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गुरुवार, 31 मार्च 2011

हैप्पी बर्थडे 'बुरा भला'

लो जी आज आप सब का यह ब्लॉग 'बुरा भला' पूरे २ साल का हो गया है | ३१ मार्च २००९ को युही बनाये इस ब्लॉग को आप सब का भरपूर प्यार मिला ... और आगे भी मिलता रहेगा ... यही आशा है !


इन २ सालो में क्या क्या हुआ इसका जिक्र फिर कभी ... अभी तो जश्न का माहौल है सो हम भी इसी में लगे हुए है ... डबल मौका जो है ... एक तो भारत की जीत और दूसरा 'बुरा भला' का जन्मदिन ! 

आइये मिल कर ख़ुशी मानते है ...

यहाँ इस ब्लॉग की सब से पहली पोस्ट का लिंक दे रहा हूँ :- 

वेदना

मंगलवार, 29 मार्च 2011

यह कोई खेल नहीं एक जंग है ...

"चाहे कोई कुछ भी कहे ... सच्चाई नहीं बदलती ... 

चहेरो पर भले ही मुस्कान ... घावो की टीस नहीं 

भूलती ... तुम हुकुमरान हो ... खूब सियासत करो ... 

सच यह है ... कुछ बातें जनता कभी नहीं भूलती !!"


हाँ यह सच है कल मोहाली में सिर्फ एक क्रिकेट मैच खेला जाना है  ... पर साथ साथ यह भी तो एक सच ही है कि जब जब बात हिंदुस्तान और पकिस्तान की हो ... कोई भी खेल सिर्फ एक खेल नहीं रह जाता बल्कि एक जंग बन जाता है !! 


और जब बात जंग की हो  ... 

तो जीत से कम कुछ भी नहीं  !!

तो जवानों आगे बड़ो और रोंद डालो दुश्मन को  ...


ऐसा मारो कि फिर उठने न पाए ...


कुचल दो इसका फन कि फिर डसने न पाए ... 


जय हिंद !! 

मंगलवार, 22 मार्च 2011

बलिदान दिवस पर विशेष रि पोस्ट :- 23/03/1931 - 23/03/2011



सरदार भगतसिंह का अंतिम पत्र अपने साथियों के नाम:


“22 मार्च,1931,




“साथियो,

स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए, मैं इसे छिपाना नहीं चाहता। लेकिन मैं एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूँ, कि मैं क़ैद होकर या पाबंद होकर जीना नहीं चाहता। 
 
मेरा नाम हिंदुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है और क्रांतिकारी दल के आदर्शों और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊँचा उठा दिया है – इतना ऊँचा कि जीवित रहने की स्थिति में इससे ऊँचा मैं हर्गिज़ नहीं हो सकता। 
 
आज मेरी कमज़ोरियाँ जनता के सामने नहीं हैं। अगर मैं फाँसी से बच गया तो वो ज़ाहिर हो जाएँगी और क्रांति का प्रतीक-चिन्ह मद्धिम पड़ जाएगा या संभवतः मिट ही जाए. लेकिन दिलेराना ढंग से हँसते-हँसते मेरे फाँसी चढ़ने की सूरत में हिंदुस्तानी माताएँ अपने बच्चों के भगत सिंह बनने की आरज़ू किया करेंगी और देश की आज़ादी के लिए कुर्बानी देनेवालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रहेगी. 
 
हाँ, एक विचार आज भी मेरे मन में आता है कि देश और मानवता के लिए जो कुछ करने की हसरतें मेरे दिल में थी, उनका हजारवाँ भाग भी पूरा नहीं कर सका. अगर स्वतंत्र, ज़िंदा रह सकता तब शायद इन्हें पूरा करने का अवसर मिलता और मैं अपनी हसरतें पूरी कर सकता. इसके सिवाय मेरे मन में कभी कोई लालच फाँसी से बचे रहने का नहीं आया. 
 
 मुझसे अधिक सौभाग्यशाली कौन होगा? आजकल मुझे ख़ुद पर बहुत गर्व है. अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इंतज़ार है. कामना है कि यह और नज़दीक हो जाए.




आपका साथी,

भगत सिंह ”
 
 
 
 
सभी अमर बलिदानियों को हमारा शत शत नमन !!
 
इंक़लाब जिंदाबाद !!

रविवार, 20 मार्च 2011

होली के त्यौहार पर आप पर बरसे माँ का प्यार बेशुमार

 लीजिये साहब ... होली की इस सुहानी और रंगीन सुबह को और भी खुशनुमा बनाये देते है और आप सब को कलकत्ता के प्रसिद्ध दक्षिणेश्वर स्थित काली माता मंदिर के दर्शन करवाते है ! आप सब भी माता काली का आशीर्वाद लीजिये और अपना जीवन सफल कीजिये !
कलकत्ता के प्रसिद्ध दक्षिणेश्वर स्थित काली माता मंदिर
मंदिर में स्थापित माता काली की भव्य प्रतिमा
मंदिर परिसर के आस पास का नज़ारा
 
इसी कामना के साथ कि होली के त्यौहार पर आप पर बरसे माँ का 
 
प्यार  बेशुमार 
 
आपको और आपके परिवार में सब को होली की बहुत 

 
बहुत हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनाएं !

शनिवार, 19 मार्च 2011

होली की बहुत बहुत हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनाएं

बाकी बातें फिर कभी ... फिलहाल ...








आपको और आपके परिवार में सब को होली की बहुत 

बहुत हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनाएं !

रविवार, 6 मार्च 2011

एक जरुरी सूचना :- कल से ब्लोगिंग बंद

सभी दोस्तों को मेरा प्रणाम ... कल से ब्लोगिंग बंद कर रहा हूँ ... अब तक जो भी कहा सुना ... बुरा या भला नहीं जानता ... पर आप सब के प्यार के लिए धन्यवाद !

जानता हूँ १० -११ दिन बहुत अजीब लगेगा  ... पर उसके बाद कोई दिक्कत नहीं होगी ... यही उम्मीद है !!

देवी काली के महान साधक रामकृष्ण परमहंस के जन्मदिन पर विशेष - विश्वास की शक्ति

स्वामी विवेकानंद के गुरु रामकृष्ण परमहंस के जीवन की ऐसी कुछ घटनाएं, जो रोचक है और प्रेरणास्पद भी..
देवी काली के महान साधक और स्वामी विवेकानंद के गुरु रामकृष्ण परमहंस का जन्म बगाल के कामारपुकुर गांव में शुक्ल पक्ष फाल्गुन द्वितीया के दिन हुआ था। इस बार यह तिथि 6 मार्च को है। 

उनका बचपन से ही विश्वास था कि ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं। उन्होंने ईश्वर की प्राप्ति के लिए कठोर साधना की। वे महान विचारक और मानवता के पुजारी थे। हम उनके जीवन से संबंधित कुछ घटनाओं का उल्लेख कर रहे है, जो हम सभी के लिए अनुकरणीय हैं-

करुणा भाव : बचपन में रामकृष्ण को सभी प्यार से 'गदाधर' पुकारते थे। उनकी बालसुलभ सरलता और मुस्कान से हर कोई सम्मोहित हो जाता था। जब उन्हें पढ़ने के लिए स्कूल में भर्ती कराया गया, तो किसी सहपाठी को फ टा कुर्ता पहने देखकर उन्होंने अपना नया कुर्ता दे दिया। कई बार ऐसा होने पर एक दिन उनकी मां ने गदाधर से कहा, प्रतिदिन नया कुर्ता कहा से लाऊंगी? उन्होंने कहा- ठीक है। मुझे एक चादर दे दो। मुझे कुर्ते की आवश्यकता ही नहीं है। मित्रों की दु‌र्व्यवस्था देखकर उनके हृदय में करुणा उभर आती थी।
दिव्य ज्ञान : जब वे महज सात वर्ष के थे, तो उनके सिर से पिता का साया उठ गया। इसकी वजह से घर की परिस्थिति बिल्कुल बदल गई। आर्थिक कठिनाइया आने लगीं और पूरे परिवार का भरण-पोषण कठिन होता चला गया, लेकिन बालक गदाधर का साहस कम नहीं हुआ। इनके बड़े भाई रामकुमार च˜ोपाध्याय कोलकाता में एक पाठशाला के सचालक थे। वे उन्हें अपने साथ कोलकाता ले गए। रामकृष्ण बहुत निश्छल, सहज और विनयशील थे। सकीर्ण विचारों से वे बहुत दूर रहते थे। हमेशा अपने कार्य में लीन रहते। हालांकि काफी प्रयास के बावजूद जब रामकृष्ण का मन पढ़ाई-लिखाई में नहीं लगा, तो उनके बड़े भाई रामकुमार उन्हें कोलकाता के पास दक्षिणेश्वर स्थित काली माता मंदिर ले गए और वहां पुरोहित का दायित्व सौंप दिया। उनका मन इसमें भी नहीं रम पाया। कुछ वर्ष बाद उनके बड़े भाई भी चल बसे। अंतत: इच्छा न होते हुए भी रामकृष्ण मदिर में पूजा-अर्चना करने लगे। धीरे-धीरे वे मा काली के अनन्य भक्त हो गए। बीस वर्ष की उम्र से ही साधना करते-करते उन्होंने सिद्धि प्राप्त कर ली।

विश्वास : रामकृष्ण के सबसे प्रिय शिष्य थे विवेकानंद। उन्होंने एक बार उनसे पूछा, 'महाशय! क्या आपने कभी ईश्वर को देखा है?' उन्होंने उत्तर दिया-'हा, देखा है। जिस प्रकार तुम्हें देख रहा हूं, ठीक उसी प्रकार, बल्कि उससे कहीं अधिक स्पष्टता से।' वे स्वय की अनुभूति से ईश्वर के अस्तित्व का विश्वास दिलाते थे।

मानवता का पाठ : वे अपने भक्तों को मानवता का पाठ पढ़ाते थे। एक बार उनके परम शिष्य विवेकानद हिमालय पर तप करने के लिए उनसे अनुमति मागने गए। उन्होंने कहा, 'वत्स, हमारे आसपास लोग भूख से तड़प रहे हैं। चारों ओर अज्ञान का अंधेरा छाया हुआ है और तुम हिमालय की गुफा में समाधि का आनद प्राप्त करोगे। क्या तुम्हारी आत्मा यह सब स्वीकार कर पाएगी?' उनकी बात से प्रभावित होकर विवेकानंद दरिद्र नारायण की सेवा में लग गए। मा काली के सच्चे भक्त परमहंस देश सेवक भी थे।

शनिवार, 5 मार्च 2011

गुरुवार, 3 मार्च 2011

एक रिपोस्ट :- आओ महाराज .......... आप भी लटको !!

आज कल ब्लॉग्गिंग जगत में एक प्रचालन हो गया है कि "आप मुझे गाली दो मैं आपको गाली देता हूँ" !! एसा करने वाले इसको "गाली गाली" खेलना कहते है | बात एक दुसरे तक रहे तब तक तो ठीक है, कि भाई दो लोग है आपस में 'गाली गाली' खेल रहे है .........अपना क्या खेलने दो !! पर नहीं साहब एसे कैसे जब तक बात का बतंगड़ ना बने क्या मज्जा आया ??
तो क्या होता है कि बात आपस की ना हो कर आगे जा कर सामाजिक बनती है .............अब भी मज्जा नहीं आया तो क्या हुआ इसको एक धार्मिक रूप दे देते है ..........अब तो मज्जा आ के रहेगा ..................धर्मं एक एसा मुद्दा है जिस में सबको मज्जा आता है !!

कहते है ना , "SEX SALES" वैसे ही भारत में गुरु........... "धरम SALES" !! यह वह हेमाजी वाले धरम नहीं है यह हमारे वाला धर्मं है !! जिस के आगे हम सब भूल जाते है !! तो मामला जैसे ही धार्मिक होता है हम सब कुछ छोड़ छाड़ लग जाते बिना डीग्री की वकालत करने अपने अपने धर्म की ...................मेरा बढ़िया.......... तेरा घटिया ..............उसका तो और भी घटिया !! अब क्यों कि होता यह सब ब्लॉग जगत में है तो जो लोग ब्लॉग्गिंग करते है वही जान पाते है कि कहाँ - कहाँ, कितने, किस - किस धर्म के मोर्चा खोले बैठे है | बाकी दुनिया में तो, 'यहाँ पर सब शांति शांति है ' वाला गाना बज रहा होता पर ब्लॉग जगत में घोर अशांति फैल चुकी होती है और हर कोई दुसरे की बजने पर अमादा रहता है !!

अब एसे माहौल में जब शाम को चिट्ठाजगत वालों की मेल आती है कि आज १५ या २५ नए ब्लोगों का टिपण्णी से स्वागत करें तो बताइए तो सही कि उन नए लोगो से क्या कहे ??

हमारे छोटे से दिमाग में तो यही आता है कि भैया, चिमगादर के घर आये हो........ तो आओ तुम भी लटक लो जैसे हम लटके है !!

ब्लॉग आर्काइव

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