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शनिवार, 29 जनवरी 2011

अब आपदाओं में भी काम करेंगे फोन

वैज्ञानिकों का दावा है कि उन्होंने एक ऐसी तकनीक ढूंढ निकाली है, जिसके इस्तेमाल से आपदाओं की स्थिति में भी मोबाइल फोन काम करेगा। इस तकनीक के जरिए उन इलाकों तक टावरों के सिग्नल पहुंचाए जा सकेंगे, जहां के टावर काम नहीं कर रहे अथवा किसी आपदा के कारण ध्वस्त हो गए हों।
फ्लिंडर्स विश्वविद्यालय के एक अंतरराष्ट्रीय दल ने यह सॉफ्टवेयर तैयार किया है, जिससे मोबाइल टावर नहीं होने पर भी फोन किए जा सकेंगे। यह तकनीक निकटतम टावर से सिग्नल को प्रभावित इलाके तक पहुंचाती है।
इस शोध का नेतृत्व कर रहे डॉक्टर पॉल गार्डनर ने बताया कि बिना किसी अतिरिक्त हार्डवेयर के आम फोन भी इस सॉफ्टवेयर के जरिए बिना टावर के काम कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि हमारी यह तकनीक सभी के लिए है इसलिए कोई भी सेवा प्रदाता इसका इस्तेमाल कर सकता है।
इस सॉफ्टवेयर के जरिए पिछड़े इलाकों में भी सिग्नल पहुंचाया जा सकेगा। हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया कि बाजार के उपभोक्ताओं तक यह तकनीक कब तक पहुंचाई जा सकेगी।

मंगलवार, 25 जनवरी 2011

बारात के स्वागत में नाचती हुयी घोड़ी का नज़ारा

आइये आज आपको एक बारात में ले चलता हूँ ...

 मिलिए हमारे बड़े भाई श्री गुंजन मिश्रा जी से ... जी हाँ इनका ही विवाह है !
"कैसा लग रहा हूँ मैं ?" शायद गुंजन भाई यही सोच रहे है !

अब एक झलक बारात की ...

घोड़ी पर सवार दुल्हे मियाँ .. गुंजन मिश्रा

अब जिस ख़ास बात के लिए यह पोस्ट लगा रहा हूँ वह आप सब को बताता / दिखता हूँ ...

वहाँ बारात के स्वागत के लिए बधू पक्ष वालों ने एक नाचने वाली घोड़ी का इंतज़ाम किया हुआ था ... घोड़ी का नाच इस से पहले टीवी पर तो देखा था ... अपनी आँखों से पहली बार देखा तो सोचा आप सब को भी दिखवा दूँ |

लीजिये आप सब भी देखिये ...

उत्तर प्रदेश के एटा जिले के फरौली गाँव में दिनांक २३/०१/२०११ को सम्पन्न हुए मैनपुरी के श्री गुंजन मिश्रा के विवाह में बारात के स्वागत में नाचती हुयी घोड़ी !


सोमवार, 24 जनवरी 2011

शास्त्रीय संगीत के पुरोधा पंडित भीमसेन नहीं रहे

अपनी ओजस्वी वाणी से हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के खजाने को समृद्धि के नए शिखर पर ले जाने वाले पंडित भीमसेन जोशी का पुणे में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। पंडित जोशी 89 वर्ष के थे।
उनके परिवार ने बताया कि 'भारत रत्न' से सम्मानित जोशी को 31 दिसंबर को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वृद्धावस्था की परेशानियों के कारण उनके गुर्दे और श्वसन तंत्र ने काम करना बंद कर दिया था, जिसके बाद उन्हें जीवन रक्षक तंत्र पर रखा गया था।
खानसाहिब अब्दुल करीम खान के 'कैराना घराने' से संबद्ध पंडित जोशी के परिवार में तीन पुत्र और एक पुत्री हैं।
उनके निधन की खबर फैलते ही शहर में मायूसी का माहौल है और लोगों ने 'ख्याल गायकी' के दिग्गज पंडित जोशी के घर के बाहर उनके अंतिम दर्शन के लिए जुटना शुरू कर दिया है।
चार फरवरी, 1922 को कर्नाटक के धारवाड़ जिले के गडग में जन्मे पंडित जोशी को सबसे पहले जनवरी, 1946 में पुणे में एक कंसर्ट से सबसे ज्यादा पहचान मिली। यह उनके गुरू स्वामी गंधर्व के 60वें जन्मदिन के मौके पर आयोजित एक समारोह था। उनकी ओजस्वी वाणी, सांस पर अद्भुत नियंत्रण और संगीत की गहरी समझ उन्हें दूसरे गायकों से पूरी तरह अलग करती थी।
पंडित जोशी ने तानसेन के जीवन पर आधारित एक बांग्ला फिल्म में एक 'ध्रुपद' गायक के तौर पर अपनी आवाज दी और उसके बाद मराठी फिल्म 'गुलाचा गणपति' के लिए भी अपनी गायन प्रतिभा प्रदर्शित की। उन्होंने हिंदी फिल्मों 'बसंत बहार' और 'भैरवी' में भी अपनी आवाज का जादू बिखेरा। पंडित जोशी की 'संत वाणी' और मराठी 'भक्ति संगीत' के प्रभाव के चलते उनकी आवाज महाराष्ट्र और कर्नाटक के घर-घर में पहुंची।
पंडित जोशी को 972 में पद्मश्री, 1975 में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1985 में पद्म भूषण और 1992 में मध्य प्रदेश सरकार के 'तानसेन सम्मान' से सम्मानित किया गया। उन्हें 2008 में 'भारत रत्न' से विभूषित किया गया।
पंडित जोशी का 1999 में ब्रेन ट्यूमर का ऑपरेशन और 2005 में सर्वाइकल स्पाइन का ऑपरेशन हुआ।
पंडित जोशी ने 2007 में 'सवाई गंधर्व' वार्षिक संगीत समारोह में अपनी सार्वजनिक प्रस्तुति से लोगों को अभिभूत कर दिया। यह समारोह अपने गुरू की याद में उन्होंने ही शुरू किया था।
युगों तक फिजाओं में गूंजेंगे वो सुर जो तुमने छेड़े
-हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के एक युग का आज अवसान हो गया। पर इस युग के पुरोधा और 'भारत रत्न' पंडित भीमसेन जोशी ने सुरों को उस ऊंचाई पर पहुंचा दिया कि आने वाले कई युगों तक ए स्वर हवाओं में तैरते रहेंगे। पंडित भीमसेन जोशी उन महान कलाकारों में से थे जो अपनी सुरमई आवाज से हर्ष और विषाद दोनों ही भावों में जान डाल कर श्रोताओं के दिल में गहरे तक बस चुके थे।
वर्तमान समय में जोशी को सर्वाधिक लोकप्रिय हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायक बनाने में निर्विवाद रूप से उनकी दमदार आवाज की अहम भूमिका थी। जोशी किराना घराने का प्रतिनिधित्व करते थे लेकिन उन्होंने हल्के शास्त्रीय संगीत, भक्ति संगीत और अन्य विविधतापूर्ण संगीत में भी अपनी अमिट छाप छोड़ी।
चातुर्य और जुनून के संगम ने ही जोशी को उन अन्य शास्त्रीय गायकों से अलग स्थान दिया था जो अपनी घराना संस्कृति से ही जुड़े रहते थे जिससे उनकी रचनात्मकता बाधित हो सकती थी।
चार फरवरी 1922 को कर्नाटक के धारवाड़ जिले के गडग में जन्मे जोशी को बचपन से ही संगीत से लगाव था। वह संगीत सीखने के उद्देश्य से 11 साल की उम्र में गुरू की तलाश के लिए घर से चले गए। जब वह घर पर थे तो खेलने की उम्र में वह अपने दादा का तानपुरा बजाने लगे थे। संगीत के प्रति उनकी दीवानगी का आलम यह था कि गली से गुजरती भजन मंडली या समीप की मस्जिद से आती 'अजान' की आवाज सुनकर ही वह घर से बाहर दौड़ पड़ते थे।
स्कूल से घर लौटते समय जोशी, ग्रामोफोन रिकॉर्ड बेचने वाली एक दुकान के सामने खड़े हो जाते थे और वहां बज रहा संगीत सुनते थे। वहीं उन्होंने अब्दुल करीम खान का एक रिकॉर्ड सुना। यहीं से उनके मन में गुरू की चाह भी उठ खड़ी हुई। यह बात जोशी ने अपनी आत्मकथा लिखने वाले को एक साक्षात्कार में बताई थी।
गुरू की तलाश के लिए जोशी ने घर छोड़ा और गडग रेलवे स्टेशन चल पड़े। मुड़ी तुड़ी कमीज, हाफ पैंट पहने जोशी टिकट लिए बिना ट्रेन में बैठे और बीजापुर पहुंच गए। वहां आजीविका के लिए वह भजन गाने लगे। एक संगीतप्रेमी ने उन्हें ग्वालियर जाने की सलाह दी। वह जाना भी चाहते थे लेकिन ट्रेन को लेकर कुछ गफलत हुई और जोशी महाराष्ट्र की संस्कृति के धनी पुणे शहर पहुंच गए।
पुणे में उन्होंने प्रख्यात शास्त्रीय गायक कृष्णराव फूलाम्बरीकर से संगीत सिखाने का अनुरोध किया। लेकिन फुलाम्बरीकर ने उनसे मासिक फीस की मांग की जिसे देना उस लड़के के लिए संभव नहीं था जिसके लापता होने पर अभिभावक गडग पुलिस थाने में शिकायत दर्ज करा चुके थे। जोशी निराश हुए लेकिन उनका मनोबल नहीं टूटा। वह पुणे से मुंबई चले गए। गुरू की तलाश उन्हें हिन्दुस्तानी संगीत के केंद्र ग्वालियर ले गई जो उनका वास्तविक गंतव्य था। ग्वालियर के महाराज के संरक्षण में रह रहे सरोद उस्ताद हाफि़ज अली खान की मदद से युवा जोशी ने माधव संगीत विद्यालय में प्रवेश लिया। यह विद्यालय उन दिनों अग्रणी संगीत संस्थान था।
गायकी के तकनीकी पहलुओं को सीखते हुए जोशी ने 'ख्याल' की बारीकियों को आत्मसात किया। ख्याल गायन को ग्वालियर घराने की देन माना जाता है।
विद्यालय में मिली शिक्षा जोशी की संगीत सीखने की चाहत को संतृप्त नहीं कर पाई। एक बार फिर वह हाफि़ज अली खान से मिले और उस्ताद से अनुरोध किया कि वह उन्हें 'मारवा' राग तथा 'पूरिया' राग में अंतर समझाएं। बाद में जोशी ने इन दोनों शास्त्रीय रागों में महारत हासिल कर ली।
विद्यालय के एक शिक्षक की सलाह पर जोशी ने ग्वालियर छोड़ा और बंगाल चले गए। वहां उन्होंने भीष्मदेव चटर्जी के अनुयायी बन कर उनसे राग 'गांधार' सीखा। चटर्जी अपनी व्यस्तता के चलते अपने शिष्य को सिखाने के लिए पर्याप्त समय नहीं दे पाते थे। कुछ समय यहां रहने के बाद जोशी जालंधर चले गए।
जालंधर में होने वाले संगीत समारोह में देश भर के कलाकार हिस्सा लेते थे। यहां की श्रमसाध्य दिनचर्या ने जोशी को इतना मजबूत बना दिया कि वह बिना किसी समस्या के आजीवन कठोर रियाज करते रहे।
संयोगवश एक जलसे में जोशी की मुलाकात विनायकराव पटव‌र्द्धन से हुई। उन्होंने जोशी को उनके गृह नगर लौट जाने की सलाह दी और कहा कि वह कोंदगल में मौजूद कैराना घराने के प्रख्यात कलाकार सवाई गंधर्व के शिष्य बन जाएं। सवाई गंधर्व अब्दुल करीम खान के प्रमुख शिष्य थे। उन्होंने जोशी से कहा कि वह पहले उनकी परीक्षा लेंगे और फिर उन्हें संगीत सिखाने के बारे में विचार करेंगे।
जोशी परीक्षा में पास हो गए और सवाई गंधर्व ने उन्हें राग 'तोड़ी', 'मुल्तानी' तथा 'पूरिया' सिखाया क्योंकि वह मानते थे कि इन रागों का ज्ञान न केवल सुरीली आवाज के लिए जरूरी होता है बल्कि इससे इसके आरोह-अवरोह, तीव्रता से लेकर रेंज तक में सुधार होता है।
जोशी की शागिर्दी पांच साल तक चली। इस दौरान वह अपने गुरू के साथ संगीत समारोहों में भी गए। जल्द ही उन्होंने धारवाड़, सांगली, मिराज और कुरूंदवाड़ में छोटी प्रस्तुतियां देना शुरू कर दिया। उनके प्रशंसकों में मल्लिकार्जुन मंसूर भी थे जो बाद में देश के प्रख्यात गायक के तौर पर उभरे।
जोशी संगीत जगत की नामचीन हस्ती बनते गए। इसी दौरान उन्होंने मुंबई में एक सार्वजनिक प्रस्तुति दी जो बेहद सफल रही। पुणे में जनवरी 1946 में उन्होंने अपने गुरू के 60 वें जन्मदिन पर जो कार्यक्रम पेश किया उसने जोशी को श्रोताओं के दिलों में स्थापित कर दिया। इसके बाद उन्होंने देश भर में कार्यक्रम पेश किए। उन्होंने जल्द ही 'परंपरागत मूल्यों और सामूहिक संस्कृति के शौक' के बीच तालमेल बना लिया। उनकी दमदार आवाज़ उन्हें दूसरों से अलग कर देती थीा। श्वांस पर उनका अद्भुत नियंत्रण था। संगीत की संवेदनशीलता की उन्हें परख थी। इन खूबियों के चलते वह ज्ञान और जुनून का ऐसा मिलाजुला संगम पेश करने वाले सर्वोच्च हिन्दुस्तानी गायक बन गए जो जीवन और संगीत के प्रति उनकी दीवानगी बताता था।
बहुत ही कम लोगों को पता होगा कि इस शास्त्रीय गायक ने तानसेन के जीवन पर बनी एक बांग्ला फिल्म के लिए 'धु्रपद' गाया था। बाद में उन्होंने प्रख्यात मराठी विदूषक 'पु ला' देशपांडे द्वारा निर्मित निर्देशित मराठी फिल्म 'गुलाचा गणपति' के लिए पा‌र्श्वगायन किया। हिन्दी फिल्मों 'बसंत बहार' और 'भैरवी' के लिए भी जोशी ने पा‌र्श्वगायन किया था।
जोशी का शास्त्रीय संगीत सरहदों के पार चला गया। डच फिल्म निर्माता और निर्देशक एम लुइस ने वेंकूवर में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में जोशी को राग 'तोड़ी' गाते सुना और भारत में उनके संगीत पर एक फिल्म बनाई। फिल्म का प्रदर्शन पश्चिम में हुआ।
भारतीय शास्त्रीय संगीत में गहरी दिलचस्पी रखने वाले, कनाडा के उद्योगपति जेम्स बेवेरिज पुणे आए और जोशी पर 20 मिनट का वृत्तचित्र तैयार किया। इसका शीर्षक 'राग मियां मल्हार' था। भारत में प्रख्यात निर्देशक गुलज़ार ने भीमसेन जोशी के जीवन और करियर पर 1993 में 45 मिनट का एक वृत्तचित्र बनाया था जिसे सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री फिल्म के लिए राष्ट्रीय अवार्ड मिला था।
शास्त्रीय संगीत के सुरों को अपनी धड़कन मानने वाले जोशी न केवल कार चलाने के शौकीन थे बल्कि अच्छे तैराक भी थे। युवाकाल में उन्हें योग करना और फुटबॉल खेलना बहुत अच्छा लगता था। मदिरा के प्रति अपनी कमजोरी से अवगत जोशी को जब अहसास हुआ कि इससे उनका करियर प्रभावित हो रहा है तो 1979 में उन्होंने इससे तौबा कर ली।
सफलता की राह पर बढ़ते जोशी की लोकप्रियता और कला का जादू कभी कम नहीं हुआ। 1972 में उन्हें पद्मश्री सम्मान, 1975 में संगीत नाटक अकादमी अवार्ड, 1985 में पद्म भूषण सम्मान से नवाज़ा गया। मध्यप्रदेश सरकार ने 1992 में जोशी को 'तानसेन सम्मान' प्रदान किया।
दूरदर्शन के राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के लिए तैयार किए गए कार्यक्रम 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' को अपनी वाणी देकर पंडित भीमसेन जोश ने न केवल देशवासियों में राष्ट्रभक्ति का एक नया जज्बा पैदा किया बल्कि खुद भी देश की एक आवाज बन गए।
जोशी के एक आत्मकथा लेखक ने उनके बारे में कभी कहा था, 'एक ऐसा व्यक्ति जो पूरे रोमांस तथा प्रबलता और अपने संगीत की पूरी पहचान के साथ अपना जीवन जीता है और उसे प्यार करता है ़ ़।'
वास्तविक जीवन में वह एक सीधे सादे, पारदर्शी व्यक्ति थे। उम्र बढ़ने के कारण पंडित जी ने पिछले कुछ वर्ष से सार्वजनिक कार्यक्रम देना बंद कर दिया था। लेकिन 2007 में आयोजित सवाई गंधर्व महोत्सव में जब वह व्हीलचेयर पर आए और लोगों की फरमाइश पर एक प्रस्तुति दी तो यह पल संगीतप्रेमियों के जीवन का यादगार पल बन गया। यह वह अंतिम अवसर था जब जोशी सार्वजनिक रूप से नजर आए थे। अपने गुरू सवाई गंधर्व की याद में सालाना सवाई गंधर्व महोत्सव का आयोजन जोशी ने ही शुरू किया था।
वर्ष 2008 में जोशी देश के सर्वोच्च असैन्य सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किए गए। यह एक कृतज्ञ देश की ओर से पंडित  को दिया गया सम्मान था जिन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत को समृद्ध किया और अपनी नायाब आवाज़ से आम आदमी को इसके करीब पहुंचाया।

(जागरण से साभार)


पंडित भीमसेन जोशी जी को सभी मैनपुरी वासीयों की ओर से हार्दिक श्रद्धांजलि !

शनिवार, 22 जनवरी 2011

२२/०१/२०११ को दैनिक हिन्दुस्तान में छपा एक लेख और मेरा कमेन्ट !

२२/०१/२०११ को दैनिक हिन्दुस्तान में छपा एक लेख और मेरा कमेन्ट !
२२/०१/२०११ को दैनिक हिन्दुस्तान के मैनपुरी संस्करण में छपा एक लेख और मेरा कमेन्ट !

शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

पुण्य तिथि पर विशेष : - आजाद हिंद फौज के आधार स्तम्भ थे रास बिहारी बोस

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान सेनानी रास बिहारी बोस आजाद हिंद फौज का आधार स्तम्भ थे जिन्होंने जापान में रहकर अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया।

पच्चीस मई 1886 को बंगाल के ब‌र्द्धवान में जन्मे रास बिहारी बोस ने भारत में रहकर जहां बहुत सी क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम दिया, वहीं उन्होंने जापान से ब्रितानिया हुकूमत के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष की शुरूआत की।
इतिहासवेत्ता एमके कपूर के अनुसार 1908 में अलीपुर बम कांड के बाद रास बिहारी बोस देहरादून आ गए और वन अनुसंधान संस्थान में हैड क्लर्क के रूप में काम करने लगे। वह वहां गुप्त रूप से स्वतंत्रता संग्राम की चिनगारी सुलगाने का काम करने लगे और बहुत से नौजवानों को आजादी के आंदोलन में शामिल कर लिया।

रास बिहारी बोस ने 1912 में दिल्ली के चांदनी चौक पर अंग्रेजों को खुली चुनौती दी और कहा कि जितना जल्द वे भारत छोड़ेगे, उतना ही उनके लिए अच्छा रहेगा। भारत के इस महान क्रांतिकारी ने वायसराय लार्ड हॉर्डिंग को सबक सिखाने की ठानी। रास बिहारी, अवध बिहारी, भाई बाल मुकुंद, मास्टर अमीर चंद्र और वसंत कुमार विश्वास ने 23 दिसंबर 1912 को चांदनी चौक पर हार्डिंग पर बम फेंका जो दिल्ली में एक बड़े जुलूस के साथ अपनी सवारी निकाल रहा था।

क्रांतिकारी हार्डिंग की हेकड़ी निकलना चाहते थे जो भारतीयों पर कहर बरपाने के लिए तरह-तरह के हुक्म जारी करता था। हार्डिंग की किस्मत अच्छी थी, जिससे वह इस हमले में बच निकला लेकिन वह घायल हो गया। इस घटना के बाद गोरी हुकूमत ने आजादी के दीवानों पर दमन चक्र तेज कर दिया और चंादनी चौक की घटना में शामिल क्रांतिकारियों को पकड़ने के लिए व्यापक अभियान छेड़ा। ऐसे भी कई लोग गिरफ्तार कर लिए गए, जिनका इस घटना से कोई लेना देना नहीं था।

इस बम कांड में शामिल सभी क्रांतिकारी पकड़ लिए गए, लेकिन रास बिहारी बोस हाथ नहीं आए और वह भेष बदलकर जापान जा पहुंचे। मास्टर अमीर चंद्र, भाई बाल मुकुंद और अवध बिहारी को आठ मई 1915 को फांसी पर लटका दिया गया। वसंत कुमार विश्वास को अगले दिन नौ मई को फांसी दी गई।

उधर, जापान में रहकर रास बिहारी ने दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों में रह रहे भारतीयों को एकजुट करने का काम किया और उनके सहयोग से 'इंडियन इंडिपेंडेंस लीग' की स्थापना की। सैन्य अधिकारी मोहन सिंह के सहयोग से उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के भारतीय युद्धबंदियों को लेकर इंडियन नेशनल आर्मी [आजाद हिंद फौज] की स्थापना की। बाद में इसकी कमान नेताजी सुभाष चंद्र बोस को सौंप दी गई।

जापान की राजधानी तोक्यो में 21 जनवरी 1945 को रास बिहारी का निधन हुआ। जापान सरकार ने उन्हें 'आर्डर आफ द राइजिंग सन' सम्मान से नवाजा। 

सभी मैनपुरी वासीयों की ओर से भारत माता के इस सच्चे सपूत को शत शत नमन  |

गुरुवार, 20 जनवरी 2011

आज से शुरू होगी मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी सेवा

देशभर में मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी [एमएनपी] सेवा गुरुवार से शुरू होने जा रही है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस सेवा का शुभारंभ करेंगे।
माना जा रहा है कि एमएनपी की सेवा की शुरुआत के बाद दूरसंचार आपरेटरों पर अपनी सेवाओं की गुणवत्ता सुधारने का दबाव बढ़ेगा। एमएनपी के तहत मोबाइल उपभोक्ता को अपना नंबर बदले बिना आपरेटर बदलने की सुविधा मिलेगी।
शुरुआत के तौर पर एमएनपी की सुविधा सबसे पहले पिछले साल नवंबर में हरियाणा के कुछ इलाकों में लागू की गई थी, पर गुरुवार से प्रधानमंत्री देश भर में इसे लॉन्च कर देंगे। टेलिकॉम मिनिस्टर कपिल सिब्बल के मुताबिक, इससे बड़ा फायदा यह होगा कि अगर आप अपने सर्विस प्रवाइडर से खुश नहीं हैं तो नंबर के बारे में डरे बिना आप दूसरे सर्विस प्रवाइडर की सेवा ले सकते हैं। लॉन्च से पहले ही सेल्युलर कंपनिया तरह-तरह से यूजर्स को लुभाने लगी हैं और कई ने टोल-फ्री लाइनें भी शुरू कर दी हैं। इनमें लोगों को बिना नंबर बदले सर्विस बदलने के बारे में बताया जा रहा है।
दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा कि यह ग्राहकों के लिए एक बड़ा कदम है। इससे चयन की सुविधा उपलब्ध होगी और प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। दूरसंचार आपरेटर जितनी बेहतर सेवाएं देंगे, ग्राहक उतने ज्यादा उनकी ओर आकर्षित होंगे।
देश में एमएनपी सेवाओं की शुरुआत पिछले साल नवंबर में हरियाणा से हुई थी। आइडिया सेल्युलर और वोडाफोन जैसी कंपनियों ने एमएनपी के मद्देनजर ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए अपना प्रचार अभियान भी शुरू कर दिया है।
आइडिया सेल्युलर प्रतिद्वंद्वी आपरेटरों के ग्राहकों को लुभाने के लिए 'नो आइडिया गेट आइडिया' अभियान शुरू कर चुकी है। कंपनी ने ग्राहकों को इस सेवा के बारे में जानकारी देने के लिए टोल फ्री नंबर भी शुरू किया है।
19 रुपये में आजादी

एमएनपी के तहत आप मोबाइल नंबर बदले बगैर सर्विस प्रवाइडर बदल सकते हैं। आपका सेल नंबर नए सर्विस प्रवाइडर के पास पहुंच जाएगा। यह प्रक्रिया पूरी होने में सात दिन का वक्त लगेगा। अगर आप जीएसएम टू जीएसएम, सीडीएमए टू जीएसएम या फिर कोई दूसरा कनेक्शन यूज कर रहे हैं, तब भी आप इस सर्विस का फायदा उठा सकते हैं। इस सुविधा के लिए आपको नए सर्विस प्रवाइडर को महज 19 रुपये देने होंगे।

मंगलवार, 18 जनवरी 2011

ब्लोगिंग का रजनीकांत ... मैनपुरी में


आज की मेरी यह पोस्ट हकीकत और मेरी कल्पना का एक मिला जुला रूप है ... आप सब से विनती है इस को उसी रूप में लें !

खुशदीप भाई को बहुत बहुत धन्यवाद ... इस पोस्ट का आईडिया उनकी पोस्ट से ही आया !
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ब्लोगिंग का रजनीकान्त - महफूज़ अली

लीजिये साहब देख लीजिये ... क्या होगा अगर के ब्लोगिंग के रजनीकांत ... मैनपुरी आने का विचार बनाये तो ... 



सब से पहले तो लखनऊ में हल्ला होगा !
अब जब बहन जी तक खबर जाएगी तो चाचा मुलायम को भी भनक लगनी ही है
मैनपुरी का मिडिया कैसे पीछे रहता
प्रशासन भी तैयार
प्रशासन भी तैयार

प्रशासन भी तैयार

और हम भी तैयार
लो जी आ गए ब्लोगिंग के रजनीकान्त अपने उड़नखटोले में  
सुरक्षा कर्मी चौकस है
सब से पहले मोबाइल बंद किये जाएँ
थक गए यार ... गर्दन अकड गई सफ़र में
२ बोतल पानी पिया तब जा कर अब थोडा आराम मिला
हम थके हुए है ... इनको फोटो की पड़ी है
मुलाकात खत्म ... लौटने से पहले एक और फोटो
तो साहब यह थी कहानी हमारी इस छोटी सी मुलाकात की ब्लोगिंग के रजनीकांत - महफूज़ अली साहब से ! हम लोग जितनी देर भी साथ रहे एक पल भी यह नहीं लगा कि जीवन में पहली बार मिल रहे हो ! बहुत से मुद्दों पर खुल कर चर्चा हुयी ... जिन में रोज़ मर्रा के मुद्दे भी थे और ब्लोगिंग से जुड़े हुए मुद्दे भी ! कुल मिला कर मुलाकात एकदम झकास थी बोले तो एकदम रजनीकांत इस्टाइल !!!

अब इंतज़ार है अगली मुलाकात का ...

रविवार, 16 जनवरी 2011

पंडित भीमसेन जोशी की हालत नाजुक

भारत रत्न से सम्मानित प्रख्यात हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायक पंडित भीमसेन जोशी की हालत गंभीर है। वह पुणे के एक अस्पताल में भर्ती हैं।
जोशी के चिकित्सक अतुल जोशी ने बताया, 'उन्हे कृत्रिम जीवन रक्षक प्रणाली पर रखा गया है और उनका बार-बार डायलिसिस करना पड़ रहा है। उनकी हालत गंभीर है लेकिन पिछले 12 घंटे में उनकी हालत और नहीं बिगड़ी है।' जोशी आगामी आठ फरवरी को 88 वर्ष के हो जाएंगे। उन्हे 31 दिसंबर को वृद्धावस्था से जुड़ी बीमारियों और कमजोरी के कारण सहयाद्री अस्पताल में दाखिल कराया गया था।
जोशी को अस्पताल के गहन चिकित्सा कक्ष [आइसीयू] में रखा गया है। उनका श्वसन, गुर्दे और आंत की बीमारियों का इलाज चल रहा है। बेटी शुभदा मुलगुंड ने बताया कि पिता का स्वास्थ्य चिंताजनक बना हुआ है। इलाज का उन पर कोई असर नहीं हो रहा है। जोशी को वर्ष 2008 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया था।


आइये हम सब यह दुआ करें कि भारत माता के इस रत्न को जल्द से जल्द स्वास्थ्य लाभ हो !

शुक्रवार, 14 जनवरी 2011

सौर कैलेंडर पर आधारित एकमात्र पर्व मकर संक्रांति

भारत में मनाए जाने वाले पर्वों में मकर संक्रांति एकमात्र ऐसा पर्व है जो सौर कैलेंडर पर आधारित है जिसकी वजह से यह पर्व हर साल 14 जनवरी को मनाया जाता है। शेष सभी पर्व चंद्र कैलेंडर पर आधारित होते हैं।
संस्कृत और कर्मकांड के विद्वान डा रविनाथ शुक्ला ने बताया कि चंद्रमा की तुलना में सूर्य की गति लगभग स्थिर जैसी होती है और मकर संक्रांति सौर कैलेंडर पर आधारित पर्व है इसलिए इसकी तारीख नहीं बदलती। उन्होंने बताया कि देश में मनाए जाने वाले अन्य पर्वों की तारीख बदलती रहती है क्योंकि वह चंद्र कैलेंडर पर आधारित होते हैं और चंद्रमा की गति सूर्य की तुलना में अधिक होती है।
डा. रवि ने बताया कि संक्रांति संस्कृत का शब्द है जो सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश बताता है। हिंदू ज्योतिष के अनुसार, कुल बारह राशियां होती हैं। इस प्रकार संक्रांति भी 12 हुईं। लेकिन मकर संक्रांति तब मनाई जाती है जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है। उन्होंने बताया कि पृथ्वी को कर्क और मकर रेखाएं काटती हैं। जब सूर्य कर्क रेखा को पार करता है तो पृथ्वी के आबादी वाले हिस्से में उसका प्रकाश कम आता है। इसी दौरान धनु में सूर्य का संचार होने पर सर्दी अधिक होती है जबकि मकर में सूर्य का संचार होने पर सर्दी कम होने लगती है। मकर संक्रंाति से गर्मी तेज होने लगती है और हवाएं चलने लगती हैं। बसंत पंचमी से ये हवाएं गर्म होने लगती हैं जिसकी वजह से रक्त संचार बढ़ जाता है। यही वजह है कि लोगों को बसंत में स्फूर्ति का अहसास होता है। पेड़ों पर नए पत्ते आने के साथ साथ फसल पकने की प्रक्रिया भी गर्म हवा लगने से शुरू हो जाती है। इसलिए कृषि के नजरिए से मकर संक्रंति अहम पर्व होता है।
मकर संक्रांति का पर्व ऐसा पर्व है जो भारत के अलग-अलग प्रदेशों में अलग अलग नामों से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में इस पर्व को 'तिलगुल' कहा जाता है। राजधानी के एक बैंक में कार्यरत सुप्रिया पाटिल ने बताया कि महाराष्ट्र में मकर संक्रांति पर घर के लोग सुबह पानी में तिल के कुछ दाने डाल कर नहाते हैं। महिलाएं रंगोली सजाती हैं और पूजा की जाती है। पूजा की थाली में तिल जरूर रखा जाता है। इसी थाली से सुहागन महिलाएं एक दूसरे को कुंकुम, हल्दी और तिल का टीका लगाती हैं। इस दिन तिल के विशेष पकवान भी पकाए जाते हैं। हल्दी कुंकुम का सिलसिला करीब 15 दिन चलता है।
एक सरकारी स्कूल की सेवानिवृत्त प्राचार्य तेजिंदर कौर ने बताया कि सिख मकर संक्रांति को माघी कहते हैं। इस दिन उन 40 सिखों के सम्मान में सिख गुरूद्वारे जाते हैं जिन्होंने दसवें गुरू गोविंद सिंह को शाही सेना के हाथों पकड़े जाने से बचाने के लिए अपनी कुर्बानी दी थी। इस दिन हमारे यहां खीर जरूर बनती है।
हिमाचल प्रदेश और हरियाणा में भी माघी की धूम होती है। बिहार में 14 जनवरी को संक्रांति मनाई जाती है। इस दिन लोग सुबह सवेरे स्नान के बाद पूजा करते हैं तथा मौसमी फल और तिल के पकवान भगवान को अर्पित करते हैं। इसके अगले दिन यहां मकरांत मनाई जाती है जिस दिन खिचड़ी का सेवन किया जाता है।
बुंदेलखंड और मध्यप्रदेश में भी इस पर्व को संक्रांत कहा जाता है। गुजरात में यह पर्व दो दिन मनाया जाता है। 14 जनवरी को उत्तरायण और 15 जनवरी को वासी उत्तरायण। दोनों दिन पतंग उड़ाई जाती है। घरों में तिल की चिक्की और जाड़े के मौसम की सब्जियों से उंधियू पकाया जाता है।
मकर संक्रांति को कर्नाटक में सुग्गी कहा जाता है। इस दिन यहां लोग स्नान के बाद संक्रांति देवी की पूजा करते हैं जिसमें सफेद तिल खास तौर पर चढ़ाए जाते हैं। पूजा के बाद ये तिल लोग एक दूसरे को भेंट करते हैं। केरल के सबरीमाला में मकर संक्रांति के दिन मकर ज्योति प्रज्ज्वलित कर मकर विलाकू का आयोजन होता है। यह 40 दिन का अनुष्ठान होता है जिसके समापन पर भगवान अयप्पा की पूजा की जाती है।
राजस्थान में मकर संक्रांत के दिन लोग तिल पाटी, खीर का आनंद लेते हैं और पतंग उड़ाते हैं। उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद, वाराणसी और हरिद्वार में गंगा के घाटों पर तड़के ही श्रद्धालु पहुंच कर स्नान करते हैं। इसके बाद पूजा की जाती है। उत्तराखंड में इस पर्व की खास धूम होती है। इस दिन गुड़, आटे और घी के पकवान पकाए जाते हैं और इनका कुछ हिस्सा पक्षियों के लिए रखा जाता है।
उड़ीसा में मकर संक्रांति को मकर चौला और पश्चिम बंगाल में पौष संक्रांति कहा जाता है। असम में यह पर्व बीहू कहलाता है। यहां इस दिन महिलाएं और पुरूष नए कपड़े पहन कर पूजा करते हैं और ईश्वर से धनधान्य से परिपूर्णता का आशीर्वाद मांगते हैं। गोवा में इस दिन वर्षा के लिए इंद्र देवता की पूजा की जाती है ताकि फसल अच्छी हो। तमिलनाडु में यह पर्व पोंगल कहलाता है। इस दिन से तमिलों के थाई माह की शुरूआत होती है। इस दिन तमिल सूर्य की पूजा करते हैं और उनसे अच्छी फसल के लिए आशीर्वाद मांगते हैं। यह पर्व राज्य में चार दिन मनाया जाता है।
आंध्रप्रदेश में भी यह पर्व चार दिन मनाया जाता है। पहले दिन 'भोगी' दूसरे दिन 'पेड्डा पांडुगा' [मकर संक्रांति] तीसरे दिन कनुमा और चौथे दिन मुक्कानुमा मनाया जाता है।
तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश में भोगी के दिन घर का पुराना और अनुपयोगी सामान निकाला जाता है और शाम को उसे जलाया जाता है।

(जागरण से साभार)

आप सभी को मकर संक्रांति की हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनाएं !

गुरुवार, 13 जनवरी 2011

इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों पर सरकार रखेगी नजर

जो लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं, उन पर सरकार कड़ी निगाह रखने की योजना रही है। गृह मंत्रालय और खुफिया ब्यूरो [आइबी] ने दूरसंचार विभाग [डॉट] के माध्यम से इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया [आइएसपीएआइ] को इस संबंध में निर्देश जारी किए हैं।
इंटरनेट सेवा मुहैया कराने वालों को ऐसी आसान तकनीकी राह तलाशने को कहा गया है, जिसके द्वारा किसी खास इंटरनेट प्रोटोकॉल [आइपी] एड्रेस का तत्काल पता लगा कर, यूजर द्वारा लॉग ऑन करते ही उसे चिह्नित किया जा सके।
इस आदेश में खास बात यह है कि सरकार अब देश में इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले हर भारतीय पर नजर रखना चाहती है। भले ही उसका कभी आपराधिक या संदिग्ध रिकॉर्ड न रहा हो।
खुफिया ब्यूरो ने दूरसंचार और सूचना तकनीक विभाग को मोबाइल सेवाएं प्रदान करने वाली कंपनियों तथा नेशनल इनफरमेटिक्स सेंटर [एनआइसी] के साथ मिल कर ऐसी व्यवस्था विकसित करने को कहा है, जिसके द्वारा किसी भी व्यक्ति द्वारा इंटरनेट का इस्तेमाल करने की पल-पल की खबर रहे।
सरकार का विचार ऐसी तकनीक विकसित करने का है, जिसमें यूजर को इंटरनेट का प्रयोग करने से पहले एक ऑनलाइन आइडेंटीफिकेशन या पासवर्ड का इस्तेमाल आवश्यक हो। फिर भले ही उसकी सर्विस प्रोवाइडर कंपनी कोई भी हो।
आइएसपीएआइ के अध्यक्ष राजेश छारिया के अनुसार, 'वे चाहते हैं कि हम उन्हें वॉइस ओवर इंटरनेट प्रोटोकॉल, बैंकिंग समेत ई-कॉमर्स लेन-देन और हवाई तथा रेल टिकटों की खरीद की जानकारी भी दें।'

आपका डाटा नहीं होगा सुरक्षित 

विशेषज्ञों के अनुसार यदि सरकार की चली, तो नागरिकों का कोई भी ऑनलाइन डाटा सुरक्षित नहीं रहेगा। इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडरों जैसी निजी और व्यावसायिक संस्थाओं के पास लोगों की सारी जानकारी पहुंच जाएगी। वे अपने लाभ के लिए इनका इस्तेमाल कर सकते हैं।
 
नागरिक अधिकारों को हनन

सूत्रों का कहना है कि सरकार का नया कदम संविधान के अचुच्छेद 19 का उल्लंघन है। जिसमें नागरिकों को अभिव्यक्ति और विचारों की आजादी गई है। साथ ही इससे अनुच्छेद 21 और सूचना तकनीक कानून की धारा 69 का भी हनन होता है, जिसमें नागरिकों की निजता को सुरक्षित रखने की बात कही गई है।
सुप्रीम कोर्ट के साइबर कानून विशेषज्ञ अधिवक्ता विवेक सूद के अनुसार, 'यह सुझाव कुछ ऐसा है, जैसे आपके हर बेडरूम में सीसीटीवी कैमरा लगाने को कह दिया जाए। यह असंवैधानिक है।'  
(मिड डे)

शुक्रवार, 7 जनवरी 2011

साल २०११ में समृद्धि के ११ मंत्र

नए साल से सभी की उम्मीदें बंधी होती हैं, जिनमें ढेर सारी समृद्धि की कामना भी शामिल है। लेकिन यह समृद्धि कैसे आए? यह सवाल आपके जेहन में भी होगा। समृद्धि का मत्र यही है कि सबसे पहले आप अपनी बचत को सुरक्षित करें और फिर अपने निवेश का प्रबधन इस तरीके से करें कि आपका पैसा आपके लिए काम करे, कमाई करे और खुद बढ़ता भी रहे। पेश हैं 2011 में समृद्ध होने के 11 सकल्प, जो बचत और निवेश में साल को सुखमय बना सकते हैं..
1. रहेंगे हमेशा अपडेट
सकल्प करें कि अपने निवेश और फायदे को लेकर हमेशा अपने आपको अपडेट रखेगे। अपने परिवार की जरूरत को जानेंगे और एक जिम्मेदार निवेशक बनेंगे। अपने पैसे की अहमियत समझेंगे। सबसे पहले अपने वित्ताीय लक्ष्य निर्धारित करेंगे, फिर बचत व निवेश की बुनियादी जानकारी हासिल करेंगे, ताकि कोई आपको मूर्ख न बना सके। इंटरनेट से दोस्ती करेंगे, ताकि सूचना भी मिले और रास्ते भी।
2. जरूर खरीदेंगे स्वास्थ्य बीमा
ग्यारह का सबसे अहम सकल्प कि अपना और अपने परिवार का स्वास्थ्य बीमा कराएंगे। सेहत से ज्यादा जरूरी कुछ नहीं हो सकता और इलाज महंगा हो चला है। 2010 के कैशलेस बीमा के झमेले ने सबसे बड़ी सीख यही दी है कि आपके पास हेल्थ इंश्योरेन्स होना जरूरी क्यों है। स्वास्थ्य बीमा खरीदने में कोताही न करें। टैक्स बचाने वाले बीमा उत्पाद इसका विकल्प नहीं हैं। यकीन मानिए, बीमा की दुनिया में सबसे पहली पसद हेल्थ इंश्योरेन्स होनी चाहिए। 1000 रुपये का प्रीमियम ही सही, लेकिन अपने परिवार को हेल्थ इंश्योरेन्स का सुरक्षा कवच देना मत भूलिए। बीमा उद्योग से जुड़े लोगों का मानना है कि अप्रैल 2011 की तिमाही में स्वास्थ्य बीमा खरीदना महंगा हो सकता है। जितनी जल्दी बीमा उतना सस्ता बीमा ही सबसे बड़ा मंत्र  है।
3. बैंक एफडी में कुछ बचत
सकल्प लें कि कुछ पैसा बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट में रखेंगे, ताकि वक्त पर तत्काल मिल सके। महगाई दर पर दबाव के चलते बैंकों ने अपनी जमा योजनाओं पर ब्याज दर बढ़ा दी है। बैंक अभी 8.5 फीसदी तक की ब्याज दर की पेशकश कर रहे हैं। बैंक चाहे सार्वजनिक हो या निजी, लेकिन एक बार सभी बैंकों की ब्याज दरों पर निगाह दौड़ाएंगे। तो एक बार विभिन्न बैकों की जमा योजना की तुलना कीजिए और इस भ्रम को दिमाग से हमेशा के लिए निकाल दीजिए कि आप अपने बैंक में ही फिक्स्ड डिपॉजिट करेंगे। मुनाफे का पहला उसूल यही है कि अगर जोखिम बराबर है, तो वहा जाने में सकोच मत कीजिए, जहा मुनाफा ज्यादा है।
4. बुढ़ापे की फिक्र
हर किसी के जीवन में सांझ यानी बुढ़ापा का आना तय है। अपने जीवन की साझ को आरामदायक बनाने के लिए अभी से कुछ बचाना शुरु कर दीजिए। सकल्प कीजिये कि इस साल पेंशन स्कीम जरूर लेंगे। पेंशन के लिए सरकार की ओर देखना अब बीते दिनों की बात हो गई है। सरकारी सेवाओं में भी पेंशन की परंपरा अब खत्म हो रही है। ऐसे में नई पेंशन योजना में हर माह 1000 रुपये की बचत समझदारी है। पेंशन में बचत पर कर रियायत भी मिलती है।
5. पीपीएफ है सदाबहार
सकल्प लें कि अगर प्रॉविडेंट फंड अकाउंट नहीं है, तो कल ही खुलवाएंगे। अगर आप नौकरीशुदा है और आपका पीएफ अथवा ईपीएफ आपके नियोक्ता द्वारा जमा किया जा रहा है, तो इससे बेहतर कुछ नहीं। लेकिन हर किसी के लिए अपना पीपीएफ अकाउंट तो होना ही चाहिए। इस अकाउंट में सबसे पहले आपको जिस पैसे की बिल्कुल जरूरत नही हैं, उसे डालना चाहिए। 70,000 रुपये तक के निवेश पर कर छूट मिलती है और 8 फीसदी का कर मुक्त तयशुदा रिटर्न। बिना किसी झझट, बिना किसी जोखिम के 8 फीसदी तयशुदा रिटर्न आपमें बचत करने की एक अच्छी योजना का विकास कर सकता है।
6. शुरुआत से टैक्स प्लानिग
सकल्प लें कि मार्च में टैक्स पर नहीं सोचेंगे, बल्कि जनवरी से पूरे साल की प्लानिग करेंगे। इस बार अपना टैक्स रिटर्न वक्त पर भरेंगे। अगर अभी तक आप पैन नबर न लेने की गलती को हल्के में ले रहे हैं, तो आप एक बड़ी भूल कर रहे हैं। वक्त पर रिटर्न भरें और जितना जल्दी हो सके अपना रीफंड वापिस लेने की कोशिश करें। हो सके तो इस बार अपने रिटर्न की ई-फाइलिग करें। यकीन कीजिए ये काफी आसान और किफायती है।
7. घालमेल बिल्कुल नहीं
सकल्प लीजिये कि निवेश व बीमा को अलग रखेंगे। बीमा सुरक्षा है, निवेश मुनाफे का जरिया। इसलिए अगर जीवन बीमा नहीं है, तो जल्दी कीजिये। 2011 अच्छी खबर लेकर आया है। अच्छी खबर इसलिए कि कई कंपनिया आपके लिए ऑन लाइन बीमा की सुविधा लेकर आने वाली हैं। वितरण का खर्च कम होने की वजह से ये पालिसीज सस्ती होंगी। लेकिन यहा ध्यान देने वाली बात यह है कि आपको एंडावमेंट या कैशबैक पॅालिसी की बजाय आपको टर्म बीमा खरीदना चाहिए। अपने बीमा एजेंट से टर्म बीमा की मांग करें और अगर वह आनाकानी करता है तो मुझ से संपर्क करें |
8. घर खरीदेंगे
सकल्प कीजिए, अगर जुगाड़ बना तो एक छोटा आशियाना इस साल जुटा लेंगे। अचल सपत्तिमें निवेश सबसे चोखा है। प्रॉपर्टी बाजार साल 2011 में हल्की गिरावट का शिकार हो सकता है। जानकारों की मानें, तो सबसे ज्यादा माग 15 से 35 लाख तक के घरों में नई माग निकलेगी। नेशनल हाउसिग बैंक ने अब 5 से 15 लाख रुपए के फ्लैट की नई कैटेगरी को मजूरी दे दी है और अगर बिल्डर्स इसमें कोई योजना लेकर आते हैं, तो यह 2011 का हिट फारमूला सबित हो सकता है। मगर ध्यान रखें कि अगर आप खुद के इस्तेमाल के लिए घर खरीदना चाह रहे हैं, तो इस साल आपके लिए मौका अच्छा है। निवेश के लिहाज से अगर आप थोड़ा इंतजार करें, तो बेहतर है। क्योंकि हो सकता है कि आपको ये साल ज्यादा मुनाफा न दे पाए।
9.सोने-चादी में निवेश
सकल्प करें कि सोने-चादी में समझदारी के साथ निवेश करेंगे। 2011 में सावधान रहने की जरूरत है। सोने-चादी की कीमतें महंगाई दर और ब्याज दरों पर निर्भर करेंगी। सोने में निवेश के लिए आपको ईटीएफ का जरिया इस्तेमाल करने की सलाह है और साथ में हर माह कुछ न कुछ जोड़ने की। गोल्ड ईटीएफ में भी एक साथ पैसा न डालें और एसआईपी की तर्ज पर ही यहा भी निवेश करें।
10.स्टॉक मार्केट में रहेंगे सजग
सकल्प करें कि अगर आप शेयर बाजार को समझते हैं, तभी बाजार में उतरेंगे, वरना म्युचुअल फंड में निवेश करके आराम फरमाएंगे। बाजार में उतरते वक्त भी अपने निवेश को अलग अलग क्षेत्रों में बाटकर रखेंगे। निवेश थोड़ा-थोड़ा और हर स्तर पर करेंगे। आपके पोर्टफोलियो में ब्लूचिप और मिडकैप शेयरों का एक अच्छा सतुलन होना चाहिए। अगर आप किसी खास सेक्टर में ही हाथ आजमाना चाहते हैं, तो आप देखेंगे कि उत्पाद या सेवा की खपत सबसे ज्यादा है।
11. डायवर्सिफाइड फंड्स
सकल्प करें कि म्युचुअल फंड में डावर्सिफाइड फंड ही अच्छे हैं। 2010 की गलतियों की सबसे पहली सीख यही है कि जिसने भी डायवर्सिफाइड फंड में निवेश किया, वह सबसे ज्यादा फायदे में रहा। साल 2011 में बुनियादी ढाचे से जुड़े फंड्स मुनाफा दे सकते हैं। यानी अगर आपने पहले इस सेक्टर में निवेश किया है, तो इससे अभी निकलने का वक्त नही है। इसी तरह प्रत्यक्ष कर सहिता आने में एक और साल का वक्त बाकी है, जिसका मतलब हुआ कि ईएलएसएस का यह आखिरी साल होगा। बीते तीन सालों में इन फंड्स ने कोई फायदा नहीं दिया, इसलिए ये स्कीमें बेचने वालों के चक्कर में न पड़ें। 
(जागरण से साभार)

रविवार, 2 जनवरी 2011

जाने वह कौन सा देश ... जहाँ तुम चले गए ... !!!

३ जनवरी २०१० ... शाम के यही कोई ७ बजे होंगे ... एक फोन आता है और मेरे जीवन का बहुत कुछ एक ही झटके में बदल जाता है ... वैसे उस फोन से ठीक १० मिनट पहले ऐसा ही कुछ और भी लोगो के साथ हुआ ... पर यहाँ बात मेरी हो रही है !!

मैं जो आप सब के लिए शिवम् हूँ ... उनके लिए शीबू था ... सिर्फ़ शीबू ... उनका एकलौता भांजा ... ना आगे कुछ ना पीछे कुछ और वो मेरे एकलौते मामा ... ना आगे कुछ ना पीछे कुछ !!

मेरी ननिहाल मुरादाबाद की है ... मंडी चौक के पास ... बल्लम मोहल्ले में ! घर के आस पास लोग मुझे वकील साहब के भांजे के रूप में जानते थे जो कि कलकत्ता से हर २ -३ साल के बाद आया करता था महीने भर के लिए ! वकील साहब के भांजे के रूप में मुझे कुछ विशेष आधिकार प्राप्त थे ... जिस में प्रमुख्य था ... किसी के भी घर में घुस कर अपनी गेंद उठा लेना ... भले ही क्रिकेट खेलते हुए लगाये गए उस शोट से अगले का कितना भी नुक्सान क्यों ना हुआ हो ... कोई और बच्चा जाता तो गेंद तो छोडिये साहब ... अच्छी खासी माँ की ... बहन की ... से उसका सत्कार होता था ... पर हम ठहरे वकील साहब के भांजे ... मजाल है जो कोई हम से कुछ कह जाए !!

पर जैसा कि आप सब को मालुम है ... हर चीज़ की एक कीमत होती है ... मेरे इस ठाठ की भी थी !!

" बेटा, पान खाने चलना है ? "

"
हाँ ... हाँ ... मामा ! "

" तो चलो फिर ... अच्छा सुनो ... अपनी मामी से सब्जी वाला थैला भी ले लेना ! "

" जी मामा "

अब मामा भांजे की जोड़ी निकल ली बाज़ार में ... थोड़ी ही दूर चलने के बाद आ गई पंडित जी की पान की दुकान ...


" वकील साहब जय राम जी की ! "

" जय राम जी की ... पंडित जी ... हमारे भांजे को पान खिलाओगे ?? "

" अरे क्यों नहीं साहब ... आखिर हमारे भी तो भांजे है !! "

हम खुश ... इतनी इज्ज़त आखिर संभाले तो भी कैसे ??

अगले ही पल ... उतर गई सारी खुमारी .... जब वकील मामा ने किया यह फरमान जारी ...

" दुकान देख लो ... अब रोज़ यहाँ से हमारा पान ले जाया करना !! "

कुछ समझे आप ... नहीं ... अरे साहब ... अभी ऊपर बताया ना आपको ... ठाठ की कीमत ... यह उसकी ही किश्त थी !

मैच बहुत ही रोमांचक दौर से गुज़र रहा है ... अभी थोड़ी देर पहले ही अनुज ने पंकज को '१ टिप १ हैण्ड' के नियम के अनुसार आउट किया है और अब हम बल्लेबाजी को आये है ... अब यहाँ साफ़ कर दें कि सब बच्चो में बड़े हम ही थे सो अपनी टीम को जीताने का भार हम पर कुछ जरूरत से ज्यादा ही था ... खैर साहब ... इधर हम तैयार है ... उधर गेंदबाज़ और बाकी खिलाडी ... कि इतने में वकील साहब की आवाज़ आती है ...

" अरे भई, शीबू कभी अपने मामा के पास भी बैठ जाया करो कुछ देर ... !!! "

" जी मामा अभी आया ... बस एक ओवर बाकी है ... "

" अरे मार गोली ओवर को ... इधर आ ... "

अब जब हुकुम आ ही गया है तो मारनी ही पड़ी गोली ... पूरे मैच को ...

" जी मामा ... "

" यार ज़रा माथा दबा दे ... फिर तो तू जाने ही वाला है ... वहाँ कौन मिलेगा तुझे ... जिस का तू माथा दबाये ! "


बात सही थी ... आज भी कोई और नहीं है जो माथा दबवाता हो मेरे से ... या जिस के लिए रोज़ मैं पान लेने जाता हूँ


तब लगता था ... वकील साहब खेलने नहीं देते ... आखिर एक बच्चे से घंटे भर माथा दबवाना या उसको ले कर सब्जी के बहाने पूरे बाज़ार का चक्कर लगवाना कहाँ का तरीका है !?

आज जब पूरा एक साल होने को आ गया है आप को गए हुए ... तब समझा हूँ ... घर - बाहर की सब जिम्मेदारियों के बीच अपने एकलौते भांजे के साथ समय बिताने के बहाने थे यह सब आपके !!

ठीक गुलज़ार - पंचम की टीम जैसी अपनी भी तो एक टीम ही थी ...




या तो खुद जाओ ... या मुझे बुला लो !!

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