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मंगलवार, 27 सितंबर 2011

शहीद् ए आजम सरदार भगत सिंह जी के जन्मदिन पर







कुछ बहरों को सुनाने के लिए एक धमाका आपने तब किया था ,
एसे ही कुछ बहरे आज भी राज कर रहे है,
हो सके तो आ जाओ !!





सरफरोशी की तमन्ना
 
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, 
देखना है ज़ोर कितना बाजू-ऐ-कातिल में है.

करता नहीं क्यूँ दूसरा कुछ बात-चीत, 
देखता हूँ मैं जिसे वोह चुप तेरी महफिल में है.
ए शहीद-ऐ-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार, 
अब तेरी हिम्मत का चर्चा गैर की महफिल में है.
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है.

वक्त आने पे बता देंगे तुझे ए आसमान, 
हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है.
खींच कर लाई है सब को क़त्ल होने की उम्मीद, 
आशिकों का आज जमघट कूचा-ऐ-कातिल में है.
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है.

है लिए हथियार दुश्मन ताक़ में बैठा उधर, 
और हम तैयार हैं सीना लिए अपना इधर.
खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है, 
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है.

हाथ जिन में हो जूनून कट ते नही तलवार से, 
सर जो उठ जाते हैं वोह झुकते नही ललकार से.
और भड़केगा जो शोला-सा हमारे दिल में है, 
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है.

हम तो घर से निकले ही थे बांधकर सर पे कफ़न, 
जा हथेली पर लिए लो बढ़ चले हैं ये क़दम.
जिंदगी तो अपनी मेहमान मौत की महफिल में है, 
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है.

यूं खडा मकतल में कातिल कह रहा है बार बार, 
क्या तमन्ना-ऐ-शहादत भी किसी के दिल में है.
दिल में तूफानों की टोली और नसों में इन्किलाब, 
होश दुश्मन के उड़ा देंगे हमें रोको न आज.
दूर रह पाये जो हमसे दम कहाँ मंजिल में है,

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है. 
देखना है ज़ोर कितना बाज़ुय कातिल में है ||



इंक़लाब जिंदाबाद  






 शहीद् ए आजम सरदार भगत सिंह जी को उनके जन्मदिवस पर सभी मैनपुरी वासीयों की ओर से शत शत नमन |

शनिवार, 24 सितंबर 2011

जन्मदिन मुबारक हो जिम्मी पाजी

भारत की 1983 विश्व कप जीत के नायक पूर्व आलराउंडर मोहिंदर अमरनाथ जी का आज जन्मदिन है !
अमरनाथ ने 1969 से 1988 तक चले अपने करियर में 69 टेस्ट मैच में 4378 रन बनाए। उन्होंने इसके अलावा 85 एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैचों में 1924 रन भी जोड़े। उन्हें 1983 विश्व कप के सेमीफाइनल और फाइनल में मैन आफ द मैच चुना गया था।
अमरनाथ ने 1969 में बिल लारी की अगुवाई वाली आस्ट्रेलियाई टीम के खिलाफ टेस्ट मैचों में पदार्पण किया। वह 1981-82 में रणजी खिताब जीतने वाली दिल्ली टीम के कप्तान भी थे। स्वतंत्र भारत के पहले टेस्ट कप्तान और मोहिंदर के पिता लाला अमरनाथ 1994 में शुरू हुए इस पुरस्कार को हासिल करने वाले पहले क्रिकेटर थे। उन्होंने बांग्लादेश और मोरक्को की राष्ट्रीय टीमों के अलावा राजस्थान की रणजी ट्राफी टीम को कोचिंग भी दी।
आज भी अमरनाथ क्रिकेट कों एक कमेंटेटर के रूप में अपना योगदान दे रहे है |


मैनपुरी जनपद के सभी क्रिकेट प्रेमियों की ओर से मोहिंदर अमरनाथ जी कों जन्मदिन की बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !

गुरुवार, 22 सितंबर 2011

एक था टाइगर ... मंसूर अली खान पटौदी (1941 - 2011)

भारत के पूर्व क्रिकेट कप्तान मंसूर अली खान पटौदी का बृहस्पतिवार की शाम को निधन हो गया। उन्हें फेफड़ों में संक्रमण के कारण सर गंगा राम अस्पताल में भर्ती कराया गया था। नवाब पटौदी गुजरे जमाने की मशहूर अभिनेत्री शर्मिला टैगोर के पति और सैफ अली खान के पिता थे।
सर गंगा राम अस्पताल के एक बुलेटिन के अनुसार, 'मंसूर अली खान की स्थिति गंभीर बनी हुई थी और वह आईसीयू में भर्ती थे। उन्हें आक्सीजन सपोर्ट पर रखा गया था।' 70 बरस के पटौदी पिछले महीने से अस्पताल में थे। भारत के लिए 46 टेस्ट खेल चुके पटौदी देश के सबसे युवा और सफल कप्तानों में से रहे हैं। उन्होंने 40 टेस्ट मैचों की भारत की अगुवाई की। पटौदी ने 34.91 की औसत से 2793 रन बनाए हैं। उन्होंने अपने करियर में छह शतक और 16 अर्धशतक जमाए हैं।
अपनी कलात्मक बल्लेबाजी से अधिक कप्तानी के कारण क्रिकेट जगत में अमिट छाप छोड़ने वाले मंसूर अली खां पटौदी ने भारतीय क्रिकेट में नेतृत्व कौशल की नई मिसाल और नए आयाम जोड़े थे। वह पटौदी ही थे जिन्होंने भारतीय खिलाड़ियों में यह आत्मविश्वास जगाया था कि वे भी जीत सकते हैं। पटौदी का जन्म भले ही पांच जनवरी 1941 को भोपाल के नवाब परिवार में हुआ था लेकिन उन्होंने हमेशा विषम परिस्थितियों का सामना किया। चाहे वह निजी जिंदगी हो या फिर क्रिकेट। तब 11 साल के जूनियर पटौदी ने क्रिकेट खेलनी शुरू भी नहीं की थी कि ठीक उनके जन्मदिन पर उनके पिता और पूर्व भारतीय कप्तान इफ्तिखार अली खां पटौदी का निधन हो गया था। इसके बाद जब पटौदी ने जब अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में खेलना शुरू किया तो 1961 में कार दुर्घटना में उनकी एक आंख की रोशनी चली गई। इसके बावजूद वह पटौदी का जज्बा और क्रिकेट कौशल ही था कि उन्होंने भारत की तरफ से न सिर्फ 46 टेस्ट मैच खेलकर 34.91 की औसत से 2793 रन बनाए बल्कि इनमें से 40 मैच में टीम की कप्तानी भी की।
पटौदी भारत के पहले सफल कप्तान थे। उनकी कप्तानी में ही भारत ने विदेश में पहली जीत दर्ज की। भारत ने उनकी अगुवाई में नौ टेस्ट मैच जीते जबकि 19 में उसे हार मिली। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि पटौदी से पहले भारतीय टीम ने जो 79 मैच खेले थे उनमें से उसे केवल आठ में जीत मिली थी और 31 में हार। यही नहीं इससे पहले भारत विदेशों में 33 में से कोई भी टेस्ट मैच नहीं जीत पाया था। यह भी संयोग है कि जब पटौदी को कप्तानी सौंपी गई तब टीम वेस्टइंडीज दौरे पर गई। नियमित कप्तान नारी कांट्रैक्टर चोटिल हो गए तो 21 वर्ष के पटौदी को कप्तानी सौंपी गई। वह तब सबसे कम उम्र के कप्तान थे। यह रिकार्ड 2004 तक उनके नाम पर रहा। पटौदी 21 साल 77 दिन में कप्तान बने थे। जिंबाब्वे के तातैंडा तायबू ने 2004 में यह रिकार्ड अपने नाम किया था।
टाइगर के नाम से मशहूर पटौदी की क्रिकेट की कहानी देहरादून के वेल्हम स्कूल से शुरू हुई थी लेकिन अभी उन्होंने क्रिकेट खेलना शुरू किया था कि उनके पिता का निधन हो गया। इसके बाद जूनियर पटौदी को सभी भूल गए। इसके चार साल बाद ही अखबारों में उनका नाम छपा जब विनचेस्टर की तरफ से खेलते हुए उन्होंने अपनी बल्लेबाजी से सभी को प्रभावित किया। अपने पिता के निधन के कुछ दिन ही बाद पटौदी इंग्लैंड आ गए थे। वह जिस जहाज में सफर कर रहे थे उसमें वीनू मांकड़, फ्रैंक वारेल, एवर्टन वीक्स और सनी रामादीन जैसे दिग्गज क्रिकेटर भी थे। वारेल का तब पता नहीं था कि वह जिस बच्चे से मिल रहे हैं 10 साल बाद वही उनके साथ मैदान पर टास के लिए उतरेगा।
नेतृत्व क्षमता उनकी रगों में बसी थी। विनचेस्टर के खिलाफ उनका करियर 1959 में चरम पर था जबकि वह कप्तान थे। उन्होंने तब स्कूल क्रिकेट में डगलस जार्डिन का रिकार्ड तोड़ा था। पटौदी ने इसके बाद दिल्ली की तरफ से दो रणजी मैच खेले और दिसंबर 1961 में इंग्लैंड के खिलाफ फिरोजशाह कोटला मैदान पर पहला टेस्ट मैच खेलने का मौका मिला। यह मैच बारिश से प्रभावित रहा था। 


सभी मैनपुरी वासियों की ओर से टाइगर पटौदी को शत शत नमन और विनम्र श्रद्धांजलि ! 

गुरुवार, 15 सितंबर 2011

मिलिए हृदेश से ...

वैसे तो कहते है कि लोगो के सामने उनकी तारीफ नहीं की जाती पर कुछ लोग इस का अपवाद बन जाते है |
उनमे से ही एक है श्री हृदेश सिंह , ब्यूरो चीफ , हिन्दुस्तान , मैनपुरी |

मैनपुरी के मेदेपुर गाँव में जन्मे पले बड़े हृदेश ने किताबी ज्ञान मैनपुरी,आगरा,गाजियाबाद और दिल्ली में लिया |
दुनियादारी की समझ हुई तो बी की पढाई के साथ ही दैनिक जागरण मैं ५०० रुपये में नौकरी की जबकि इनका पूरा परिवार प्रसाशनिक सेवा में है | घर में बड़े भाई और पुरा परिवार के प्रसाशनिक सेवा में होने के बाद भी इन्होने प्रसासनिक सेवा की तेयारी करने की बजाये पत्रकारिता करने की ठानी और बरस २००४-५ में  भारतीय जन संचार संसथान नई दिल्ली से डिग्री ली| कुछ समय डीडी न्यूज़ में भी काम किया | देहरादून में अमर उजाला में सब-एडिटर बन काम किया,फ़िर बी जी फिल्म्स,न्यूज़ २४ आदि चैनल्स में भी अनुभव लेते रहे | इन सब के बावजूद हमेशा ही इनको यह लगता रहा कि मेरा असली काम इन जगहों पर नहीं परन्तु कही और है ...........
.............पर कहाँ ????????
बहुत सोचने पर जवाब मिला मैनपुरी !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

जिसको भी बताया उसीने मजाक उडाया | पर किसी ने ठीक ही कहा है कि "रौशनी गर खुदा को हो मंज़ूर , आंधियो में चिराग जलते है ||"

आप मैनपुरी वापस आ गए|

मैनपुरी की जनता को जागरूक बनाने के मकसद से सत्यम न्यूज़ चैनल की शुरुआत की। शुरूआती मुश्किलात के बाद हृदेश और उनका सत्यम न्यूज़ चैनल दिन रात उन्नति के पथ पर बड़ता रहा |

मैनपुरी जैसे पिछडे जनपद में पत्रकारिता के जरिये लोगों को आवाज़ बलन्द करने के लिए नेशनल जोय्तिबा फूले फेलोशिप अवार्ड मिला साथ - साथ बेस्ट जर्नलिस्ट ऑफ़ दा इयर और बेस्ट यंग जर्नलिस्ट अवार्ड भी मिले| मैनपुरी का नाम पुरे विश्व में रोशन हो यही उनका मकसद है ||

आजकल हृदेश लोकप्रिय हिंदी दैनिक अखबार 'हिन्दुस्तान' के मैनपुरी कार्यालय में 'ब्यूरो चीफ' के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे है | 

पेश है उन से हुयी एक ख़ास मुलाकात के कुछ अंश ...

* आपका स्वागत है परिकल्पना  ब्लॉग उत्सव-२०११ में
   * शुक्रिया
   * आप पत्रकारिता में कब से हैं ?
   * 11 वर्ष हो चुके हैं.बी.ए.की पढाई के साथ ही पत्रकारिता से जुड़ गया .
   * हिंदी पत्रकारिता से जुड़कर आपको कैसा महसूस हुआ ?
   * बेहद अच्छा.मैं बचपन से ही पत्रकारिता करना चाहता था.पत्रकारिता
में आने के बाद दुनिया को समझने में काफी मदद मिली.
   * आपकी नज़रों में साहित्य-संस्कृति और समाज का वर्त्तमान स्वरुप क्या है?
   * विकसित हो रहा है.नए तरह का साहित्य-संस्कृति और समाज सामने आरहा
है.लोग पसंद कर रहे हैं
   * आज ब्लॉगिंग लोगों के सर चढ़कर बोल रही है, इसे न्यू मीडिया कहा जा
रहा है इसकी  दिशा दशा पर आपकी क्या राय है ?

   * बिलकुल ये होना ही था.आवाज़ में असर हो तो वो माध्यम तलाश कर ही
लेती है.ब्लोगिंग के आने से लोगों को जेहनी तौर पर सकून मिला है.
   * आपकी नज़रों में हिंदी ब्लॉगिंग का भविष्य कैसा है ?
   * शानदार.चूँकि अभी इसमें बहुत गुंजाईश है.
   * हिंदी के विकास में इंटरनेट कितना कारगर सिद्ध हो सकता है ?
   * बेहद कारगर.इंटरनेट को हिंदी से और हिंदी को इंटरनेट से मजबूती मिलेगी.
  * आपने जब पत्रकारिता में कदम रखा तो उस समय की परिस्थितियाँ कैसी थी ?
   *  कंप्यूटर का इस्तेमाल शुरू हो गया था.अख़बार तेज़ी से रंगीन हो रहे
थे.ख़बरों के साथ प्रस्तुतीकरण पर भी ध्यान दिया जाने लगा था.
   *  जो गंभीर लेखन करता है क्या उसे ब्लॉग लेखन करना चाहिए या नहीं ?
   * क्यों नहीं...ब्लॉग सीधी बात कहने का शानदार मध्याम है.
   * आजकल क्या आप ब्लोगिंग कर पाते है ? पहले तो आप काफी सक्रिय थे ... ब्लोगिंग से मेरा परिचय भी आप ने ही करवाया था !
   * अफ़सोस यही है कि आजकल ब्लोगिंग कुछ छुट सी गयी है ... पर बहुत जल्द फिर से शुरू करने कि सोच रहा हूँ !
   * आप ब्लोगिंग ख़ास कर हिंदी ब्लोगिंग से कैसे और कब जुड़े ?
   * दो साल पहले ही हिंदी ब्लोगिंग से मेरे परिचय हुआ था ... सत्यम न्यूज़ मैनपुरी के नाम से ब्लॉग भी बनाया और काफी लिखा भी ... पर अब समय निकालना बहुत मुश्किल हो जाता है !
   * विचारधारा और रूप की भिन्नता के वाबजूद पत्रकारिता कई महत्वपूर्ण
मुद्दों पर  संगठित नहीं हो पाता इसका क्या कारण है ?

   * पहले तो मीडिया में कोई एजेंडा सेटिंग नहीं है.हाँ इसे अगर नई
तरक्की से जुड़ा जाये तो ऐसा हो सकता है.
   * आज के परिरचनात्मक दृश्य में अपनी जड़ों के प्रति रचनात्मक  विकलता
क्यों नहीं दिखाई देती ?

   * अनुभवों की कमी.
   * आपकी नज़रों में सामाजिक  संवेदना का मुख्य आधार क्या होना चाहिए ?
   * चिंतन.
   * आज की पत्रकारिता अपनी देसी जमीन के स्पर्श से वंचित क्यों है ?
   * नया नजरिया की कमी.
   * क्या हिंदी ब्लोगिंग यानी न्यू मीडिया में नया सृजनात्मक आघात देने
की ताक़त छिपी हुई है ?

   * बिलकुल.
   * पत्रकारिता  से जुड़े कोई सुखद संस्मरण बताएं ?
   * मेरी एक खबर से एक बच्चे को पढने के लिए स्कूल भेजा गया.
   * कुछ व्यक्तिगत जीवन से जुड़े सुखद पहलू हों तो बताएं ?
   * जब में पिता बना.
   * परिकल्पना ब्लॉग उत्सव की सफलता के सन्दर्भ में कुछ सुझाव देना चाहेंगे आप ?
   * अधिक से अधिक ब्लोगर जुड़ें.नए सुझावों पर महेनत की जाये.
   * नए ब्लॉगर  के लिए कुछ आपकी व्यक्तिगत राय ?
   * सिस्टम को समझें.जानकारी या होम  वर्क करें.फिर लिखें.और ऐसा लिखे
जो हिंदुस्तान के विकास में सहायक हो. 

हृदेश आपने इतना व्यस्त होते हुए भी मुझे और परिकल्पना  ब्लॉग उत्सव-२०११ को अपना कीमती समय दिया ... आपका बहुत बहुत धन्यवाद  और आपको बहुत बहुत शुभकामनाएं !

इस इंटरव्‍यू को पढने के लिए आप यहाँ भी जा सकते है ...

बुधवार, 14 सितंबर 2011

सब को हिंदी दिवस की बधाइयाँ और शुभकामनाएं


|| सब को हिंदी दिवस पर बहुत बहुत हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनाएं ||


इस मौके पर एक पुरानी पोस्ट का लिंक दे रहा हूँ जरुर देखें ... 


शनिवार, 10 सितंबर 2011

परमवीर चक्र विजेता हवलदार अब्दुल हामिद के बलिदान दिवस पर विशेष

हवलदार अब्दुल हामिद 
   आज के ही दिन इस परमवीर ने देश के लिए अपना बलिदान दिया था ! इन के बारे और जानकारी के लिए यहाँ देखें !

  सभी मैनपुरी वासियों की ओर से भारत माँ के इस परमवीर लाल को शत शत नमन !

बुधवार, 7 सितंबर 2011

अजीब या रोचक ??

कल  राहुल सिंह जी  के ब्लॉग   पर इसे देख और पढ़ मैं चकरा गया शायद आपका भी यही हाल हो ... पर है यह कमाल ... न माने तो खुद ही अजमा लीजिये ... पर हाँ अपनी राय देना न भूलियेगा !




"i cdnuolt blveiee taht I cluod aulaclty uesdnatnrd waht I was rdanieg. The phaonmneal pweor of the hmuan mnid, aoccdrnig to a rscheearch at Cmabrigde Uinervtisy, it dseno't mtaetr in waht oerdr the ltteres in a wrod are, the olny iproamtnt tihng is taht the frsit and lsat ltteer be in the rghit pclae. The rset can be a taotl mses and you can sitll raed it whotuit a pboerlm. Tihs is bcuseae the huamn mnid deos not raed ervey lteter by istlef, but teh wrod as a wlohe. Azanmig huh? yaeh and I awlyas tghuhot slpeling was ipmorantt! can you raed tihs?"  
 

  हाँ जी ... तो फिर क्या राय है आपकी ...

मंगलवार, 6 सितंबर 2011

इस धर्म ने कहीं का ना छोड़ा ...

हम मर्द बेचारे ... इस धर्मं के मारे ...

 
धर्म भाई मतलब - नोट रियल ब्रदर;
 

 धर्म पिता मतलब - नोट रियल फादर;
 

धर्म बहन मतलब - नोट रियल सिस्टर;
 

फिर क्यों?
 

धर्म पत्नी मतलब - रियल वाइफ !?

रविवार, 4 सितंबर 2011

एक रि पोस्ट :- शिक्षक दिवस पर विशेष - तीन ताकतों को समझने का सबक







यह संयोग भारत में ही संभव हो सकता था कि एक शिक्षक राष्ट्रपति बन जाए और एक राष्ट्रपति शिक्षक। 
बात हो रही है क्रमश: डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन (जिनका जन्मदिन आज शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जा रहा है) और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की, जो राष्ट्रपति पद से मुक्त होने के बाद कई शिक्षण संस्थानों में अतिथि शिक्षक के रूप में सेवा दे रहे है। चलिए , जानते है डॉ. कलाम के स्कूली दिनों और उन शिक्षकों के बारे में, जिन्होंने उन पर प्रभाव डाला -उन्ही की जुबानी |
मेरा जन्म मद्रास राज्य के रामेश्वरम् कस्बे में एक मध्यमवर्गीय तमिल परिवार में हुआ था। मेरे पिता जैनुलाबदीन की कोई बहुत अच्छी औपचारिक शिक्षा नहीं हुई थी और ही वे कोई बहुत धनी व्यक्ति थे। इसके बावजूद वे बुद्धिमान थे और उनमें उदारता की सच्ची भावना थी। मेरी मां, आशियम्मा, उनकी आदर्श जीवनसंगिनी थीं। हम लोग अपने पुश्तैनी घर में रहते थे। रामेश्वरम् की मसजिदवाली गली में बना यह घर पक्का और बड़ा था।
[बहुत बुरा लगा था पीछे बैठना]
बचपन में मेरे तीन पक्के दोस्त थे- रामानंद शास्त्री, अरविंदन और शिवप्रकाशन। जब मैं रामेश्वरम् के प्राइमरी स्कूल में पांचवीं कक्षा में था तब एक नए शिक्षक हमारी कक्षा में आए। मैं टोपी पहना करता था, जो मेरे मुसलमान होने का प्रतीक था। कक्षा में मैं हमेशा आगे की पंक्ति में जनेऊ पहने रामानंद के साथ बैठा करता था। नए शिक्षक को एक हिंदू लड़के का मुसलमान लड़के के साथ बैठना अच्छा नहीं लगा। उन्होंने मुझे पीछे वाली बेंच पर चले जाने को कहा। मुझे बहुत बुरा लगा। रामानंद भी मुझे पीछे की पंक्ति में बैठाए जाते देख काफी उदास नजर आ रहा था। स्कूल की छुट्टी होने पर हम घर गए और सारी घटना अपने घरवालों को बताई। यह सुनकर रामानंद के पिता लक्ष्मण शास्त्री ने उस शिक्षक को बुलाया और कहा कि उसे निर्दोष बच्चों के दिमाग में इस तरह सामाजिक असमानता एवं सांप्रदायिकता का विष नहीं घोलना चाहिए। उस शिक्षक ने अपने किए व्यवहार पर न सिर्फ दु:ख व्यक्त किया, बल्कि लक्ष्मण शास्त्री के कड़े रुख एवं धर्मनिरपेक्षता में उनके विश्वास से उस शिक्षक में अंतत: बदलाव आ गया।
[रसोई के रास्ते टूटी रूढि़यां]
प्राइमरी स्कूल में मेरे विज्ञान शिक्षक शिव सुब्रह्मण्य अय्यर कट्टर ब्राह्मण थे, लेकिन वे कुछ-कुछ रूढि़वाद के खिलाफ हो चले थे। वे मेरे साथ काफी समय बिताते थे और कहा करते, 'कलाम, मैं तुम्हे ऐसा बनाना चाहता हूं कि तुम बड़े शहरों के लोगों के बीच एक उच्च शिक्षित व्यक्ति के रूप में पहचाने जाओगे।' एक दिन उन्होंने मुझे अपने घर खाने पर बुलाया। उनकी पत्नी इस बात से बहुत ही परेशान थीं कि उनकी रसोई में एक मुसलमान को भोजन पर आमंत्रित किया गया है। उन्होंने अपनी रसोई के भीतर मुझे खाना खिलाने से साफ इनकार कर दिया। अय्यर जी अपनी पत्नी के इस रुख से जरा भी विचलित नहीं हुए और न ही उन्हे क्रोध आया। उन्होंने खुद अपने हाथ से मुझे खाना परोसा और बाहर आकर मेरे पास ही अपना खाना लेकर बैठ गए। मै खाना खाने के बाद लौटने लगा तो अय्यर जी ने मुझे फिर अगले हफ्ते रात के खाने पर आने को कहा। मेरी हिचकिचाहट को देखते हुए वे बोले, 'इसमें परेशान होने की जरूरत नहीं है। एक बार जब तुम व्यवस्था बदल डालने का फैसला कर लेते हो तो ऐसी समस्याएं सामने आती ही है।' अगले हफ्ते जब मैं उनके घर रात्रिभोज पर गया तो उनकी पत्नी ही मुझे रसोई में ले गई और खुद अपने हाथों से मुझे खाना परोसा।
[तीन ताकतों को समझने का सबक]
15 साल की उम्र में मेरा दाखिला रामेश्वरम् के जिला मुख्यालय रामनाथपुरम् स्थित श्वा‌र्ट्ज हाई स्कूल में हुआ। मेरे एक शिक्षक अयादुरै सोलोमन बहुत ही स्नेही, खुले दिमागवाले व्यक्ति थे और छात्रों का उत्साह बढ़ाते रहते थे। रामनाथपुरम् में रहते हुए अयादुरै सोलोमन से मेरे संबंध काफी प्रगाढ़ हो गए थे। वे कहा करते थे, 'जीवन में सफल होने और नतीजों को हासिल करने के लिए तुम्हे तीन प्रमुख शक्तिशाली ताकतों को समझना चाहिए- इच्छा, आस्था और उम्मीदें।' उन्होंने ही मुझे सिखाया कि मैं जो कुछ भी चाहता हूं, पहले उसके लिए मुझे तीव्र कामना करनी होगी, फिर निश्चित रूप से मैं उसे पा सकूंगा। वे सभी छात्रों को उनके भीतर छिपी शक्ति एवं योग्यता का आभास कराते थे। वे कहा करते थे- 'निष्ठा एवं विश्वास से तुम अपनी नियति बदल सकते हो।'
[पिटाई के बाद मिली प्रशंसा]
श्वा‌र्ट्ज हाई स्कूल में कक्षाएं अहाते में अलग-अलग झुंडों के रूप में लगा करती थीं। एक दिन मेरे गणित के शिक्षक रामकृष्ण अय्यर किसी दूसरी कक्षा को पढ़ा रहे थे। अनजाने में ही मैं उस कक्षा से होकर निकल गया। तुरंत ही उन्होंने मुझे गरदन से पकड़ा और भरी कक्षा के सामने बेंत लगाए। कई महीनों बाद जब गणित में मेरे पूरे नंबर आए तब रामकृष्ण अय्यर ने स्कूल की सुबह की प्रार्थना में सबके सामने यह घटना सुनाई और कहा, 'मैं जिसकी बेंत से पिटाई करता हूं, वह एक महान् व्यक्ति बनता है। मेरे शब्द याद रखिए, यह छात्र विद्यालय और अपने शिक्षकों का गौरव बनने जा रहा है।' आज मैं सोचता हूं कि उनके द्वारा की गई यह प्रशंसा क्या एक भविष्यवाणी थी?
शिक्षक दिवस पर मैं अपने सभी शिक्षकों
का पुण्य स्मरण करते हुए नमन करता हूँ |
भगवान् उन सब को दीर्घजीवी बनाये  ... ताकि वह सब ज्ञान का
प्रकाश दूर दूर तक पंहुचा सकें |

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