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मंगलवार, 31 जुलाई 2012

३ महान विभूतियों के नाम है आज का दिन

आज ३१ जुलाई है ... आज का दिन हमारे देश की  ३ महान विभूतियों के नाम है ... 

एक है लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक , दुसरे है अमर शहीद उधम सिंह और तीसरे  है मुंशी प्रेमचंद

पेश है ३  पोस्ट के लिंक्स जो आपको इन विभूतियों के बारे में और भी जानकारियां देंगी ! 

सही मायने में लोकमान्य थे बाल गंगाधर तिलक (२३/०७/१८५६ - ०१/०८/१९२०)


जनरल डायर को नहीं , ओडवायर को मारा था ऊधम सिंह ने

और 

होरी को हीरो बनाने वाले रचनाकार :- प्रेमचंद

सभी मैनपुरी वासियों की ओर से इन तीनों महान विभूतियों को शत शत नमन ! 

रविवार, 29 जुलाई 2012

जेआरडी टाटा की १०८ वी जयंती पर विशेष


भारतीय उद्योग जगत के प्रमुख स्तंभ जेआरडी टाटा बहुमुखी प्रतिभा के धनी उद्यमी थे तथा भारतीय कंपनी जगत में उन्हें कार्पोरेट गवर्नेस और सामाजिक दायित्व की परिकल्पनाओं को पहली बार लागू करने वाले उद्योगपति के रूप में जाना जाता है। जेआरडी के नाम से मशहूर जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा ने न केवल टाटा समूह को अपने कुशल नेतृत्व में देश में अग्रणी उद्योग घराने में तब्दील कर दिया बल्कि उन्होंने कर्मचारियों के कल्याण के उद्देश्य से कई ऐसी योजनाएं शुरू की जिन्हें बाद में भारत सरकार ने कानूनी मान्यता देते हुए अपना लिया।
टाटा समूह ने जेआरडी के कुशल नेतृत्व में आठ घंटे का कार्यदिवस, निशुल्क चिकित्सा सहायता, कर्मचारी भविष्य निधि योजना और कामगार दुर्घटना मुआवजा योजना जैसी सामाजिक दायित्व वाली कई योजनाओं को देश में पहली बार शुरू किया।
उद्योग संगठन एसोचैम के महासचिव डी एस रावत के अनुसार जेआरडी टाटा का भारतीय उद्योग जगत में महज इसलिए सम्मान नहीं किया जाता कि उन्होंने टाटा समूह जैसे बड़े उद्योग घराने का कई दशकों तक नेतृत्व किया था, बल्कि भारतीय कंपनी जगत में पहली कार्पोरेट गवर्नेस और सोशल रिस्पांसेबिलिटी की योजनाएं पहली बार शुरू करने के लिए भी याद किया जाता है।
रावत ने कहा कि जेआरडी एक उद्यमी के रूप में भी प्रतिभासंपन्न व्यक्ति थे जिनकी सोच अपने समय से बहुत आगे की थी। उनके इस नजरिए से न केवल टाटा समूह बल्कि भारतीय उद्योग जगत को भी काफी लाभ मिला।
जेआरडी का जन्म 29 जुलाई 1904 को फ्रांस में हुआ। उनके पिता पारसी और मां फ्रांसीसी थीं। जेआरडी के पिता और जमशेदजी टाटा एक ही खानदान के थे। जेआरडी ने फ्रांस , जापान और इंग्लैंड में शिक्षा ग्रहण की और फ्रांसीसी सेना में एक वर्ष का अनिवार्य सैन्य प्रशिक्षण लिया। वह सेना में बने रहना चाहते थे, लेकिन अपने पिता कीच्इच्छा के कारण उन्हें यह काम छोड़ना पड़ा।
उन्होंने वर्ष 1925 में बिना वेतन वाले प्रशिक्षु के रूप में टाटा एंड सन में काम शुरू किया। उनके व्यक्तित्व का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू विमानन था। उन्हें देश का पहला पायलट होने का भी गौरव प्राप्त है। उन्होंने टाटा एयरलाइंस बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जो बाद में एयर इंडिया बनी। उन्होंने विमान उड़ाने के शौक को 1932 में टाटा एविएशन सर्विस कायम कर पूरा किया।
उन्होंने 1948 में एयर इंडिया इंटरनेशनल की भारत की पहली अंतरराष्ट्रीय एयरलाइन की शुरूआत की। 1953 में भारत सरकार ने जेआरडी को एयर इंडिया का अध्यक्ष बनाया तथा वह 25 साल तक इंडियन एयरलाइंस के निदेशक मंडल के सदस्य रहे।
महज 34 वर्ष की उम्र में जेआरडी टाटा एंड संस के अध्यक्ष चुने गए। उनके नेतृत्व में समूह ने 14 उद्यम शुरू किए और 26 जुलाई 1988 को जब वह इस जिम्मेदारी से मुक्त हुए तो टाटा समूह 95 उद्यमों का गठजोड़ बन चुका था।
कर्मचारियों के हितों का बेहद ध्यान रखने वाले जेआरडी के नेतृत्व में टाटा स्टील ने एक नई परिकल्पना शुरू की। इसके तहत कंपनी का कर्मचारी जैसे ही काम के लिए अपने घर से निकलता है, उसे कामगार मान लिया जाता। यदि कार्यस्थल आते जाते समय कामगार के साथ कोई दुर्घटना होती है तो कंपनी इसके लिए वित्तीय रूप से जिम्मेदार होगी।
जेआरडी को विभिन्न पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। भारत सरकार ने उन्हें 1957 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया। बाद में 1992 में उन्हें देश के सर्चेच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
भारत के इस विख्यात उद्योगपति का 29 नवंबर 1993 को जिनेवा के एक अस्पताल में निधन हो गया।
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समस्त मैनपुरी वासीयों की ओर से भारत माता के इस होनहार रत्न को शत शत नमन |

गुरुवार, 26 जुलाई 2012

कारगिल विजय दिवस 2012 - बस इतना याद रहे ... एक साथी और भी था ...



खामोश है जो यह वो सदा है, वो जो नहीं है वो कह रहा है ,
साथी यु तुम को मिले जीत ही जीत सदा |
बस इतना याद रहे ........ एक साथी और भी था ||


जाओ जो लौट के तुम, घर हो खुशी से भरा,
बस इतना याद रहे ........ एक साथी और भी था ||


कल पर्वतो पे कही बरसी थी जब गोलियां ,
हम लोग थे साथ में और हौसले थे जवां |
अब तक चट्टानों पे है अपने लहू के निशां ,
साथी मुबारक तुम्हे यह जश्न हो जीत का ,
बस इतना याद रहे ........ एक साथी और भी था ||


कल तुम से बिछडी हुयी ममता जो फ़िर से मिले ,
कल फूल चहेरा कोई जब मिल के तुम से खिले ,
पाओ तुम इतनी खुशी , मिट जाए सारे गिले,
है प्यार जिन से तुम्हे , साथ रहे वो सदा ,
बस इतना याद रहे ........ एक साथी और भी था ||

जब अमन की बासुरी गूजे गगन के तले,
जब दोस्ती का दिया इन सरहद पे जले ,
जब भूल के दुश्मनी लग जाए कोई गले ,
जब सारे इंसानों का एक ही हो काफिला ,
बस इतना याद रहे ........ एक साथी और भी था ||

बस इतना याद रहे ........ एक साथी और भी था ||


- जावेद अख्तर 


सभी मैनपुरी वासीयों की ओर से कारगिल युद्ध के सभी अमर शहीदों को शत शत नमन !

सोमवार, 23 जुलाई 2012

कर्नल डा॰ लक्ष्मी सहगल का निधन

लक्ष्मी सहगल (जन्म: 24 अक्टूबर, 1914 - निधन : 23 जुलाई , 2012 ) भारत की स्वतंत्रता संग्राम की सेनानी थी। वे आजाद हिन्द फौज की अधिकारी तथा 'आजाद हिन्द सरकार' में महिला मामलों की मंत्री थीं। वे व्यवसाय से डॉक्टर थी जो द्वितीय विश्वयुद्ध के समय प्रकाश में आयीं। वे आजाद हिन्द फौज की 'रानी लक्ष्मी रेजिमेन्ट' की कमाण्डर थीं।

परिचय

डॉक्टर लक्ष्मी सहगल का जन्म 1914 में एक परंपरावादी तमिल परिवार में हुआ और उन्होंने मद्रास मेडिकल कॉलेज से मेडिकल की शिक्षा ली, फिर वे सिंगापुर चली गईं। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जब जापानी सेना ने सिंगापुर में ब्रिटिश सेना पर हमला किया तो लक्ष्मी सहगल सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद फ़ौज में शामिल हो गईं थीं।
वे बचपन से ही राष्ट्रवादी आंदोलन से प्रभावित हो गई थीं और जब महात्मा गाँधी ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का आंदोलन छेड़ा तो लक्ष्मी सहगल ने उसमे हिस्सा लिया। वे 1943 में अस्थायी आज़ाद हिंद सरकार की कैबिनेट में पहली महिला सदस्य बनीं। एक डॉक्टर की हैसियत से वे सिंगापुर गईं थीं लेकिन 87 वर्ष की उम्र में वे अब भी कानपुर के अपने घर में बीमारों का इलाज करती हैं।
आज़ाद हिंद फ़ौज की रानी झाँसी रेजिमेंट में लक्ष्मी सहगल बहुत सक्रिय रहीं। बाद में उन्हें कर्नल का ओहदा दिया गया लेकिन लोगों ने उन्हें कैप्टन लक्ष्मी के रूप में ही याद रखा।

संघर्ष

आज़ाद हिंद फ़ौज की हार के बाद ब्रिटिश सेनाओं ने स्वतंत्रता सैनिकों की धरपकड़ की और 4 मार्च 1946 को वे पकड़ी गईं पर बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया। लक्ष्मी सहगल ने 1947 में कर्नल प्रेम कुमार सहगल से विवाह किया और कानपुर आकर बस गईं। लेकिन उनका संघर्ष ख़त्म नहीं हुआ और वे वंचितों की सेवा में लग गईं। वे भारत विभाजन को कभी स्वीकार नहीं कर पाईं और अमीरों और ग़रीबों के बीच बढ़ती खाई का हमेशा विरोध करती रही ।

वामपंथी राजनीति

यह एक विडंबना ही है कि जिन वामपंथी पार्टियों ने द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान का साथ देने के लिए सुभाष चंद्र बोस की आलोचना की, उन्होंने ही लक्ष्मी सहगल को भारत के राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाया। लेकिन वामपंथी राजनीति की ओर लक्ष्मी सहगल का झुकाव 1971 के बाद से बढ़ने लगा था। वे अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की संस्थापक सदस्यों में से थी ।

सम्मान

भारत सरकार ने उन्हें 1998 में पद्मविभूषण से सम्मानित किया। डॉक्टर लक्ष्मी सहगल की बेटी सुभाषिनी अली 1989 में कानपुर से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की सांसद भी रहीं।

ज्ञात हो आजाद हिंद फौज की महिला इकाई रानी झाँसी रेजीमेंट की पहली कैप्टन रहीं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी लक्ष्मी सहगल की हालत गुरुवार रात दिल का दौरा पड़ने के बाद से गंभीर बनी हुई थी !

कानपुर मे डॉ. संतोष कुमार की अगुवाई में अस्पताल के चिकित्सकों की एक टीम कैप्टन सहगल की हालत की निगरानी कर रही थी चिकित्सकों का कहना था कि उनका दिल सामान्य ढंग से कार्य नहीं कर पा रहा था ।

आज सुबह ११ :२० पर उन्होने अपनी आखरी सांस ली ... कैप्टन सहगल ने चूंकि अपना देह दान किया हुआ था तो ऐसे मे कल उनका पार्थिव शरीर मेडिकल कॉलेज को दे दिया जाएगा !
स्व॰ कर्नल डा॰ लक्ष्मी सहगल जी को हम सभी की ओर से हार्दिक श्रद्धांजलि और शत शत नमन !
जय हिंद !!

रविवार, 22 जुलाई 2012

७०० वी पोस्ट - पण्डित चन्द्रशेखर 'आजाद' की १०६ वी जयंती पर विशेष

पण्डित चन्द्रशेखर 'आजाद' (२३ जुलाई, १९०६ - २७ फरवरी, १९३१) ऐतिहासिक दृष्टि से भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के अत्यन्त सम्मानित और लोकप्रिय स्वतंत्रता सेनानी थे। वे पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल व सरदार भगत सिंह सरीखे महान क्रान्तिकारियों के अनन्यतम साथियों में से थे। सन् १९२२ में गाँधीजी द्वारा असहयोग आन्दोलन को अचानक बन्द कर देने के कारण उनकी विचारधारा में बदलाव आया और वे क्रान्तिकारी गतिविधियों से जुड़ कर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसियेशन के सक्रिय सदस्य बन गये। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में पहले ९ अगस्त १९२५ को काकोरी काण्ड किया और फरार हो गये। इसके पश्चात् सन् १९२७ में 'बिस्मिल' के साथ ४ प्रमुख साथियों के बलिदान के बाद उन्होंने उत्तर भारत की सभी क्रान्तिकारी पार्टियों को मिलाकर एक करते हुए हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसियेशन का गठन किया तथा भगत सिंह के साथ लाहौर में लाला लाजपत राय की मौत का बदला सॉण्डर्स का वध करके लिया एवम् दिल्ली पहुँच कर असेम्बली बम काण्ड को अंजाम दिया।
 

जन्म तथा प्रारम्भिक जीवन


पण्डित चन्द्रशेखर आजाद का जन्म उत्तर प्रदेश में उन्नाव जिले के बदरका गाँव में २३ जुलाई सन् १९०६ को हुआ था। आजाद के पिता पण्डित सीताराम तिवारी संवत् १९५६ में अकाल के समय अपने पैतृक निवास बदरका को छोडकर पहले कुछ दिनों मध्य प्रदेश अलीराजपुर रियासत में नौकरी करते रहे फिर जाकर भावरा गाँव में बस गये। यहीं बालक चन्द्रशेखर का बचपन बीता। उनकी माँ का नाम जगरानी देवी था। आजाद का प्रारम्भिक जीवन आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में स्थित भावरा गाँव में बीता अतएव बचपन में आजाद ने भील बालकों के साथ खूब धनुष बाण चलाये। इस प्रकार उन्होंने निशानेबाजी बचपन में ही सीख ली थी । बालक चन्द्रशेखर आज़ाद का मन अब देश को आज़ाद कराने के अहिंसात्मक उपायों से हटकर सशस्त्र क्रान्ति की ओर मुड़ गया। उस समय बनारस क्रान्तिकारियों का गढ़ था। वह मन्मथनाथ गुप्त और प्रणवेश चटर्जी के सम्पर्क में आये और क्रान्तिकारी दल के सदस्य बन गये। क्रान्तिकारियों का वह दल "हिन्दुस्तान प्रजातन्त्र संघ" के नाम से जाना जाता था।

संस्कारों की धरोहर

चन्द्रशेखर आज़ाद ने अपने स्वभाव के बहुत से गुण अपने पिता पं० सीताराम तिवारी से प्राप्त किये। तिवारी जी साहसी, स्वाभिमानी, हठी और वचन के पक्के थे। वे न दूसरों पर जुल्म कर सकते थे और न स्वयं जुल्म सहन कर सकते थे। भाँवरा में उन्हें एक सरकारी बगीचे में चौकीदारी का काम मिला हुआ था। भूखे भले ही बैठे रहें पर बगीचे से एक भी फल तोड़कर न तो स्वयं खाते थे और न ही किसी और को खाने देते थे। एक बार तहसीलदार ने बगीचे से फल तुड़वाना चाहे तो तिवारी जी बिना पैसे दिये फल तुड़वाने पर तहसीलदार से झगड़ा करने को तैयार हो गये। इसी जिद में उन्होंने वह नौकरी भी छोड़ दी। एक बार तिवारी जी की पत्नी पडोसी के यहाँ से नमक माँग लायीं इस पर तिवारी जी ने उन्हें बहुत डाँटा और इसकी सामूहिक सजा स्वरूप चार दिन तक परिवार में सबने बिना नमक के भोजन किया। ईमानदारी और स्वाभिमान के ये गुण बालक चन्द्रशेखर ने अपने पिता से विरासत में सीखे थे।

पहली रोमांचकारी घटना

१९१९ में हुए अमृतसर के जलियांवाला बाग नरसंहार ने देश के नवयुवकों को उद्वेलित कर दिया। चन्द्रशेखर उस समय पढाई कर रहे थे। तभी से उनके मन में एक आग धधक रही थी। जब गांधीजी ने सन् १९२१ में असहयोग आन्दोलन का फरमान जारी किया तो वह आग ज्वालामुखी बनकर फट पडी और तमाम अन्य छात्रों की भाँति चन्द्रशेखर भी सडकों पर उतर आये। अपने विद्यालय के छात्रों के जत्थे के साथ इस आन्दोलन में भाग लेने पर वे पहली बार गिरफ़्तार हुए और उन्हें १५ बेतों की सज़ा मिली। इस घटना का उल्लेख पं० जवाहरलाल नेहरू ने कायदा तोडने वाले एक छोटे से लडके की कहानी के रूप में किया है-
"ऐसे ही कायदे (कानून) तोडने के लिये एक छोटे से लडके को, जिसकी उम्र १५ या १६ साल की थी और जो अपने को आज़ाद कहता था, बेंत की सजा दी गयी। वह नंगा किया गया और बेंत की टिकटी से बाँध दिया गया। जैसे-जैसे बेंत उस पर पडते थे और उसकी चमडी उधेड डालते थे, वह 'भारत माता की जय!' चिल्लाता था। हर बेंत के साथ वह लडका तब तक यही नारा लगाता रहा, जब तक वह बेहोश न हो गया। बाद में वही लडका उत्तर भारत के आतंककारी कार्यों के दल का एक बडा नेता बना।"
पं० जवाहरलाल नेहरू

क्रान्तिकारी संगठन

असहयोग आन्दोलन के दौरान जब फरवरी १९२२ में चौरी चौरा की घटना के पश्चात् बिना किसे से पूछे गाँधीजी ने आन्दोलन वापस ले लिया तो देश के तमाम नवयुवकों की तरह आज़ाद का भी कांग्रेस से मोह भंग हो गया और पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल,शचीन्द्रनाथ सान्याल योगेशचन्द्र चटर्जी ने १९२४ में उत्तर भारत के क्रान्तिकारियों को लेकर एक दल हिन्दुस्तानी प्रजातान्त्रिक संघ (एच० आर० ए०) का गठन किया। चन्द्रशेखर आज़ाद भी इस दल में शामिल हो गये। इस संगठन ने जब गाँव के अमीर घरों में डकैतियाँ डालीं, ताकि दल के लिए धन जुटाने की व्यवस्था हो सके तो यह तय किया गया कि किसी भी औरत के उपर हाथ नहीं उठाया जाएगा। एक गाँव में राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में डाली गई डकैती में जब एक औरत ने आज़ाद का पिस्तौल छीन लिया तो अपने बलशाली शरीर के बावजूद आज़ाद ने अपने उसूलों के कारण उस पर हाथ नहीं उठाया। इस डकैती में क्रान्तिकारी दल के आठ सदस्यों पर, जिसमें आज़ाद और बिस्मिल भी शामिल थे, पूरे गाँव ने हमला कर दिया। बिस्मिल ने मकान के अन्दर घुसकर उस औरत के कसकर चाँटा मारा, पिस्तौल वापस छीनी और आजाद को डाँटते हुए खींचकर बाहर लाये। इसके बाद दल ने केवल सरकारी प्रतिष्ठानों को ही लूटने का फैसला किया। १ जनवरी १९२५ को दल ने समूचे हिन्दुस्तान में अपना बहुचर्चित पर्चा द रिवोल्यूशनरी (क्रान्तिकारी) बाँटा जिसमें दल की नीतियों का खुलासा किया गया था। इस पैम्फलेट में सशस्त्र क्रान्ति की चर्चा की गयी थी। इश्तहार के लेखक के रूप में "विजयसिंह" का छद्म नाम दिया गया था। शचींद्रनाथ सान्याल इस पर्चे को बंगाल में पोस्ट करने जा रहे थे तभी पुलिस ने उन्हें बाँकुरा में गिरफ्तार करके जेल भेज दिया। "एच० आर० ए०" के गठन के अवसर से ही इन तीनों प्रमुख नेताओं - बिस्मिल, सान्याल और चटर्जी में इस संगठन के उद्देश्यों को लेकर मतभेद था।
इस संघ की नीतियों के अनुसार ९ अगस्त १९२५ को काकोरी काण्ड को अंजाम दिया गया । जब शाहजहाँपुर में इस योजना के बारे में चर्चा करने के लिये मीटिंग बुलायी गयी तो दल के एक मात्र सदस्य अशफाक उल्ला खाँ ने इसका विरोध किया था। उनका तर्क था कि इससे प्रशासन उनके दल को जड़ से उखाड़ने पर तुल जायेगा और ऐसा ही हुआ भी। अंग्रेज़ चन्द्रशेखर आज़ाद को तो पकड़ नहीं सके पर अन्य सर्वोच्च कार्यकर्ताओँ - पण्डित राम प्रसाद 'बिस्मिल', अशफाक उल्ला खाँ एवं ठाकुर रोशन सिंह को १९ दिसम्बर १९२७ तथा उससे २ दिन पूर्व राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को १७ दिसम्बर १९२७ को फाँसी पर लटकाकर मार दिया गया । सभी प्रमुख कार्यकर्ताओं के पकडे जाने से इस मुकदमे के दौरान दल पाय: निष्क्रिय ही रहा। एकाध बार बिस्मिल तथा योगेश चटर्जी आदि क्रान्तिकारियों को छुड़ाने की योजना भी बनी जिसमें आज़ाद के अलावा भगत सिंह भी शामिल थे लेकिन किसी कारण वश यह योजना पूरी न हो सकी।
४ क्रान्तिकारियों को फाँसी और १६ को कड़ी कैद की सजा के बाद चन्द्रशेखर आज़ाद ने उत्तर भारत के सभी कान्तिकारियों को एकत्र कर ८ सितम्बर १९२८ को दिल्ली के फीरोज शाह कोटला मैदान में एक गुप्त सभा का आयोजन किया। इसी सभा में भगत सिंह को दल का प्रचार-प्रमुख बनाया गया। इसी सभा में यह भी तय किया गया कि सभी क्रान्तिकारी दलों को अपने-अपने उद्देश्य इस नयी पार्टी में विलय कर लेने चाहिये। पर्याप्त विचार-विमर्श के पश्चात् एकमत से समाजवाद को दल के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल घोषित करते हुए "हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसियेशन" का नाम बदलकर "हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन" रखा गया। चन्द्रशेखर आज़ाद ने सेना-प्रमुख (कमाण्डर-इन-चीफ) का दायित्व सम्हाला। इस दल के गठन के पश्चात् एक नया लक्ष्य निर्धारित किया गया - "हमारी लड़ाई आखिरी फैसला होने तक जारी रहेगी और वह फैसला है जीत या मौत।"

चरम सक्रियता

आज़ाद के प्रशंसकों में पण्डित मोतीलाल नेहरू, पुरुषोत्तमदास टंडन का नाम शुमार था। जवाहरलाल नेहरू से आज़ाद की भेंट आनन्द भवन में हुई थी उसका ज़िक्र नेहरू ने अपनी आत्मकथा में 'फासीवादी मनोवृत्ति' के रूप में किया है। इसकी कठोर आलोचना मन्मथनाथ गुप्त ने अपने लेखन में की है। कुछ लोगों का ऐसा भी कहना है कि नेहरू ने आज़ाद को दल के सदस्यों को समाजवाद के प्रशिक्षण हेतु रूस भेजने के लिये एक हजार रुपये दिये थे जिनमें से ४४८ रूपये आज़ाद की शहादत के वक़्त उनके वस्त्रों में मिले थे। सम्भवतः सुरेन्द्रनाथ पाण्डेय तथा यशपाल का रूस जाना तय हुआ था पर १९२८-३१ के बीच शहादत का ऐसा सिलसिला चला कि दल लगभग बिखर सा गया। जबकि यह बात सच नहीं है। चन्द्रशेखर आज़ाद की इच्छा के विरुद्ध जब भगत सिंह एसेम्बली में बम फेंकने गये तो आज़ाद पर दल की पूरी जिम्मेवारी आ गयी। साण्डर्स वध में भी उन्होंने भगत सिंह का साथ दिया और बाद में उन्हें छुड़ाने की पूरी कोशिश भी की । आज़ाद की सलाह के खिलाफ जाकर यशपाल ने २३ दिसम्बर १९२९ को दिल्ली के नज़दीक वायसराय की गाड़ी पर बम फेंका तो इससे आज़ाद क्षुब्ध थे क्योंकि इसमें वायसराय तो बच गया था पर कुछ और कर्मचारी मारे गए थे। आज़ाद को २८ मई १९३० को भगवती चरण वोहरा की बम-परीक्षण में हुई शहादत से भी गहरा आघात लगा था । इसके कारण भगत सिंह को जेल से छुड़ाने की योजना भी खटाई में पड़ गयी थी। भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु की फाँसी रुकवाने के लिए आज़ाद ने दुर्गा भाभी को गांधीजी के पास भेजा जहाँ से उन्हें कोरा जवाब दे दिया गया था। आज़ाद ने अपने बलबूते पर झाँसी और कानपुर में अपने अड्डे बना लिये थे । झाँसी में मास्टर रुद्र नारायण, सदाशिव मलकापुरकर, भगवानदास माहौर तथा विश्वनाथ वैशम्पायन थे जबकि कानपुर में पण्डित शालिग्राम शुक्ल सक्रिय थे। शालिग्राम शुक्ल को १ दिसम्बर १९३० को पुलिस ने आज़ाद से एक पार्क में मिलने जाते वक्त शहीद कर दिया था।

व्यक्तिगत जीवन

आजाद प्रखर देशभक्त थे। काकोरी काण्ड में फरार होने के बाद से ही उन्होंने छिपने के लिए साधु का वेश बनाना बखूबी सीख लिया था और इसका उपयोग उन्होंने कई बार किया। एक बार वे दल के लिये धन जुटाने हेतु गाज़ीपुर के एक मरणासन्न साधु के पास चेला बनकर भी रहे ताकि उसके मरने के बाद मठ की सम्पत्ति उनके हाथ लग जाये। परन्तु वहाँ जाकर जब उन्हें पता चला कि साधु उनके पहुँचने के पश्चात् मरणासन्न नहीं रहा अपितु और अधिक हट्टा-कट्टा होने लगा तो वे वापस आ गये। प्राय: सभी क्रान्तिकारी उन दिनों रूस की क्रान्तिकारी कहानियों से अत्यधिक प्रभावित थे आजाद भी थे लेकिन वे खुद पढ़ने के बजाय दूसरों से सुनने में ज्यादा आनन्दित होते थे। एक बार दल के गठन के लिये बम्बई गये तो वहाँ उन्होंने कई फिल्में भी देखीं। उस समय मूक फिल्मों का ही प्रचलन था अत: वे फिल्मो के प्रति विशेष आकर्षित नहीं हुए। एक बा‍र आजाद कानपुर के मशहूर व्यवसायी सेठ प्यारेलाल के निवास पर एक समारोह में आये हुये थे । प्यारेलाल प्रखर देशभक्त थे और प्राय: क्रातिकारियों की आथि॑क मदद भी किया क‍रते थे। आजाद और सेठ जी बातें कर ही रहे थे तभी सूचना मिली कि पुलिस ने हवेली को घेर लिया है। प्यारेलाल घबरा गये फिर भी उन्होंने आजाद से कहा कि वे अपनी जान दे देंगे पर उनको कुछ नहीं होने देंगे। आजाद हँसते हुए बोले-"आप चिंन्ता न करें, मैं कानपुर के लोगों को मिठाई खिलाये बिना जाने वाला नहीं।" फिर वे सेठानी से बोले- "आओ भाभी जी! बाह‍र चलकर मिठाई बाँट आयें।" आजाद ने गमछा सिर पर बाँधा, मिठाई का टो़करा उठाया और सेठानी के साथ चल दिये। दोनों मिठाई बाँटते हुए हवेली से बाहर आ गये। बाहर खडी पुलिस को भी मिठाई खिलायी। पुलिस की आँखों के सामने से आजाद मिठाई-वाला बनकर निकल गये और पुलिस सोच भी नही पायी कि जिसे पकडने आयी थी वह परिन्दा तो कब का उड चुका है। ऐसे थे आजाद!
चन्द्रशेखर आज़ाद हमेशा सत्य बोलते थे। एक बार की घटना है आजाद पुलिस से छिपकर जंगल में साधु के भेष में रह रहे थे तभी वहाँ एक दिन पुलिस आ गयी। दैवयोग से पुलिस उन्हीं के पास पहुँच भी गयी। पुलिस ने साधु वेश धारी आजाद से पूछा-"बाबा!आपने आजाद को देखा है क्या?" साधु भेषधारी आजाद तपाक से बोले- "बच्चा आजाद को क्या देखना, हम तो हमेशा आजाद रहते‌ हें हम भी तो आजाद हैं।" पुलिस समझी बाबा सच बोल रहा है, वह शायद गलत जगह आ गयी है अत: हाथ जोडकर माफी माँगी और उलटे पैरों वापस लौट गयी।
चन्द्रशेखर आज़ाद ने वीरता की नई परिभाषा लिखी थी। उनके बलिदान के बाद उनके द्वारा प्रारम्भ किया गया आन्दोलन और तेज हो गया, उनसे प्रेरणा लेकर हजारों युवक स्‍वतन्त्रता आन्दोलन में कूद पड़े। आजाद की शहादत के सोलह वर्षों बाद १५ अगस्त सन् १९४७ को हिन्दुस्तान की आजादी का उनका सपना पूरा तो हुआ किन्तु वे उसे जीते जी देख न सके। आजाद अपने दल के सभी क्रान्तिकारियों में बड़े आदर की दृष्टि से देखे जाते थे। सभी उन्हें पण्डितजी ही कहकर सम्बोधित किया करते थे। वे सच्चे अर्थों में पण्डित राम प्रसाद 'बिस्मिल' के वास्तविक उत्तराधिकारी जो थे।

शहादत

एच०एस०आर०ए० द्वारा किये गये साण्डर्स-वध और दिल्ली एसेम्बली बम काण्ड में फाँसी की सजा पाये तीन अभियुक्तों- भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव ने अपील करने से साफ मना कर ही दिया था। अन्य सजायाफ्ता अभियुक्तों में से सिर्फ ३ ने ही प्रिवी कौन्सिल में अपील की। ११ फरवरी १९३१ को लन्दन की प्रिवी कौन्सिल में अपील की सुनवाई हुई। इन अभियुक्तों की ओर से एडवोकेट प्रिन्ट ने बहस की अनुमति माँगी थी किन्तु उन्हें अनुमति नहीं मिली और बहस सुने बिना ही अपील खारिज कर दी गयी। चन्द्रशेखर आज़ाद ने मृत्यु दण्ड पाये तीनों प्रमुख क्रान्तिकारियों की सजा कम कराने का काफी प्रयास किया। वे उत्तर प्रदेश की सीतापुर जेल में जाकर गणेशशंकर विद्यार्थी से मिले। विद्यार्थी से परामर्श कर वे इलाहाबाद गये और जवाहरलाल नेहरू से उनके निवास आनन्द भवन में भेंट की। आजाद ने पण्डित नेहरू से यह आग्रह किया कि वे गांधी जी पर लॉर्ड इरविन से इन तीनों की फाँसी को उम्र- कैद में बदलवाने के लिये जोर डालें। नेहरू जी ने जब आजाद की बात नहीं मानी तो आजाद ने उनसे काफी देर तक बहस भी की। इस पर नेहरू जी ने क्रोधित होकर आजाद को तत्काल वहाँ से चले जाने को कहा तो वे अपने तकियाकलाम 'स्साला' के साथ भुनभुनाते हुए ड्राइँग रूम से बाहर आये और अपनी साइकिल पर बैठकर अल्फ्रेड पार्क की ओर चले गये। अल्फ्रेड पार्क में अपने एक मित्र सुखदेव राज से मन्त्रणा कर ही रहे थे तभी सी०आई०डी० का एस०एस०पी० नॉट बाबर जीप से वहाँ आ पहुँचा। उसके पीछे-पीछे भारी संख्या में कर्नलगंज थाने से पुलिस भी आ गयी। दोनों ओर से हुई भयंकर गोलीबारी में आजाद को वीरगति प्राप्त हुई। यह दुखद घटना २७ फरवरी १९३१ के दिन घटित हुई और हमेशा के लिये इतिहास में दर्ज हो गयी।
आजाद की ३२ बोर की कोल्ट पिस्तौल जो इलाहाबाद के आजाद म्यूजियम में रखी हुई है।
पुलिस ने बिना किसी को इसकी सूचना दिये चन्द्रशेखर आज़ाद का अन्तिम संस्कार कर दिया था। जैसे ही आजाद की शहादत की खबर जनता को लगी सारा इलाहाबाद अलफ्रेड पार्क में उमड पडा। जिस वृक्ष के नीचे आजाद शहीद हुए थे लोग उस वृक्ष की पूजा करने लगे। वृक्ष के तने के इर्द-गिर्द झण्डियाँ बाँध दी गयीं। लोग उस स्थान की माटी को कपडों में शीशियों में भरकर ले जाने लगे। समूचे शहर में आजाद की शहादत की खबर से जब‍रदस्त तनाव हो गया। शाम होते-होते सरकारी प्रतिष्ठानों प‍र हमले होने लगे। लोग सडकों पर आ गये।
आज़ाद के शहादत की खबर जवाहरलाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू को मिली तो उन्होंने तमाम काँग्रेसी नेताओं व अन्य देशभक्तों को इसकी सूचना दी। । बाद में शाम के वक्त लोगों का हुजूम पुरुषोत्तम दास टंडन के नेतृत्व में इलाहाबाद के रसूलाबाद शमशान घाट पर कमला नेहरू को साथ लेकर पहुँचा। अगले दिन आजाद की अस्थियाँ चुनकर युवकों का एक जुलूस निकाला गया। इस जुलूस में इतनी ज्यादा भीड थी कि इलाहाबाद की मुख्य सडकों पर जाम लग गया। ऐसा लग रहा था जैसे इलाहाबाद की जनता के रूप में सारा हिन्दुस्तान अपने इस सपूत को अंतिम विदाई देने उमड पडा हो। जुलूस के बाद सभा हुई। सभा को शचीन्द्रनाथ सान्याल की पत्नी प्रतिभा सान्याल ने सम्बोधित करते हुए कहा कि जैसे बंगाल में खुदीराम बोस की शहादत के बाद उनकी राख को लोगों ने घर में रखकर सम्मानित किया वैसे ही आज़ाद को भी सम्मान मिलेगा। सभा को कमला नेहरू तथा पुरुषोत्तम दास टंडन ने भी सम्बोधित किया। इससे कुछ ही दिन पूर्व ६ फरवरी १९२७ को पण्डित मोतीलाल नेहरू के देहान्त के बाद आज़ाद भेष बदलकर उनकी शवयात्रा में शामिल हुए थे पर उन्हें क्या पता था कि इलाहाबाद की इसी धरा पर कुछ दिनों बाद उनका भी बलिदान होगा!
 (साभार - विकिपीडिया)

 अमर शहीद चन्द्रशेखर 'आजाद' जी को सभी मैनपुरी वासीयों की ओर से शत शत नमन ! 

इंकलाब ज़िंदाबाद ...

वंदे मातरम ||

शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

अमर क्रांतिकारी स्व॰ श्री बटुकेश्वर दत्त जी की ४७ वी पुण्य तिथि पर विशेष


बटुकेश्वर दत्त का जन्म 18 नवम्बर, 1910 को बंगाली कायस्थ परिवार में ग्राम-औरी, जिला-नानी बेदवान (बंगाल) में हुआ था। इनका बचपन अपने जन्म स्थान के अतिरिक्त बंगाल प्रांत के वर्धमान जिला अंतर्गत खण्डा और मौसु में बीता। इनकी स्नातक स्तरीय शिक्षा पी.पी.एन. कॉलेज कानपुर में सम्पन्न हुई। 1924 में कानपुर में इनकी भगत सिंह से भेंट हुई। इसके बाद इन्होंने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के लिए कानपुर में कार्य करना प्रारंभ किया। इसी क्रम में बम बनाना भी सीखा।

8 अप्रैल, 1929 को दिल्ली स्थित केंद्रीय विधानसभा (वर्तमान का संसद भवन) में भगत सिंह के साथ बम विस्फोट कर ब्रिटिश राज्य की तानाशाही का विरोध किया। बम विस्फोट बिना किसी को नुकसान पहुंचाए सिर्फ पचांर्े के माध्यम से अपनी बात को प्रचारित करने के लिए किया गया था। उस दिन भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों को दबाने के लिए ब्रिटिश सरकार की ओर से पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट बिल लाया गया था, जो इन लोगों के विरोध के कारण एक वोट से पारित नहीं हो पाया।

इस घटना के बाद बटुकेश्वर दत्त और भगत सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया। 12 जून, 1929 को इन दोनों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। सजा सुनाने के बाद इन लोगों को लाहौर फोर्ट जेल में डाल दिया गया। यहां पर भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त पर लाहौर षड़यंत्र केस चलाया गया। उल्लेखनीय है कि साइमन कमीशन के विरोध-प्रदर्शन करते हुए लाहौर में लाला लाजपत राय को अंग्रेजों के इशारे पर अंग्रेजी राज के सिपाहियों द्वारा इतना पीटा गया कि उनकी मृत्यु हो गई। इस मृत्यु का बदला अंग्रेजी राज के जिम्मेदार पुलिस अधिकारी को मारकर चुकाने का निर्णय क्रांतिकारियों द्वारा लिया गया था। इस कार्रवाई के परिणामस्वरूप लाहौर षड़यंत्र केस चला, जिसमें भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सजा दी गई थी। बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास काटने के लिए काला पानी जेल भेज दिया गया। जेल में ही उन्होंने 1933 और 1937 में ऐतिहासिक भूख हड़ताल की। सेल्यूलर जेल से 1937 में बांकीपुर केन्द्रीय कारागार, पटना में लाए गए और 1938 में रिहा कर दिए गए। काला पानी से गंभीर बीमारी लेकर लौटे दत्त फिर गिरफ्तार कर लिए गए और चार वर्षों के बाद 1945 में रिहा किए गए।

आजादी के बाद नवम्बर, 1947 में अंजली दत्त से शादी करने के बाद वे पटना में रहने लगे। बटुकेश्वर दत्त को अपना सदस्य बनाने का गौरव बिहार विधान परिषद ने 1963 में प्राप्त किया। श्री दत्त की मृत्यु 20 जुलाई, 1965 को नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में हुई। मृत्यु के बाद इनका दाह संस्कार इनके अन्य क्रांतिकारी साथियों-भगत सिंह, राजगुरु एवं सुखदेव की समाधि स्थल पंजाब के हुसैनी वाला में किया गया। इनकी एक पुत्री भारती बागची पटना में रहती हैं। बटुकेश्वर दत्त के विधान परिषद में सहयोगी रहे इन्द्र कुमार कहते हैं कि 'स्व. दत्त राजनैतिक महत्वाकांक्षा से दूर शांतचित एवं देश की खुशहाली के लिए हमेशा चिन्तित रहने वाले क्रांतिकारी थे।' मातृभूमि के लिए इस तरह का जज्बा रखने वाले नौजवानों का इतिहास भारतवर्ष के अलावा किसी अन्य देश के इतिहास में उपलब्ध नहीं है।
आज इन की 47 वी पुण्य तिथि पर हम सब भारत माता के इस वीर लाल , अमर क्रांतिकारी स्व॰ श्री बटुकेश्वर दत्त जी शत शत नमन करते है |

इंकलाब ज़िंदाबाद ...

वंदे मातरम ||

बुधवार, 18 जुलाई 2012

मुझसे ये आसू नहीं देखे जाते, आई हेट टीयर्स ... राजेश खन्ना

राजेश खन्ना (29 December 1942 - 18 July 2012)
"  बाबू मोशाय, हम सब तो रंगमंच की कठपुतलिया हैं ... जिसकी डोर उस ऊपर वाले के हाथों में है जहाँपनाह , कब कौन कहाँ कैसे उठेगा ये कोई नहीं जानता ... हा हा हा ... बाबू मोशाय जिंदगी और मौत उस ऊपरवाले के हाथ में है उसे ना आप बदल सकते हैं ना हम "  

अपने बाबू मोशाए को जाते जाते भी यह सीख दे कर जाने वाला 'आनंद' आज सच मे चला गया ... फिर कभी भी लौट कर न आने के लिए ... और कमाल की बात यह कि हम रो भी नहीं सकते ... हमारे रोते ही फिर नाराजगी भरी आवाज़ सुनाई देगी ... "पुष्पा, मुझसे ये आसू नहीं देखे जाते, आई हेट टीयर्स ..." साथ साथ अपना दर्द भी वो बयां कर देगा ... " ये तो मै ही जानता हूं कि जिंदगी के आखिरी मोड़ पर कितना अंधेरा है ... मै मरने से पहले मरना नहीं चाहता ..."

वैसे कितना सही कहता था न वो ... "  किसी बड़ी खुशी के इंतजार में हम अपनी ज़िन्दगी मे ये छोटे-छोटे खुशियों के मौके खो देते हैं... "

सुनते है उस खुदा के घर जो देर से जाता है उसको सज़ा मिलती है ... पर यहाँ भी अपना हीरो आराम से बच निकलेगा यह कहते हुये ... "  मै देर से आता नहीं हूं लेकिन क्या करूं, देर हो जाती है इसलिए माफी का हकदार हूं, अगर फिर भी किसी ने ना माफ किया हो तो मै यही कहना चाहता हूं हम को माफी देदो साहिब... "



 राजेश खन्ना जी को सभी मैनपुरी वासियों की ओर से शत शत नमन और विनम्र श्रद्धांजलि |

गुरुवार, 12 जुलाई 2012

इस बार संजीवनी न मिली हनुमान को , नहीं रहे दारा सिंह ...

दारा सिंह (19 November 1928-12 July 2012)
बॉलीवुड के दिग्गज दारा सिंह जी का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया है। गुरुवार सुबह साढ़े सात बजे 'रुस्तम ए हिंद' ने आखिरी सासे लीं। ब्रेन डेड घोषित किए जाने के बाद और दवाओं के लगातार बेअसर साबित होने के बाद दारा जी को बुधवार रात उनके घर ले जाया गया था। परिजनों और बेटे बिंदू दारा सिंह की इच्छा थी कि दारा सिंह जी घर पर ही अंतिम सास लें।

दारा सिंह जी बीते दस दिन से वो मुंबई के कोकिला बेन अस्पताल में भर्ती थे। उनके स्वास्थ्य में बेहतरी के लिए पूरा देश प्रार्थना कर रहा था। डॉक्टरों की लाख कोशिशों के बावजूद उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हो रहा था। ऐसे में दारा सिंह जी अंतिम वक्त में अपने घर पर रहना चाह रहे थे। दारा जी का इलाज कर रहे डॉक्टर आर के अग्रवाल ने बताया कि उनकी मौत सुबह साढ़े सात बजे हुई। दारा सिंह जी का वेंटिलेटर हटाकर उन्हें घर ले जाया गया था। डॉक्टर ने बताया कि वेंटिलेटर हटाने का फैसला बिंदू सिंह और परिवार के सदस्यों का था।
84 वर्षीय अभिनेता को सात जुलाई को दिल का दौरा पड़ने के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था। तभी से वह आइसीयू में थे। अस्पताल के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर डॉक्टर राम नारायण ने बुधवार रात कहा था कि एमआरआइ से यह पता चला है कि ऑक्सीजन की कम आपूर्ति होने के कारण उनके मस्तिष्क को काफी नुकसान पहुंचा है।
कुश्ती चैंपियन रहे दारा सिंह जी ने 50 के दशक में फिल्म जगत में कदम रखा था। 'किंग कांग' और 'फौलाद' जैसी फिल्मों से उन्हें खास पहचान मिली। उनकी अंतिम फिल्म इम्तियाज अली की 'जब वी मेट' थी। इस फिल्म में दारा सिंह जी ने करीना कपूर के दादा का किरदार निभाया था।
महान इंसान थे दारा : अमिताभ बच्चन
दारा जी के निधन की खबर आते ही देश और बॉलीवुड में शोक की लहर फैल गई। अमिताभ बच्चन ने ट्वीट कर कहा कि दारा सिंह जी का चरित्र वाकई हनुमान सरीखा था और वे महान व्यक्ति थे। धारावाहिक रामायण में राम का किरदार निभाने वाले अरुण गोविल ने कहा कि दारा जी  का निधन दुखी कर देने वाली खबर है। दारा जी बहुत सहनशील और समर्पित कलाकार थे। इसके अलावा प्रेम चोपड़ा, प्राण, अभिषेक बच्चन, महाबली सतपाल सहित फिल्म और खेल से जुड़ी कई हस्तियों ने दारा सिंह जी के निधन पर शोक व्यक्त किया।
इंडिया के आयरन मैन
गौरतलब है कि कई दिनों तक अभिनेता महाबली दारा सिंह जी जिंदगी और मौत से लड़ने के बाद गुरुवार सुबह 7.30 बजे दुनिया से चल बसे। वह काफी दिनों तक मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल में भर्ती थे। उनकी गंभीर हालत को देखते हुए कई दिनों तक उन्हें वेंटिलेटर पर रखना पड़ा था। डाक्टरों ने बताया की उनके खून में ऑक्सीजन की भारी कमी थी। उनके गांव के गुरुद्वारे में उनकी सलामती की अरदास की जा रही थी। पूरे देश ने उनकी सलामती की दुआएं मांगी। रामायण में हनुमान बनकर भगवान लक्ष्मण के लिए संजीवनी बूटी लाने वाले दारा सिंह जी अपने असल जिंदगी में मौत से नहीं लड़ पाए। ताकत के इस प्रतीक को जो बीमारी हुई थी उसे क्रॉनिक इन्फ्लेमेटरी डेमीलीटेटिंग पॉलीन्यूरोपैथी के नाम से जाना जाता है। कुश्ती की दुनिया में देश विदेश में अपनी कामयाबी का लोहा मनवाने वाले दारा सिंह जी  ने 1962 में हिंदी फिल्मों से अभिनय की दुनिया में कदम रखा। पहलवानी से पहचान तो मिली ही थी, लेकिन रामायण सीरियल में हनुमान के किरदार ने दारा सिंह जी को हिंदुस्तान के दिलों में बसा दिया था।
अखाड़े से फिल्मी दुनिया का सफर
अखाड़े से फिल्मी दुनिया तक का सफर दारा सिंह जी के लिए काफी चुनौती भरा रहा। दारा सिंह रंधावा का जन्म 19 नवंबर 1928 को पंजाब के अमृतसर के धरमूचक गांव में बलवंत कौर और सूरत सिंह रंधावा के घर हुआ था।

जार्ज गारडियांको को हराकर बने विश्व चैंपियन
दारा सिंह जी अपने जमाने के विश्व प्रसिद्ध फ्रीस्टाइल पहलवान थे। उन्होंने 1959 में विश्व चैंपियन जार्ज गारडियांको को कोलकाता में कामनवेल्थ खेल में हराकर विश्व चैंपियनशिप का खिताब हासिल किया। साठ के दशक में पूरे भारत में उनकी फ्री स्टाइल कुश्तियों का बोलबाला रहा। दारा सिंह जी ने अपने घर से ही कुश्ती की शुरूआत की थी।
भारतीय कुश्ती को दिलाई पहचान
दारा सिंह जी और उनके छोटे भाई सरदारा सिंह ने मिलकर पहलवानी शुरू कर दी और धीरे-धीरे गांव के दंगलों से लेकर शहरों में कुश्तियां जीतकर अपने गांव का नाम रोशन करना शुरू कर दिया और भारत में अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश में जुट गए थे।
सिंगापुर से लौटकर बने चैंपियन
1947 में दारा सिंह जी सिंगापुर चले गए। वहां रहते हुए उन्होंने भारतीय स्टाइल की कुश्ती में मलेशियाई चैंपियन तरलोक सिंह को पराजित कर कुआलालंपुर में मलेशियाई कुश्ती चैंपियनशिप जीती थी। उसके बाद उनका विजयी रथ अन्य देशों की ओर चल पड़ा और एक पेशेवर पहलवान के रूप में सभी देशों में अपनी धाक जमाकर वे 1952 में भारत लौट आए। भारत आकर सन 1954 में वे भारतीय कुश्ती चैंपियन बने थे।
अपराजेय रहे दारा सिंह जी
उसके बाद उन्होंने कॉमनवेल्थ देशों का दौरा किया और विश्व चैंपियन किंगकाग को परास्त कर दिया था। दारा सिंह जी ने उन सभी देशों का एक-एक करके दौरा किया जहां फ्रीस्टाइल कुश्तियां लड़ी जाती थीं। आखिरकार अमेरिका के विश्व चैंपियन लाऊ थेज को 29 मई 1968 को पराजित कर फ्रीस्टाइल कुश्ती के विश्व चैंपियन बन गए। 1983 में उन्होंने अपराजेय पहलवान के रूप में कुश्ती से संन्यास ले लिया।
दारा सिंह जी का प्रेम
जब दारा सिंह जी ने पहलवानी के क्षेत्र में अपार लोकप्रियता प्राप्त कर ली तभी उन्हें अपनी पसंद की लड़की सुरजीत कौर मिल गई। आज दारा सिंह जी के भरे-पूरे परिवार में तीन बेटियां और दो बेटे हैं। दारा सिंह ने अपने समय की मशहूर अदाकारा मुमताज के साथ हिंदी की स्टंट फिल्मों में प्रवेश किया और कई फिल्मों में अभिनेता बने। यही नहीं कई फिल्मों में वह निर्देशक व निर्माता भी बने।
हनुमान बन बटोरी लोकप्रियता
उन्हें टीवी धारावाहिक रामायण में हनुमानजी के अभिनय से अपार लोकप्रियता मिली जिसके परिणाम स्वरूप भाजपा ने उन्हें राज्यसभा की सदस्यता भी प्रदान की। उन्होंने कई फिल्मों में अलग-अलग किरदार निभाए थे। वर्ष 2007 में आई जब वी मेट उनकी आखिरी फिल्म थी। वर्ष 2002 में शरारत, 2001 में फर्ज, 2000 में दुल्हन हम ले जाएंगे, कल हो ना हो, 1999 में ज़ुल्मी, 1999 में दिल्लगी और इस तरह से अन्य कई फिल्में। लेकिन वर्ष 1976 में आई रामायण में जय बजरंग बली, हनुमानजी का किरदार निभाकर लाखों दिलों को जीत लिया था।


दारा सिंह जी को सभी मैनपुरी वासियों की ओर से शत शत नमन और विनम्र श्रद्धांजलि |

रविवार, 8 जुलाई 2012

श्री ओम व्यास जी को तीसरी बरसी पर अश्रुपूरित श्रद्धांजलि

हास्य, व्यंग्य और कविता प्रेमियों को ८ जुलाई'०९ को एक और सदमा लगा |

८ जून'०९ से जिंदगी से संघर्ष कर रहे मशहूर हास्य कवि ओम व्यास का ०८ जुलाई'०९ की सुबह दिल्ली में निधन हो गया।

ज्ञात हो ओम व्यास ०८ जून'०९ को एक सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल हो गए थे। उनका दिल्ली के अपोलो अस्पताल में इलाज चल रहा था।

उल्लेखनीय है कि विदिशा में आयोजित बेतवा महोत्सव से भोपाल लौट रहे कवियों का वाहन दुर्घटनाग्रस्त हो गया था।
इस हादसे में हास्य कवि ओम प्रकाश आदित्य, लाड सिंह और नीरज पुरी की मौके पर ही मौत हो गई थी जबकि ओम व्यास गंभीर रूप से घायल हो गए थे। सभी उनके जल्द ठीक होने की आस लगाये बैठे थे पर ..................होनी को कुछ और ही मंजूर था |

आज ठीक तीन साल बीत जाने के बाद भी हिंदी साहित्य प्रेमी इस सदमे से उबार नहीं पाए है |



सभी मैनपुरी वासीयों की श्री ओम व्यास जी को विनम्र श्रद्धांजलि |

बुधवार, 4 जुलाई 2012

अमर शहीद भाई भगवतीचरण वोहरा जी की १०८ वी जयंती

आज सुबह जब ब्लॉग बुलेटिन की पोस्ट लिखने बैठा तब अनुराग शर्मा जी की इस पोस्ट पर निगाह गयी और मन प्रसन्न हो गया ... आज के दौर मे जब कहीं भी ,कोई भी क्रांतिकारियों के बारे मे कुछ भी नहीं लिख रहा है ऐसे मे उन क्रांतिकारियों के बारे मे जो भी जानकारी दें हमें उन का शुक्रिया अदा करना चाहिए ... आज के नेताओ का अगर बस चले तो इस देश मे इन क्रांतिकारियों का कोई नामलेवा भी न बचे ! गनीमत है आज भी लोग इतने जागरूक तो है ही कि अपने देश की आज़ादी के लिए बलिदान हो चुके इन महान क्रांतिकारियों को नहीं भूलें है !

आज 4 जुलाई है ... आज अमर शहीद भाई भगवती चरण वोहरा का जन्मदिन होता है ... 
आज उनकी 108 वी जयंती है !

  सभी मैनपुरी वासियो की ओर से अमर शहीद भाई भगवतीचरण वोहरा जी को शत शत नमन !

ब्लॉग आर्काइव

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