशनरियों को भेजकर हम कितनी बड़ी मूर्खता कर रहे थे।'
यह ऐसे समय हुआ, जब ब्रिटिश शासकों और ईसाई मिशनरियों का एक वर्ग भारत की अवमानना और पाश्चात्य संस्कृति की श्रेष्ठता साबित करने में लगा हुआ था। उदाहरण के लिए 19वीं सदी के अंत में अधिकारी से मिशनरी बने रिचर्ड टेंपल ने 'मिशनरी सोसायटी इन न्यूयार्क' को संबोधित करते हुए कहा था- भारत एक ऐसा मजबूत दुर्ग है, जिसे ढहाने के लिए भारी गोलाबारी की जा रही है। हम झटकों पर झटके दे रहे हैं, धमाके पर धमाके कर रहे हैं और इन सबका परिणाम उल्लेखनीय नहीं है, लेकिन आखिरकार यह मजबूत इमारत भरभराकर गिरेगी ही। हमें पूरी उम्मीद है कि किसी दिन भारत का असभ्य पंथ सही राह पर आ जाएगा।
जब शिकागो धर्म संसद के पहले दिन अंत में विवेकानंद संबोधन के लिए खड़े हुए और उन्होंने कहा- अमेरिका के भाइयो और बहनो, तो तालियों की जबरदस्त गड़गड़ाहट के साथ उनका स्वागत हुआ, लेकिन इसके बाद उन्होंने हिंदू धर्म की जो सारगर्भित विवेचना की, वह कल्पनातीत थी। उन्होंने यह कहकर सभी श्रोताओं के अंतर्मन को छू लिया कि हिंदू तमाम पंथों को सर्वशक्तिमान की खोज के प्रयास के रूप में देखते हैं। वे जन्म या साहचर्य की दशा से निर्धारित होते हैं, प्रत्येक प्रगति के एक चरण को चिह्निंत करते हैं। अन्य तमाम पंथ कुछ मत या सिद्धांत प्रतिपादित करते हैं और समाज को इन्हें अपनाने को बाध्य करते हैं। वे समाज के सामने केवल एक कोट पेश करते हैं, जो जैक, जान या हेनरी या इसी तरह के अन्य लोगों को पहनाना चाहते हैं। अगर जान या हेनरी को यह कोट फिट नहीं होता तो उन्होंने बिना कोट पहने ही जाना पड़ता है। धर्म संसद के आखिरी सत्र में विवेकानंद ने अपने निरूपण की व्याख्या को इस तरह आगे बढ़ाया- ईसाई एक हिंदू या बौद्ध नहीं बनता है न ही एक हिंदू या बौद्ध ईसाई बनता है, लेकिन प्रत्येक पंथ के लोगों को एक दूसरे की भावनाओं का ध्यान रखना चाहिए।
उन्होंने उम्मीद जताई कि हर पंथ के बैनर पर जल्द ही लिखा मिलेगा- समावेश, विध्वंश नहीं। सौहा‌र्द्र और शांति, फूट नहीं। मंत्रमुग्ध करने वाले उनके शब्द हाल की दीवारों के भीतर ही गुम नहीं हो गए। वे अमेरिका के मानस को भेदते चले गए, लेकिन उस समय भी आम धारणा यही थी कि हर कोई विवेकानंद से प्रभावित नहीं हुआ। उन्हें न केवल कुछ पादरियों के क्रोध का कोपभाजन बनना पड़ा बल्कि हिंदू धर्म के ही कुछ वर्गो ने उन्हें फक्कड़ साधु बताया जो किसी के प्रति आस्थावान नहीं है। उन्होंने विवेकानंद पर काफी कीचड़ उछाला। उनके पास यह सब चुपचाप झेलने के अलावा और कोई अन्य चारा नहीं था। स्वामी विवेकानंद ने तब जबरदस्त प्रतिबद्धता का परिचय दिया, जब एक अन्य अवसर पर उन्होंने ईसाई श्रोताओं के सामने कहा- तमाम डींगों और शेखी बखारने के बावजूद तलवार के बिना ईसाईयत कहां कामयाब हुई? जो ईसा मसीह की बात करते हैं वे अमीरों के अलावा किसकी परवाह करते हैं! ईसा को एक भी ऐसा पत्थर नहीं मिलेगा, जिस पर सिर रखकर वह आप लोगों के बीच स्थान तलाश सके..आप ईसाई नहीं हैं। आप लोग फिर से ईसा के पास जाएं। एक अन्य अवसर पर उन्होंने यह मुद्दा उठाया- आप ईसाई लोग गैरईसाइयों की आत्मा की मुक्ति के लिए मिशनरियों को भेजते हैं। आप उनके शरीर को भुखमरी से बचाने का प्रयास क्यों नहीं करते हैं? भूख से तड़पते इंसान को किसी पंथ की पेशकश करना एक तरह से उसका अपमान है। साफगोई और बेबाकी विवेकानंद का सहज गुण था। देश में वह हिंदुओं से अधिक घुलते-मिलते नहीं थे। जब उनके आश्रम में एक अनुयायी ने उनसे पूछा कि व्यावहारिक सेवा के लिए रामकृष्ण मिशन की स्थापना का उनका प्रस्ताव संन्यासी परंपरा का निर्वहन कैसे कर पाएगा? तो उन्होंने जवाब दिया- आपकी भक्ति और मुक्ति की कौन परवाह करता है? धार्मिक ग्रंथों में लिखे की किसे चिंता है? अगर मैं अपने देशवासियों को उनके पैरों पर खड़ा कर सका और उन्हें कर्मयोग के लिए प्रेरित कर सका तो मैं हजार नर्क भी भोगने के लिए तैयार हूं। मैं मात्र रामकृष्ण परमहंस या किसी अन्य का अनुयायी नहीं हूं। मैं तो उनका अनुयायी हूं, जो भक्ति और मुक्ति की परवाह किए बिना अनवरत दूसरों की सेवा और सहायता में जुटे रहते हैं।
विवेकानंद की साफगोई के बावजूद जिसने उन्हें अमेरिकियों के एक वर्ग का चहेता नहीं बनने दिया, उन्हें हिंदुत्व के विभिन्न पहलुओं की विवेचना के लिए बाद में भी अमेरिका से न्यौते मिलते रहे। जहां-जहां वह गए उन्होंने बड़ी बेबाकी और गहराई से अपने विचार पेश किए। उन्होंने भारत के मूल दर्शन को विज्ञान और अध्यात्म, तर्क और आस्था के तत्वों की कसौटी पर कसते हुए आधुनिकता के साथ इनका सामंजस्य स्थापित किया। उनका वेदांत पर भी काफी जोर रहा। उन्होंने बताया कि कैसे यह मानव आत्मा का शानदार उत्पाद है? यह मूलभाव में जीव की जीव द्वारा उपासना क्यों है और इसने गहन अध्यात्म के बल पर हिंदू को एक बेहतर हिंदू, मुस्लिम को बेहतर मुस्लिम और ईसाई को बेहतर ईसाई बनाने में सहायता प्रदान की है।
विवेकानंद ने यह स्पष्ट किया कि अगर वेदांत को जीवन दर्शन के रूप में न मानकर एक धर्म के रूप में स्वीकार किया जाता है, तो यह सार्वभौमिक धर्म है- समग्र मानवता का धर्म। इसे हिंदुत्व के साथ इसलिए जोड़ा जाता है, क्योंकि प्राचीन भारत के हिंदुओं ने इस अवधारणा की संकल्पना की और इसे एक विचार के रूप में पेश किया। एक अलग परिप्रेक्ष्य में श्री अरबिंदो ने भी यही भाव प्रस्तुत किया- भारत को अपने भीतर से समूचे विश्व के लिए भविष्य के पंथ का निर्माण करना है। एक शाश्वत पंथ जिसमें तमाम पंथों, विज्ञान, दर्शन आदि का समावेश होगा और जो मानवता को एक आत्मा में बांधने का काम करेगा।
स्पष्ट तौर पर मात्र एक भाषण ने ऐसी ज्योति प्रज्ज्वलित की, जिसने पाश्चात्य मानस के अंतर्मन को प्रकाश से आलोकित कर दिया और ऊष्मा से भर दिया। इस भाषण ने सभ्यता के महान इतिहासकार को जन्म दिया। अर्नाल्ड टोनीबी के अनुसार- मानव इतिहास के इन अत्यंत खतरनाक क्षणों में मानवता की मुक्ति का एकमात्र तरीका भारतीय पद्धति है। यहां वह व्यवहार और भाव है, जो मानव प्रजाति को एक साथ एकल परिवार के रूप में विकसित होने का मौका प्रदान करता है और इस परमाणु युग में हमारे खुद के विध्वंस से बचने का यही एकमात्र विकल्प है।
- जगमोहन [लेखक जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल हैं]

गुरुवार, 16 सितंबर 2010

राधा अष्टमी पर विशेष :- राधे... राधे...जय श्री राधे !!

कल राधा अष्टमी थी | हमारे यहाँ, मैनपुरी के चौथियाना मोहल्ले में, बिहारी जी का एक प्राचीन मंदिर है, सालो से हर राधा अष्टमी के दिन यहाँ मेला लगता है | आइये थोडा जाने राधा - कृष्ण के बारे में ! फिर आप सब को मेले की सैर करवाता हूँ ! 

कृष्ण शब्द हैं तो राधा अर्थ.., कृष्ण गीत हैं तो राधा संगीत.., कृष्ण वंशी हैं तो राधा स्वर.., कृष्ण समुद्र हैं तो राधा तरंग..,कृष्ण फूल हैं तो राधा उसकी सुगंध.. राधा के आराधकों ने कृष्ण और राधा का एकाकार स्वरूप दर्शाने के अनेक प्रयास किए हैं।
कई लोगों की मान्यता है कि श्रीकृष्ण और राधा अलग-अलग होते हुए भी एक हैं। पहली समानता तो यही है कि दोनों का जन्म भाद्रपद मास की अष्टमी को हुआ। मान्यता है कि कृष्ण का जन्म कृष्णपक्ष की अष्टमी को हुआ, तो राधा का शुक्लपक्ष अष्टमी को। अनेक विद्वान मानते हैं कि राधा और कृष्ण दोनों एक ही हैं। नारद पंचरात्र के 'ज्ञानामृतसार' के अनुसार, राधा और कृष्ण एक ही शक्ति के दो रूप हो गए। वहीं चैतन्य सम्प्रदाय भी राधा और कृष्ण में भिन्नता को नहींमानता।
श्रीमद्भागवत् में वर्णन है कि श्रीकृष्ण ही एकमात्र भगवान हैं, बाकी सब उन्हीं के अंश हैं। यहां यह उल्लेख है कि कृष्ण की एक परा शक्ति है जिनका नाम आल्हादिनी शक्ति है। उसे स्वरूप शक्ति भी कहते हैं, वे कृष्ण से अभिन्न हैं। वे ही राधा जी हैं। यह भी मान्यता है कि श्रीकृष्ण में 'श्री' शब्द राधा जी के लिए ही प्रयुक्त हुआ है। 'सूरसागर' में सूरदास जी ने भी एक दोहे में लिखा है कि श्रीकृष्ण की सोलह हजार गोपिया मात्र देह हैं, जबकि उनकी आत्मा राधा हैं।

वैसे हम तो इतना ही जानते है कि........... मथुरा के पास रहोगे तो राधे राधे कहोगे !! 

और मैनपुरी भी मथुरा से ज्यादा दूर थोड़े ही है ......

तो जी लीजिये साहब ..........हम भी राधे राधे करते हुए आप सब को लिए चलते है मेले की ओर !
बिहारी जी और राधा रानी का भव्य श्रृंगार
मेले की एक झलक
मेला परिसर और पीछे मंदिर श्री बिहारी जी महाराज
पुजारी जी मुस्तैद बिहारी जी की सेवा में
भजन संध्या
भजन में मगन कमलेश चतुर्वेदी ( टिंकू चाचा ) और देवेश चतुर्वेदी
हम चौबो की कुलदेवी महाविद्या जी
श्री हनुमान जी महाराज
मंदिर के जगमोहन में स्थापित अन्य देवी देवता
मंदिर के जगमोहन में स्थापित अन्य देवी देवता
यारा दी टोली
मेले में झुला ........झूले पर कार्तिक
मेले की मौज
यह मेला खत्म क्यों हो गया ??
 तो साहब यह था हमारे छोटे से शहर, मैनपुरी के एक छोटे से मोहल्ले, चौथियाना के मंदिर श्री बिहारी जी महाराज के परिसर में हर साल राधा अष्टमी के दिन लगने वाले मेले की कुछ झलकियाँ .......आशा है आपको भी मेले मज़ा आया होगा !
अब आज्ञा दीजिये .......
जय ...जय ... श्री राधे ... !!

रविवार, 12 सितंबर 2010

जय हो - सुशील ने कुश्ती में लिखा नया इतिहास

बीजिंग ओलंपिक में कांस्य पदक विजेता पहलवान सुशील कुमार ने रविवार को सफलता का एक और इतिहास रच दिया। उन्होंने विश्व कुश्ती चैंपियनशिप के खिताबी जंग में स्थानीय खिलाड़ी गोगाएव अलान को 3-1 से हराया। यह उपलब्धि हासिल करने वाले सुशील देश के पहले पहलवान है।
सुशील ने सेमीफाइनल में अजरबेजान के हासानोव जाबरायिल को 4-3 से हराकर फाइनल में प्रवेश किया था। जबकि गोगाएव ने क्यूबा के गोरजोन काबालेरो को 4-0 से धूल चटाई थी। सुशील के कोच पद्मश्री द्रोणाचार्य पुरस्कृत महाबली सतपाल ने स्वर्ण पदक पर खुशी जाहिर करते हुए कहा, 'मैं बहुत खुश हूं कि राष्ट्रमंडल खेलों से पहले सुशील ने यह उपलब्धि हासिल की। अभी तक मेरा कोई भी शिष्य ऐसा कारनामा नहीं कर सका था, इसलिए मैं बहुत खुश हूं और इससे उसे राष्ट्रमंडल खेलों में काफी फायदा मिलेगा।'

हम सब की ओर से सुशील कुमार को बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं ! 

शनिवार, 11 सितंबर 2010

गणेश चतुर्थी और ईद की शुभकामनाएं

आज दो प्रमुख त्यौहार साथ-साथ है ईद और गणेश चतुर्थी। ब्लाग जगत में भी इन त्यौहारों पर शुभकामनाओं की धूम हैं। बधाईयाँ बाँटी जा रही हैं और ग्रहण की जा रही हैं। तो भला हम पीछे क्यों रहते ??

आप सभी को गणेश चतुर्थी और ईद की शुभकामनाएं। 
हर्षोल्लास से मिलकर प्रेम से त्यौहार मनाएं।

मंगलवार, 7 सितंबर 2010

एक रिपोस्ट :- ..महापुरुष-महापुरुष में ज्यादा फर्क नहीं होता



उस दिन मंत्री जी को एक महापुरुष की स्मृति में भाषण देना था, लेकिन ऐन वक्त पर उन्हे याद आया कि पी.ए. से भाषण तैयार कराना तो भूल ही गये। समस्या पी.ए. को बताई। पी.ए. ने कहा- 'कोई बात नहीं सर, हालांकि उन महापुरुष के बारे में जानकारी तो मुझे भी कुछ नहीं है, लेकिन महापुरुष-महापुरुष में ज्यादा फर्क नहीं होता।' मंत्री जी की कुछ समझ में नहीं आया। पी.ए. बोला, 'चिंता मत कीजिए, सर, मैं अभी उन महापुरुष के बारे में जोरदार भाषण तैयार कर देता हूं। क्या नाम बताया था आपने उनका! हां, राधेश्याम जी। अभी तैयार हो जायेगा भाषण।'
पी.ए. द्वारा तैयार भाषण जब मंत्री जी ने पढ़ा तो जोरदार तालियों से उसे भरपूर प्रशंसा मिली। भाषण इस प्रकार था- ''भाइयों और बहनों! मुझसे आग्रह किया गया है कि मैं राधेश्याम जी की स्मृति में कुछ कहूं। लेकिन मैं उनके बारे में क्या कह सकता हूं? उनके बारे में कुछ कहना सूरज को दीपक दिखाना है। लेकिन फिर भी मैं कहना चाहूंगा कि ऐसी महान आत्माएं रोज-रोज पैदा नहीं होतीं। उन्होंने अपना सारा जीवन देश-समाज के लिये समर्पित कर दिया। उन्होंने जीवन में पग-पग पर कष्ट सहे, लेकिन अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। सत्य के लिये जिये, सत्य के लिये मरे। उन्होंने कभी अपने सुख-चैन की परवाह नहीं की। जहां किसी की आंख में आंसू दिखे, उनका कोमल हृदय द्रवित हो उठा। वे सबको साथ लेकर चलने वालों में थे लेकिन सिद्धांतों की कीमत पर नहीं। उन्हे सर कटाना मंजूर था, सर झुकाना नहीं। स्वाभिमान उनके अंदर कूट-कूटकर भरा था, वे जमीन से जुड़े आदमी थे। वे किसी इंसान को छोटा नहीं समझते थे। उन्होंने गरीब, बेसहारा, दबे-कुचले लोगों को हमेशा गले से लगाया। वे अहिंसा के पुजारी थे, राष्ट्र के नायक थे, बात के धनी थे, सत्य के पुजारी थे। देश को आज ऐसे ही महापुरुषों की जरूरत है जो उनके दिखाये रास्ते पर चलकर देश और समाज का भला कर सकें। उनके असमय चले जाने से राष्ट्र को अपूर्णनीय क्षति हुई है, जिसकी भरपाई असंभव नहीं तो भी मुश्किल जरूर है। यादें तो बहुत आ रही है, किन्तु समय के अभाव में अपनी बात को यहीं विराम देता हूं। जय हिंद।''

तालियों की गड़गड़ाहट थमने तथा कार्यक्रम समाप्त होने के बाद उपस्थित पत्रकारों ने मंत्री जी से कुछ सवाल पूछे।

पहला पत्रकार- 'मंत्री जी, जोरदार भाषण के लिये बधाई! लेकिन आपने कहा कि राधेश्याम जी अहिंसावादी थे, जबकि वे तो क्रांतिकारियों के समर्थक माने जाते थे।'

दूसरा पत्रकार- 'आपने कहा कि राधेश्याम जी असमय चले गये, जबकि वे तो 75 वर्ष के वृद्ध थे।'

तीसरा पत्रकार- 'आपने कहा कि राधेश्याम जी सिद्धांतों के पक्के थे लेकिन उन्होंने तो चार बार दलबदल किया।'

चौथा पत्रकार- 'आपने कहा वे स्वाभिमानी थे, लेकिन वो तो जुगाड़ के बल पर हर सरकार में मंत्री पद हासिल कर लेते थे।'

मंत्री जी थोड़ा सकपकाये और पी.ए. के कान में फुसफुसाए, 'अरे क्या-क्या बुलवा दिया मुझसे, किस कम्बख्त की स्मृति में यह आयोजन था?' पी.ए. ने बात सम्हालने का आश्वासन मंत्री जी को दिया और पत्रकारों से बोला, 'देखिये, मंत्री जी को आवश्यक मीटिंग में जाना है, आप सभी अपने प्रश्न लिखकर दे दीजिये। प्रेस-विज्ञप्ति में सबके उत्तार दे दिये जायेंगे।'

प्रेस-विज्ञप्ति, जिसे खुद पी.ए. ने ही तैयार किया, में दिये गये जवाब इस प्रकार थे-

1. क्रांतिकारियों का समर्थन उनके भावुक हृदय को दर्शाता है लेकिन सिद्धांतत: वे पक्के गांधीवादी थे। वे कभी किसी हिंसक गतिविधि में लिप्त नहीं रहे, जो उनके अहिंसावादी होने का अकाट्य प्रमाण है।

2. वे असमय चले गये, अन्यथा राजनीति में 75 वर्ष की उम्र होती ही क्या है? वे अनुभव का खजाना थे। वे अपने सपने अधूरे छोड़ गये। कुछ समय और जीते तो क्रांति ला सकते थे।

3. उन्होंने दलबदल अवश्य किया लेकिन अपने सिद्धांतों की खातिर। उन्होंने अपने सिद्धांतों को नहीं छोड़ा, बल्कि जिस दल ने अपने सिद्धांत छोड़े, राधेश्याम जी ने ही उन दलों को लात मार दी।

4. वे हर सरकार में मंत्री जुगाड़ से नहीं अपनी योग्यता और प्रतिभा के बल पर बनते थे, क्योंकि कोई भी सरकार उनकी विलक्षण प्रतिभा से वंचित नहीं रहना चाहती थी।

प्रेस-विज्ञप्ति पढ़कर सभी पत्रकार एक-दूसरे का मुंह देखकर पहले मुस्कराये और फिर पूरा माहौल उपहासात्मक खिलखिलाहटों से गूंज उठा।

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